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रेप पीड़ित बेटियों को न्याय दिलाने के लिए लड़ रही मांएं
- Author, भूमिका राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"पुलिया के नीचे वो सिकुड़ी-सी बैठी थी. खुद को समेटे हुए. एक झीने से दुपट्टे से ख़ुद को ढकने की कोशिश करती हुई. उसके पास में ही खाने का डिब्बा खुलकर बिखरा पड़ा था. उसके कपड़े मिट्टी में सने हुए. पास में उसकी चप्पलें उल्टी पड़ी थीं. इतनी चोट थी देह पर... कुछ भी भूला नहीं है. मां के लिए आसान थोड़े होता है अपनी बेटी को ऐसे देखना."
एक रेप पीड़िता की मां बताती है कि उनकी स्कूल जाने वाली बेटी के साथ चार बार कथित तौर पर रेप हुआ. पहली बार जब वो लगभग दस साल की थीं, उसके बाद तीन बार और.
वे बताती हैं कि रेप करने वाला उनके गांव का ही एक लड़का था. जो पहले उनकी बेटी को स्कूल के रास्ते में आते-जाते तंग किया करता था. एक दिन जब पति-पत्नी दोनों काम से घर से बाहर थे, उसने घर में घुसकर उनकी बेटी का बलात्कार किया.
फिर एक बार खेत में, एक बार पुलिया के पास और एक बार और... बेटी के साथ हुई रेप की ये अलग-अलग घटनाएं कविता के लिए कभी ना भूलने वाला दर्द है.
वो बताती हैं कि उनकी बेटी ने तीन बार आत्महत्या करने की भी कोशिश की.
उनका कहना था कि "वो फांसी पर लटक कर मरने जा रही थी. मैंने देख लिया. दौड़कर गई और उसे गले से लगा लिया. और कहा तुम्हारे अलावा मेरा कोई नहीं है. चाहे कुछ हो जाए मैं तुम्हारे लिए लड़ूंगी. मैं कभी तुम्हारा साथ नहीं छोडूंगी."
अब ये मां अपनी बेटी के साथ गांव छोड़कर शहर आ गई हैं. अब वो काम नहीं करतीं. अपनी दो बेटियों के लिए वो घर पर रहती हैं. एक वक़्त पर ज़िंदगी से हार मान चुकी उनकी बेटी भी अब दोबारा पढ़ने जाने लगी है.
वो ये सब बताते-बताते रोने लगती हैं. लेकिन ख़ुद अपने आंसू पोंछते हुए कहती हैं, केस चल रहा है.
उनके अनुसार शुरू में पुलिस ने भी साथ नहीं दिया लेकिन अब मामला कोर्ट में है और वो जितना हो सके अपनी बेटी के लिए लड़ेंगी.
ये एक अकेली मां नहीं थी बल्कि इन जैसी ही क़रीब हज़ार से अधिक मांओं ने सांकेतिक हस्ताक्षर के माध्यम से चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई को चिट्ठी लिखकर बच्चों के साथ हो रही रेप-दुर्व्यवहार की घटनाओं पर संज्ञान लेने का अनुरोध किया है.
गरिमा अभियान के माध्यम से इन महिलाओं ने सुप्रीम कोर्ट से निवेदन किया है कि बच्चों के ख़िलाफ़ हो रहे हिंसा के मामलों पर और गंभीरता से विचार किया जाए.
गरिमा अभियान से जुड़े आसिफ़ ने कहा "सुप्रीम कोर्ट ने पॉक्सो एक्ट बनाकर एक उम्मीद की किरण दी है. लेकिन अभी भी बहुत गुंजाइश है. अभी भी टू-फिंगर टेस्ट हो रहे हैं, पुलिस बच्चों की शिकायत को गंभीरता से नहीं लेती. कई बार तो मामले तक दर्ज नहीं होते."
दिल्ली के प्रेस क्लब में नौ अगस्त को आयोजित एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने पहुंची हर औरत के पास अपनी एक कहानी थी.
महाराष्ट्र के एक गांव से आई एक और मां बताती है कि उनकी बेटी के साथ रेप हुआ. मध्य प्रदेश से आई एक लड़की ने बताया कि उसके किसी अपने के साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ है लेकिन वो जिस समाज से आती है वहां मां-बाप अपनी बेटियों से देह-व्यापार करवाते हैं.
दस-दस साल की बच्चियों को एक दिन में तीस-तीस बार लोगों के सामने खड़ा होना पड़ता है.
भंवरी देवी भी यहां मौजूद थीं. उन्होंने कहा दिन-पर-दिन हालात ख़राब होते जा रहे हैं. आए दिन बच्चों के साथ रेप के मामले आ रहे हैं... सरकार को इस पर गंभीरता से सोचना चाहिए.
लेकिन शिकायत सिर्फ़ क़ानून से नहीं
महाराष्ट्र से आई ये मां कहती हैं "मेरी बेटी के साथ बलात्कार हुआ. हमने किसी तरह उसको समझा-बुझाकर हिम्मत बांधने को कहा. लेकिन लोग उसे जीने नहीं देना चाहते."
"अगर वो उदास होती है तो कहते हैं इसे उसकी याद आ रही है. हंसती है तो बेशर्म कहते हैं. लोग कहते हैं जिसका रेप हो गया हो वो हंसता थोड़े है. बताओ क्या करे मेरी बेटी. मेरे बेटे को उसकी बहन का नाम ले-लेकर इस क़दर परेशान किया कि वो गांव छोड़कर ही चला गया."
प्रेस क्लब में आई ये सभी औरतें किसी न किसी अपने के लिए लड़ रही हैं. किसी को कथित तौर पर पुलिस का साथ नहीं मिला तो किसी को परिवार का. कभी पैसे की तंगी ने परेशान किया तो कभी दूसरों की धमकियों ने.
जब हमने रेप पीड़िता मां से पूछा कि आगे क्या सोचा है? तो उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा, "बेटी का सहारा बनना है...जब तक वो खड़ा होना और लड़ना नहीं सीख जाती. अपने लिए और अपने जैसों के लिए."
इन राज्यों के बच्चे ज्यादा शिकार
भारत में मासूम बच्चों के ख़िलाफ़ हो रहे अपराधों का आंकड़ा परेशान करने वाला है.
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक़ साल 2015 में भारत में बच्चों के ख़िलाफ़ अपराध के 94,172 मामले दर्ज किए गए. इनमें अपहरण के 41,893 मामले, यौन शोषण के 14,913 मामले, रेप के 10,854 और हत्या के 1,758 मामले थे.
इनमें महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, उत्तराखंड और दिल्ली से सबसे ज़्यादा मामले सामने आए, जबकि सिक्किम और नगालैंड में सबसे कम अपराध देखने को मिले.
पॉक्सो क़ानून से है उम्मीद
आसिफ़ कहते हैं कि पॉक्सो एक बहुत ही बड़ा क़दम है. और इसकी जितनी सराहना की जाए कम है. वो मानते हैं कि इससे ज़रूर कुछ असर होगा.
दरअसल, बाल यौन अपराधियों को सज़ा देने के लिए खास कानून है. पॉक्सो यानि प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेंसेस. इस कानून का मकसद बच्चों के साथ यौन अपराध करने वालों को जल्द से जल्द सज़ा दिलाना है.
इस क़ानून के मुताबिक़ अगर बाल यौन शोषण का कोई मामला सामने आता है तो पुलिस को जल्द से जल्द कार्रवाई करनी होगी.
इसमें बच्चे की पहचान को सुरक्षित रखना अनिवार्य है. कानूनी कार्रवाई के कारण बच्चे को मानसिक तौर पर परेशानी ना हो, इसका खास ध्यान रखा जाना चाहिए.
लेकिन कविता और पुष्पा मानती हैं कि सिर्फ़ यही काफी नहीं. अगर काफी होता तो जिस दिन से यह क़ानून बना बच्चों के साथ हो रहे अत्याचार थमते लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. इसलिए उनकी मांग है कि कुछ और ज़रूरी क़दम उठाए जाएं.
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