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भारत अपनी दशकों पुरानी परमाणु प्रतिज्ञा को क्यों तोड़ना चाहता है?
हाल ही में भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत परमाणु हथियारों के 'पहले इस्तेमाल न' करने की नीति पर अभी भी क़ायम है लेकिन 'भविष्य में क्या होता है यह परिस्थितियों पर निर्भर करता है.'
रक्षा मंत्री का भारत के 'न्यूक्लियर सिद्धांत' में बदलाव की संभावना जताने वाला बयान ऐसे समय में आया है, जब पड़ोसी देश पाकिस्तान से संबंध इस वक़्त बेहद तनावपूर्ण हैं. पाकिस्तान भी परमाणु शक्ति संपन्न देश है.
दक्षिण एशिया में शांति और सुरक्षा पर भारत के 'न्यूक्लियर सिद्धांत' में बदलाव का क्या असर होगा, इस बारे में विश्लेषक क्रिस्टोफ़र क्लैरी और विपिन नारंग ने समीक्षा की है.
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हाल ही में भारत का वो प्रण दोहराया जिसमें कहा गया था कि उनका देश युद्ध की सूरत में पहले परमाणु हथियारों का इस्तेमाल नहीं करेगा.
लेकिन, इसी बयान में उन्होंने आगे ये सवाल उठाया कि भारत अपने इस प्रण पर आख़िर कब तक क़ायम रह सकता है. राजनाथ सिंह ने मीडिया से कहा कि भारत अब तक पूरी दृढ़ता से अपने इस वादे पर क़ायम रहा है.
लेकिन, परमाणु हथियारों का इस्तेमाल पहले न करने के प्रण पर भारत भविष्य में भी अडिग रहेगा या नहीं, ये बदले हुए हालात पर निर्भर करेगा.
राजनाथ सिंह ने अपने इस बयान से ये संकेत दिया है कि परमाणु हथियारों के पहले इस्तेमाल न करने का भारत का प्रण स्थायी नहीं है. और भविष्य में अगर कोई युद्ध छिड़ता है, तो भारत एटमी हथियारों के पहले इस्तेमाल करने के अपने वादे पर क़ायम रहने को मजबूर नहीं होगा.
भारत के रक्षा मंत्री का ये बयान ऐसे समय में आया है, जब भारत ने अपने प्रशासन वाले कश्मीर की संवैधानिक स्थिति में बदलाव किया है. भारत के इस क़दम का पाकिस्तान ने कड़ा विरोध किया है. क्योंकि भारत की तरह ही पाकिस्तान भी पूरी कश्मीर रियासत पर अपना हक़ जताता रहा है.
रक्षा मंत्री का ये बयान कोई अचानक या हल्के में कही गई बात नहीं है. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ये बयान पोखरण में दिया है. पोखरण में ही भारत ने 1990 के दशक में परमाणु हथियारों का परीक्षण किया था.
राजनाथ सिंह ने अपने इस बयान को जैसे ट्वीट किया, उससे लगता है कि ये पहले से तय स्क्रिप्ट के तहत किया गया. भारत सरकार के प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो ने बाक़ायदा इस बारे में एक प्रेस रिलीज़ भी जारी की.
राजनाथ सिंह का ये बयान इस बात का सबसे आधिकारिक संदेश है कि भारत की परमाणु हथियारों को पहले इस्तेमाल न करने की नीति की जगह कोई नई अस्पष्ट नीति आ सकती है. इसका असर ये होगा कि किसी भी दिन भारत ये तय कर सकता है कि अपनी सुरक्षा के लिए वो परमाणु हथियारों का पहले इस्तेमाल कर सकता है.
क्या है परमाणु हथियार पहले न प्रयोग करने का सिद्धांत?
शीत युद्ध के दौरान अमरीका, सोवियत संघ, फ्रांस और ब्रिटेन ने किसी भी भयंकर संघर्ष की स्थिति में परमाणु हथियारों से दुश्मन पर पहले हमला करने का अधिकार खुला रखा था. पहले एटमी हमला करने के लिए दो परिस्थितियां आदर्श मानी जा सकती थीं:
1. किसी पारंपरिक युद्ध में हार का ख़तरा देख कर कोई भी देश अपने परमाणु हथियारों का प्रयोग दुश्मन देश की सेना पर कर सकता था, ताकि अपनी हार को टाल सके.
2. अगर किसी देश को ये आशंका हो कि उसका दुश्मन देश उस पर परमाणु हथियार से हमला करने वाला है, तो वो ऐसे हमले से बचने के लिए पहले ही दुश्मन पर एटमी हमला कर के उसके परमाणु हथियारों के ज़ख़ीरे को तबाह कर दे.
जब 1998 में एटमी टेस्ट के बाद भारत ने ख़ुद को परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र घोषित किया, तो उसने परमाणु युद्ध के ख्याल को ही ख़ारिज कर दिया था. भारत ने तय किया कि वो अपने एटमी हथियार ऐसे बनाएगा कि अगर दुश्मन देश पहले परमाणु हमला कर दे, तो भारत पलटवार कर सके. इसीलिए भारत ने अपने परमाणु हथियारों के ज़ख़ीरे को छोटा ही रखा.
तभी भारत ने चीन की तरह पहले परमाणु हथियार इस्तेमाल न करने के सिद्धांत पर चलने का ऐलान किया था.
जब 1964 में चीन ने अपना परमाणु परीक्षण किया था, तो चीन ने भी ऐलान किया था कि वो किसी भी हालात में पहले एटमी हथियार से हमला नहीं करेगा. चीन के ऐसे ऐलान पर भारत को बिल्कुल भी भरोसा नहीं था. भारत के 1998 में परमाणु परीक्षण कर के ख़ुद को एटमी राष्ट्र घोषित करने की यही बड़ी वजह भी थी.
चीन के अलावा भारत ही ऐसा देश है जिसने एटमी हथियारों का प्रयोग पहले न करने की घोषणा कर रखी है.
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अन्य दोशों की घोषणा
एक वक़्त में उत्तर कोरिया ने भी ऐसा ही प्रस्ताव रखा था. लेकिन, किसी भी देश ने उत्तर कोरिया पर यक़ीन नहीं किया. क्योंकि उत्तर कोरिया ने अपने परमाणु हथियारों का विकास दक्षिण कोरिया और अमरीका की मिली जुली सेनाओं को परास्त करने के लिए ही किया था.
हालांकि रूस और चीन की आशंकाओं को निर्मूल साबित करने के लिए अमरीका ने भी कई बार परमाणु हथियारों के पहले इस्तेमाल न करने के विचार पर ग़ौर किया. लेकिन, अब तक अमरीका ने एटमी हथियारों के पहले इस्तेमाल न करने की नीति का ऐलान नहीं किया है.
वहीं, भारत का सबसे कट्टर दुश्मन पाकिस्तान, जंग की सूरत में पहले ही परमाणु हथियार इस्तेमाल करने का विकल्प खुला रखे हुए है.
भारतीय सेना के हाथों पराजय से बचने के लिए पाकिस्तान ने युद्ध के दौरान परमाणु हथियारों का इस्तेमाल पहले करने का विकल्प खुला रखा है. पाकिस्तान की इसी एटमी गीदड़भभकी का नतीजा है कि भारत, पाकिस्तान से लगातार आने वाले चरमपंथियों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं कर सका है. जबकि, भारत बार-बार पाकिस्तान पर सीमा पार से चरमपंथ को प्रायोजित करने का आरोप लगाता रहा है.
नीति पर क्यों पुनर्विचार करना चाहता है भारत?
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बयान से साफ़ ज़ाहिर है कि एटमी हथियारों को लेकर दो दशक पुरानी नीति में बदलाव के बारे में सरकार के भीतर कोई चर्चा नहीं हुई. लेकिन, किसी वर्तमान रक्षा मंत्री की तरफ़ से आया बयान एक आधिकारिक संकेत देता है.
जब भारत ने 1998 में परमाणु परीक्षण किया, तो, उसके फ़ौरन बाद एटमी हथियारों का पहले प्रयोग न करने की नीति का ऐलान किया गया था.
2003 में भारत परमाणु हथियारों को लेकर अपना प्रण दोहराते हुए एक आधिकारिक एटमी नीति की घोषणा की थी, कि वो किसी रासायनिक या जैविक हथियारों के हमले के जवाब में ही परमाणु हथियार का प्रयोग करेगा.
हालांकि उस वक़्त भी बहुत से लोगों ने ये आशंका जताई थी कि भारत ने एटमी हथियारों के पहले प्रयोग करने की नीति में बदलाव किया है. फिर भी, ज़्यादातर लोगों का ये मानना था कि भारत ने अपनी न्यूक्लियर डॉक्ट्रिन में बहुत बड़ा बदलाव नहीं किया है.
साल 2016 में भारत के उस वक़्त के रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने सवाल उठाया था कि आख़िर भारत ख़ुद को परमाणु हथियार पहले इस्तेमाल न करने की नीति से बांध कर क्यों रखे.
मनोहर पर्रिकर का तर्क था कि भारत के लिए ये अच्छा होगा कि दुश्मन देश ये न जाने कि भारत क्या क़दम उठा सकता है. हालांकि बाद में मनोहर पर्रिकर ने सफ़ाई दी थी कि ये उनकी निजी राय है. लेकिन, राजनाथ सिंह ने अपने बयान के बाद ऐसी कोई सफ़ाई नहीं दी है.
इसी दौरान, भारत ने ऐसी तकनीक का विकास करना शुरू कर दिया है, जो उसे दुश्मन को निहत्था करने के लिए परमाणु हथियार पहले प्रयोग करने में सक्षम बनाए.
1998 में भारत के पास गिनी-चुनी बैलिस्टिक मिसाइलें थीं. ख़ुफ़िया जानकारी के संसाधन भी कम थे. और, हवा में मार कर सटीक निशाना लगाने वाले गिनती के हथियार ही थे.
आज भारत के पास बैलिस्टिक मिसाइलों का लंबा-चौड़ा ज़ख़ीरा है. भारत के पास आज ऐसे सैटेलाइट हैं जो दुश्मन के एटमी ठिकानों की सटीक जानकारी और तस्वीरें दे सकते हैं.
इसी तरह मानव रहित और सामान्य तरह के कई ऐसे लड़ाकू विमान हैं, जो दुश्मन पर सटीक हमला कर सकते हैं. इसके अलावा भारत के पास ऐसे हथियारों का ज़ख़ीरा भी बढ़ गया है, जो अचूक निशाना लगाते हैं. इनमें से कई तो ऐसे हैं जिन्हें लंबी दूरी से दुश्मन पर वार करने के लिए तैनात किया जा सकता है.
इसके अलावा भारत ने स्वदेशी बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस तकनीक विकसित करने में भी काफ़ी निवेश किया है. साथ ही भारत ने रूस और इसराइल से ऐसी महंगी मिसाइल डिफेंस तकनीक वाले हथियार भी ख़रीदे हैं. अगर भारत के पहले परमाणु हमला करने के बाद भी दुश्मन के पास कुछ हथियार बच जाते हैं, तो ये मिसाइल डिफेंस उनके निशाना लगाने से पहले ही उन्हें नष्ट करने की क्षमता रखते हैं.
हालांकि अभी तो ऐसा नहीं है, लेकिन भविष्य में भारत के पास ऐसे नेता होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है, जो दुश्मन पर पहले परमाणु हथियारों से हमला करने का फ़ैसला ले सके. ताकि, भारत अपने शहरों को किसी एटमी हमले से होने वाले नुक़सान से पहले ही हमला कर के बचा सके.
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ये बात इतनी अहम क्यों है?
राजनाथ सिंह ने ज़ोर देकर कहा कि भारत का एक ज़िम्मेदार परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र का दर्जा हासिल करना राष्ट्रीय गौरव की बात है. इसमें बड़ा योगदान इस बात का भी था कि विकल्प खुले होने के बावजूद भारत ने दुनिया को ये संदेश दिया कि वो शांति का पक्षधर है, इसीलिए वो परमाणु हथियारों का पहले प्रयोग करने का हामी नहीं है.
भारत की परमाणु नीति में संभावित बदलाव का विरोध करने वाले कुछ जानकार, जैसे रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल प्रकाश मेनन ये मानते हैं कि अगर, भारत परमाणु हथियारों का पहले इस्तेमाल न करने के अपने सिद्धांत से पीछे हटता है, तो एक ज़िम्मेदार परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र की भारत की छवि को धक्का लगेगा.
पाकिस्तान के मौजूदा प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने हाल के दिनों में ये सवाल उठाया है कि एक फ़ासीवादी और हिंदुत्ववादी पार्टी के नेता नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री रहते हुए भारत के परमाणु हथियार कितने सुरक्षित हैं.
हालांकि, अगर भारत अपनी इस परमाणु नीति में बदलाव करता है, तो ये बस प्रतीकात्मक या बड़बोली बयानबाज़ी भर नहीं होगी. बल्कि ये पाकिस्तान से संभावित ख़तरे के जवाब में होगी.
पाकिस्तान के एटमी हथियारों की नीति के ज़िम्मेदार लोगों ने निजी तौर पर ये कहा है कि उन्हें पहले भी भारत पर भरोसा नहीं था. लेकिन, अब बयानबाज़ी के ज़रिए उसकी न्यूक्लियर डॉक्ट्रिन में बदलाव की बात और भारत की क्षमताओं के विस्तार के चलते पाकिस्तान और एटमी हथियार बनाने को मजबूर होगा. फिर किसी संकट की सूरत में ये एटमी हथियार पाकिस्तान किसी एक जगह न रख कर पूरे देश में अलग-अलग ठिकानों पर रखेगा. ताकि, भारत के पहले हमला करने की सूरत में भी उसके कुछ एटमी हथियार बच जाएं जिनका वो बाद में भारत के ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर सके.
किसी संकट की स्थिति में परमाणु हथियार इस्तेमाल करने के विकल्प पर पहले के मुक़ाबले ज़्यादा जल्दी ग़ौर किया जा सकेगा. और शांति काल में पाकिस्तान ख़ुद को त्वरित परमाणु हमले के लिए तैयार करने में ताक़त लगाएगा.
हालांकि हम फ़ौरी तौर पर ऐसे हालात में सुरक्षा या हादसे के जोख़िमों और संभावित ग़लतफ़हमियों के असर को नहीं देख सकते हैं. लेकिन, इस बात की पूरी संभावना है कि दक्षिण एशिया आगे चल कर ख़ुद को हथियारों की होड़ का शिकार होने से नहीं बचा सकेगा, जो कभी शीत युद्ध के दौरान अमरीका और सोवियत संघ के बीच देखने को मिली थी.
(क्रिस्टोफ़र क्लैरी अमरीका की न्यूयॉर्क स्टेट यूनिवर्सिटी यानी एल्बनी यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं. वहीं विपिन नारंग अमरीका के मशहूर एमआईटी यानी मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी में एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं. नारंग एमआईटी के सिक्योरिटी स्टडीज़ प्रोग्राम से भी जुड़े हुए हैं)
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