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अनुच्छेद 370 ख़त्म होने का कश्मीरियों पर क्या असर?
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बेंगलुरू से, बीबीसी हिंदी के लिए
भारत के दूसरे हिस्सों में रहने वाले कश्मीरी सोचते हैं कि जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 ख़त्म करने के फ़ैसले से उन लोगों को धक्का लगेगा जो अब तक भारत के साथ थे.
वो अलगावादियों की तरफ अपना रुख़ कर सकते हैं, वहीं कुछ अन्य लोगों का मानना है कि 'कश्मीरियत', जो उनका गौरव है उसे छीन लिया गया है.
दक्षिण बेंगलुरू में बसे या बिज़नेस के सिलसिले में यहां आए कश्मीर के व्यवसायी और छात्रों के बीच बेचैनी है क्योंकि बीते कुछ दिनों से वे अपने परिवार से बातचीत नहीं कर सके हैं.
यही वजह है कि जिनके घरों में परिजन बीमार हैं वो ज़्यादा परेशान हैं क्योंकि टेलीफ़ोन काम नहीं कर रहा.
कॉरपोरेट वकील साजिद निसार ने बीबीसी हिंदी को बताया, "मेरे पिता के बीमार होने के बाद मैं किसी भी चीज़ पर ध्यान नहीं दे पा रहा हूं उनकी हालत कैसी है, यह भी पता नहीं लग रहा."
अनुच्छेद 370 को लेकर की गई घोषणा के बाद जिनका भारत में विश्वास है, जो मुख्यधारा की राजनीति में हैं और जो चुनाव लड़ चुके हैं वे भी सकते में हैं.
साजिद निसार जैसे कई और कश्मीरी हैं जिनके माता-पिता की सेहत ठीक नहीं है लेकिन हर किसी को यही फ़िक्र हो रही है कि उनका परिवार कहीं किसी संकट में तो नहीं है.
'कश्मीरियों का भरोसा टूटा'
बेंगलुरू में आईटी प्रोफ़ेशनल शाहिद अंसारी स्टार्ट अप्स की मदद करते हैं. वो कहते हैं, "जो भारत में विश्वास करते थे, वे जो मुख्यधारा की राजनीति का अनुसरण करते थे और जिन्होंने चुनाव लड़ा, बीते कुछ दिनों में उनकी ज़मीन सिमट गई है. भारत और कश्मीर के बीच वो भरोसा टूट गया है."
अंसारी ख़ास कर इस ओर इशारा करते हैं कि नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) जैसे दलों ने दशकों से अलगाववादियों को एक कोने में कर रखा है और महबूबा मुफ़्ती (पीडीपी) और उमर अब्दुल्ला (एनसी) की गिरफ़्तारी से कश्मीरियों को झटका लगा है.
वे कहते हैं, "उन्हें मुख्यधारा की पार्टी कहा जाता है क्योंकि वे वहां बतौर भारतीय खड़े थे. उदाहरण के लिए, नेशनल कॉन्फ्रेंस को अलगाववादियों के साथ लड़ाई में अब तक अपने 25 से 30 हज़ार कार्यकर्ताओं का नुकसान हुआ है. आज, उनकी ज़मीन पूरी तरह सिमट चुकी है. उनके पास कोई नज़रिया नहीं बचा. आने वाले दिनों में, वो अलगावादियों के पाले में चले जाएंगे."
'ऐसी कार्रवाईयों से नफ़रत बढ़ती है'
श्रीनगर से आए एक व्यापारी अब्दुल हुसैन सईद की उड़ान रद्द हो गई है. वो वापस लौटने के बाद कहते हैं, "यह मेरी समझ से परे है कि उन लोगों की आवाज़ क्यों दबाई जा गई जो भारत के लिए अपनी आवाज़ें बुलंद किया करते थे. पूर्व मुख्यमंत्रियों को जेल में डाल कर, यह संदेश दिया गया है कि भारत पर भरोसा मत करो. हमें डर देखने की आदत है लेकिन ऐसी कार्रवाई से सिर्फ़ नफ़रत बढ़ती हैं."
इस घोषणा की शाम को आयोजित विरोध प्रदर्शन में भाग लेने वाले छात्रों के एक समूह को अन्य कश्मीरियों ने सलाह दी है कि वे श्रीनगर जाने के लिए बेंगलुरू न छोड़ें.
'मीडिया से बात न करें'
एक वकील ने अपना नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा, "वे अपने परिवार को लेकर चिंतित हैं इसलिए कश्मीर जाना चाहते हैं. उन्हें यहां रहने में भी डर है. हमने उन्हें समझाने की कोशिश की है कि वो अपने भविष्य को ख़तरे में न डालें. साथ ही हमने उन्हें यह भी सुझाव दिया है कि मीडिया से भी बात न करें."
कश्मीर व्यापारी महासंग के हक़ीम वसीम कहते हैं, "कश्मीरी अलग थलग महसूस कर रहे हैं. कश्मीरियों के लिए, कश्मीरियत हमारा गौरव है. हमसे कश्मीरी होने की पहचान छीन ली गई है. और, हम अपनी पहचान को लेकर भावुक हैं."
क्या निवेश बढ़ेगा?
लेकिन, क्या 35-ए को ख़त्म करना निवेश को आकर्षित करेगा और इससे जम्मू कश्मीर आर्थिक समृद्धि की ओर बढ़ेगा?
अंसारी कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि उस जगह निवेश करने में कोई सुरक्षित महसूस करेगा जहां हज़ारों की संख्या में सुरक्षाबल तैनात हैं.''
सिटी पुलिस कमिश्नर भास्कर राव ने कश्मीरी संगठनों के प्रतिनिधियों और व्यापारी संगठन के लोगों को बातचीत के लिए बुलाया था, जिसमें उनके मुद्दे समझने की कोशिश की गई थी.
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