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कश्मीर घाटी में अतिरिक्त सुरक्षाबलों की तैनाती से उथल-पुथल- नज़रिया
- Author, अनुराधा भसीन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
पहले से ही अस्थिरता से जूझ रही कश्मीर घाटी में केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से 10 हज़ार अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती के आदेश ने चिताओं को और बढ़ा दिया है.
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के श्रीनगर दौरे के तुरंत बाद यह ऐलान होने से कश्मीर में बेचैनी का माहौल बन गया है.
15 अगस्त तक चलने वाली अमरनाथ यात्रा के लिए यहां पर अतिरिक्त 40 हज़ार अर्धसैनिक बल तैनात किए गए हैं. भारत का स्वतंत्रता दिवस भी इसी दिन है.
घाटी में सामान्य तौर पर जितने सुरक्षाबल तैनात रहते हैं, आजकल उससे अधिक सुरक्षाबल यहां पर मौजूद हैं. कई मानव अधिकार संगठनों का आकलन है कि जम्मू-कश्मीर में 7 लाख सैनिक हैं. इनमें सीमा पर तैनात सैनिक भी शामिल हैं.
तर्क दिया जाता है कि कश्मीर घाटी में हर 15 से 25 आदमियों पर एक वर्दीधारी तैनात है. हालांकि, अधिकारी इन आंकड़ों को अतिरंजित बताते हैं.
बड़ी संख्या में तैनात सुरक्षाबल
यहां पर सैनिकों की सटीक संख्या जो भी हो, सैन्य दल-बल की अधिकतर मौजूदगी घाटी में ही है.
कश्मीर घाटी बहुत ज़्यादा सैन्यीकृत नज़र आती है. बहुत कम दूरी पर सैनिकों, बंकरों, बैरिकेड और नाकों की मौजूदगी बताती है कि यहां पर कितने असामान्य रूप से कड़े सुरक्षा इंतज़ाम हैं.
बड़ी संख्या में सैनिकों की तैनाती के कारण स्थानीय लोगों में ग़ुस्से और अलगाव की भावना बढ़ती है, जो पहले ही ख़ुद पर बंदिशें महसूस करते हैं.
अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती से घाटी में उथल-पुथल और भी बढ़ जाएगी. जिस हड़बड़ी से यह क़दम उठाया गया है, उससे कश्मीरियों के मन में केंद्र सरकार को लेकर संदेह और गहरा गया है.
इन सुरक्षाबलों को हवाई मार्ग या फिर सड़कों के ज़रिये ठिकानों पर भेजा जा चुका है. इनमें सीआरपीएफ़, बीएसएफ़, एसएसबी और आईटीबीपी के जवान शामिल हैं.
अफ़वाहों का दौर
सैनिकों की इस तैनाती के अलावा स्थानीय मीडिया में कुछ अपुष्ट बातें सामने आई हैं और दो बातों को लेकर अफ़वाहें भी फैली हुई हैं.
पहला क़यास यह है कि सरकार आर्टिकल 35 ए को हटाना चाहती है जिसके तहत जम्मू और कश्मीर के स्थानीय निवासियों को परिभाषित किया गया है.
दूसरी अफ़वाह सरकारी दिशानिर्देशों से जुड़ी है. कहा जा रहा है कि सरकार के विभिन्न विभागों की ओर से जारी पत्रों में रोज़मर्रा की ज़रूरत की चीज़ों को इकट्ठा करने के लिए कहा गया है. इससे संकेत मिल रहे हैं कि सामान्य जीवन लंबे समय के लिए अस्त व्यस्त हो सकता है.
ये अफ़वाहें अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती से पहले से फैली हुई हैं.
अभी तक इन तीनों मामलों यानी आर्टिकल 35ए के साथ छेड़छाड़, कथित दिशानिर्देशों और सैनिकों की तैनाती को लेकर सरकार की ओर से आधिकारिक रूप से कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है.
कुछ स्थानीय पुलिस अधिकारियों ने यह कहकर आशंकाओं को दूर करने की कोशिश की कि सुरक्षाबलों की यह तैनाती सामान्य रूटीन के तहत की गई है. उनका कहना है कि ये जवान चरणबद्ध ढंग से पहले से तैनात सुरक्षा बलों की जगह लेंगे.
हालांकि, राष्ट्रीय मीडिया की ख़बरों में अज्ञात सरकारी सूत्रों के हवाले से कहा जा रहा है कि कश्मीर घाटी में बड़े हमले की ख़ुफ़िया सूचना मिलने के कारण अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किए गए हैं.
मगर इस मामले में स्पष्टता के अभाव और केंद्र सरकार की चुप्पी ने लोगों की बेचैनी बढ़ा दी है. इसी कारण सभी राजनीतिक समूहों की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया आई है.
यहां तक कि बीजेपी के सहयोगी सज्जाद लोन ने भी केंद्र पर 'राजनीतिक दांव-पेंच' में ज़्यादा दिलचस्पी लेने का आरोप लगाया है.
विरोधाभासी दावे
केंद्र सरकार और जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक दावा करते हैं घाटी में "स्थिति सुधर रही है" और "चरमपंथ की कमर टूट गई है." मगर अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती इन दोनों दावों को झुठला देती है.
आधिकारिक आंकड़े ही इन दावों की हवा निकाल देते हैं. साल 2018 पिछले एक दशक में घाटी का सबसे ख़ूनी साल था. इसी साल सरकार के ख़िलाफ़ स्थानीय लड़कों के हथियार उठाने में भी उभार देखने को मिला है.
2017 में यह संख्या 135 थी जो 2018 में बढ़कर 201 हो गई थी. अधिकारियों का कहना है कि मार्च से लेकर जून 2019 तक ही घाटी में 50 युवकों ने चरमपंथ की राह पकड़ ली है.
ख़ास बात यह है कि सरकार की ओर से चरमपंथ विरोधी अभियान की क़ामयाबी के जो दावे किए जाते हैं, वे विभिन्न अभियानों के दौरान मारे गए चरमपंथियों की संख्या के आधार पर किए जाते हैं.
2019 के पहले छह महीनों में कश्मीर में पुलिस और सुरक्षा बलों के अलग-अलग ऑपरेशनों में 126 चरमपंथी मारे गए हैं. 2017 में यह संख्या 206 थी और 2018 में 246 चरमपंथियों की मौत हुई थी.
क़ामयाबी की इस अवधारणा में यह आंकड़ा शामिल नहीं किया जाता कि कितनी ज़्यादा संख्या में युवक हथियार उठा रहे हैं. यह भी नहीं देखा जाता कि अलक़ायदा और आईएसआईएस के प्रति युवा कितना झुकाव रख रहे हैं या कितने नागरिकों या सुरक्षा बलों की जान जा रही है.
इसी महीने केंद्रीय गृह राज्य मंत्री जी. किशन रेड्डी ने संसद को जानकारी दी थी कि जम्मू-कश्मीर में 2014 से लेकर 2019 तक 963 चरमपंथी ख़त्म किए गए.
उन्होंने यह भी बताया कि इस दौरान कुल 413 सुरक्षाकर्मियों ने अपनी जान गंवाई. इस तरह से चरमपंथियों और सुरक्षाबलों की मौत का अनुपात 2:1 बनता है. यानी दो चरमपंथियों के मुक़ाबले एक भारतीय सुरक्षा बल ने अपनी जान गंवाई. यह सैन्य रणनीति के हिसाब से कोई अच्छा आंकड़ा नहीं कहा जा सकता.
कश्मीर में सेना की रणनीति इसलिए काम नहीं कर पाई क्योंकि कश्मीर एक राजनीतिक विवाद है और चरमपंथ को ख़त्म करने के लिए राजनीतिक तरीका नहीं अपनाया गया और न ही कश्मीर के लोगों से राजनीतिक संपर्क स्थापित करने की कोशिश की गई.
इसके उलट, केंद्र में सत्ता पर बैठी बीजेपी लगातार विवादित मुद्दों को तूल देकर कश्मीर के राजनीतिक हालात में अस्थिरता लाने की कोशिश कर रही है.
हाल ही में बीजेपी नेता राम माधव ने कश्मीर यात्रा के दौरान आर्टिकल 370 को हटाने की बात कही थी. देखने को मिल रहा है कि सरकार कश्मीर के राजनीतिक समूहों पर भ्रष्टाचार और टैक्स चोरी जैसे आरोप लगा रही है. इनमें कई क्षेत्रीय दल भी शामिल हैं.
घाटी का ताज़ा घटनाक्रम जहां 35ए को हटाए जाने की संभावना को लेकर बेचैनी पैदा करता है वहीं घाटी में मानवाधिकार उल्लंघन की घटनाएं बढ़ने और नागरिकों को मिलने वाली स्वतंत्रताओं में कमी आने की आशंका भी पैदा करता है.
इन चिंताओं को लेकर सरकार के ख़ामोश रहने से यहां पर अस्थिरता और डर बढ़ाने की पूर्व निर्धारित योजना की पुष्टि होती है. हो सकता है कि राजनीतिक लाभ उठाने के लिए यह चुप्पी बनाकर रखी जा रही है.
जितनी अव्यवस्था फैलेगी, उतना ही कम मतदान होगा और बीजेपी को उम्मीद है कि इससे दक्षिणी कश्मीर और उत्तरी कश्मीर के सीमा वाले इलाक़ों में उसे फ़ायदा मिल सकता है.
रविवार को आई ताज़ा ख़बरें संकेत देती हैं कि जम्मू-कश्मीर बीजेपी के मुख्य सदस्यों को हाईकमान ने मंगलवार को दिल्ली बुलाया है.
इस दौरान वे राज्य के राजनीतिक माहौल और आगामी विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी की तैयारियों पर चर्चा करेंगे.
यानी कुछ तो पक रहा है और उसके लक्षण भी ठीक नहीं लग रहे.
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