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ZOMATO के सामने अब बीफ़-पोर्क विवाद
- Author, प्रभाकर एम.
- पदनाम, कोलकाता से बीबीसी हिंदी के लिए
खाने का ऑनलाइन आर्डर लेकर उसकी डिलीवरी करने वाली कंपनी ज़ोमैटो का विवादों से पीछा नहीं छूट रहा है.
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से सटे हावड़ा ज़िले में कंपनी के खाना डिलीवरी करने वाले कर्मी मानदेय बढ़ाने की मांग को लेकर एक सप्ताह पहले से ही आंदोलन कर रहे थे और अब बीफ़ यानी गाय और पोर्क यानी सूअर के मांस की डिलीवरी नहीं करने पर अड़े इन लगभग चार सौ डिलीवरी करने वालों ने सोमवार से बेमियादी हड़ताल शुरू कर दी है.
दूसरी ओर, ज़ोमैटो ने एक आधिकारिक बयान में कहा है कि हावड़ा में 'कुछ कर्मचारियों ने कुछ मुद्दों पर चिंता जताई है. उनसे बातचीत कर समस्या को शीघ्र सुलझाने का प्रयास किया जा रहा है.'
इस बीच, पश्चिम बंगाल सरकार ने भी कंपनी की नीतियों पर सवाल उठाते हुए कहा है कि किसी को उसकी धार्मिक भावनाओं के खिलाफ काम करने पर मजबूर नहीं किया जा सकता.
बीते दिनों मध्य प्रदेश के जबलपुर में रहने वाले अमित शुक्ला नामक एक ग्राहक ने ज़ोमैटो की ओर से डिलीवरी करने वाले एक मुस्लिम कर्मचारी के हाथों खाना लेने से इंकार करते हुए अपना आर्डर रद्द कर दिया था.
इस घटना को लेकर काफी विवाद हुआ था. लेकिन तब कंपनी ने अपने कर्मचारी का पक्ष लेते हुए एक ट्वीट में कहा था कि खाने का 'कोई धर्म नहीं होता. यह अपने आप में धर्म है.' उसके बाद ज़ोमैटो के समर्थकों की तादाद आश्चर्यजनक रूप से बढ़ गई थी.
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हड़ताल पर गए डिलीवरी करने वाले कर्मचारियों का कहना है कि वे लोग गाय और सूअर के मांस की डिलीवरी नहीं करना चाहते.
एक डिलीवरी कर्मचारी ने कहा, "बार-बार कहने के बावजूद कंपनी हमारी मांगें नहीं सुन रही है और हमें अपनी इच्छा के खिलाफ इन दोनों चीजों की डिलीवरी के लिए मजबूर किया जा रहा है. ऐसे में हमारे पास हड़ताल के अलावा कोई चारा नहीं बचा था."
क्या हैं शिकायतें?
ज़ोमैटो के कर्मचारियों ने अपनी मांग के समर्थन में रविवार को यहां प्रदर्शन भी किया.
एक कर्मचारी सुजित कुमार गुप्ता कहते हैं, "हम एक सप्ताह से बीफ़ और पोर्क की डिलीवरी के खिलाफ विरोध जता रहे हैं. हमें अपनी इच्छा औऱ धार्मिक भावनाओं के खिलाफ बीफ़ की डिलीवरी पर मजबूर क्यों किया जा रहा है ?"
एक अन्य डिलीवरी कर्मचारी मोहसिन अख्तर कहते हैं, "पोर्क की डिलीवरी करना हमारी धार्मिक भावनाओं के खलाफ है. हमें यह तय करने का अधिकार होना चाहिए कि जो खाना हमारे धर्म के प्रतिकूल है उसकी डिलीवरी करें या नहीं."
'कटौती से परेशान कर्मचारी'
इन कर्मचारियों ने डिलीवरी पर मिलने वाली रकम बढ़ाने की भी मांग उठाई है. अख्तर बताते हैं, "पहले हमें हर डिलीवरी पर 80 रुपए मिलते थे जिसे दो महीने पहले घटा कर 60 रुपए कर दिया गया था. लेकिन हाल में यह रकम 25 रुपए कर दी गई है. इसी में हमें अपने स्कूटर और मोटरसाइकिल के तेल का खर्च और रखरखाव का खर्च भी देना होता है. नतीजतन हमारे हाथ में कुछ भी नहीं बचता."
हड़ताली कर्मचारियों का कहना है कि इस समस्या की शुरुआत अगस्त के पहले सप्ताह में हुई. कंपनी ने उस समय कुछ नए होटलों और रेस्तरां को अपनी सूची में शामिल किया था. लेकिन वहां से होने वाले आर्डर में 'बीफ़ होने की वजह से हिंदू कर्मचारियों ने वह खाना डिलीवरी करने से मना कर दिया था.'
इसकी सूचना प्रबंधन को दी गई. लेकिन प्रबंधन ने उल्टे उनको ऐसे खाने की डिलीवरी पर मजबूर किया.
सुजित कहते हैं, "हमें काम से हटाने की भी धमकी दी गई. इसी तरह सूअर के मांस वाले भोजन का आर्डर मुस्लिम कर्मचारियों ने डिलीवरी करने से मना कर दिया. लेकिन कंपनी का रवैया जस का तस रहा. इसी के बाद कर्मचारियों ने हड़ताल पर जाने का फैसला किया. "
एक अन्य कर्मचारी बजरंग नाथ वर्मा कहते हैं, "जिस थैले में मैं ग्राहकों को बीफ़ की डिलीवरी करता हूं उसे घर ले जाना पड़ता है. इससे मेरी धार्मिक भावनाओं को ठोस पहुंचती है."
कर्मचारियों को मिला समर्थन
राज्य के सिंचाई मंत्री राजीव बनर्जी ने इस मामले का संज्ञान लेते हुए कहा है कि किसी को जबरन धर्मविरोधी काम करने पर मजबूर नहीं किया जा सकता. यह उचित नहीं है. मंत्री कहते हैं, "यह मामला मेरे संज्ञान में आया है और इस मामले में जरूरी कदम उठाया जाएगा."
एक अन्य मंत्री अरूप राय ने भी इस मामले में कर्मचारियों का समर्थन करते हुए कंपनी के समक्ष इस मसले को उठाने का भरोसा दिया है.
ज़ोमैटो का क्या कहना है?
दूसरी ओर, ज़ोमैटो ने इस मुद्दे पर जारी एक बयान में कहा है, "भारत जैसे विविधताओं वाले देश में शाकाहारी और मांसाहारी खाने की डिलीवरी के लिए अलग-अलग तंत्र की स्थापना संभव नहीं है. हमसे जुड़े तमाम लोग इस बात को समझते हैं. हावड़ा में कुछ कर्माचारियों ने अपनी चिंताएं जताई हैं. बातचीत के जरिए इस समस्या को शीघ्र सुलझाने का प्रयास किया जा रहा है."
कंपनी ने कहा है कि कोलकाता समेत राज्य के दूसरे शहरों में उसकी सेवाएं पहले की तरह चल रही हैं.
बुद्धिजीवियों की चिंता
फिलहाल पुलिस भी इस मामले पर नजदीकी निगाह बनाए हुए है.
हावड़ा की सहायक पुलिस आयुक्त (उत्तर) प्रतीक्षा झाझरिया कहती हैं, "हमें इस मामले में कोई शिकायत नहीं मिली है. फिलहाल कानून और व्यवस्था की कोई समस्या नहीं है. "
वहीं बुद्धिजीवियों ने समाज में बढ़ती इस धार्मिक सहिष्णुता पर गहरी चिंता जताई है.
कवि शीर्षेंदु मुखर्जी कहते हैं, "मौजूदा माहौल भावी पीढ़ी के लिए खतरनाक है. इसके बाद वह दिन भी दूर नहीं जब लोग जात-पांत देख कर ही डाक्टरों से इलाज कराएंगे.
एक अन्य साहित्यकार अबुल बशर कहते हैं, "यह नफ़रत खाने नहीं बल्कि इंसानों के प्रति है. ऐसी घटनाएं समाज में बढ़ती धार्मिक असहिष्णुता का सबूत हैं."
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