कर्नाटक: क्या टूटने की ओर बढ़ रहा है जनता दल सेक्युलर?

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बेंगलुरु से बीबीसी हिंदी के लिए
क्या कर्नाटक में जनता दल सेक्युलर के विधायक भारतीय जनता पार्टी को समर्थन देने के लिए वही राह पकड़ने वाले हैं जो गोवा में कांग्रेस के विधायकों ने पकड़ी थी?
भले ही इसमें समय लग सकता है मगर जनता दल सेक्युलर की ओर से आ रहे संकेत तो इसी ओर इशारा करते हैं.
इसके संकेत तो तभी से आने लगे थे जब राज्य में लोकसभा चुनाव के लिए मतदान संपन्न हो गया था और नतीजे आने के लिए लगभग एक महीने का समय था.
उस समय जेडीएस-कांग्रेस की गठबंधन सरकार के एक मंत्री ने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि मैसुरु के कुछ गांवों में जनता दल सेक्युलर के कार्यकर्ता कांग्रेस के साथ गठबंधन किए जाने से नाराज़ हैं.
उनके मुताबिक इन कार्यकर्ताओं ने बीजेपी के लिए प्रचार किया है और वोट भी उसी को दिए हैं. ये मंत्री अब पूर्व मंत्री बन चुके हैं और इनका नाम है जीटी देवेगौड़ा.

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जेडीएस में हलचल
अब जीटी देवेगौड़ा ने कहा है कि भविष्य की रणनीति बनाने के लिए बुलाई गई जनता दल सेक्युलर विधायक दल की बैठक में दो तरह के सुझाव आए हैं.
उन्होंने कहा, "कुछ विधायकों को लगता है कि पार्टी को भारतीय जनता पार्टी सरकार की जन-विरोधी नीतियों का विरोध करते हुए विधानसभा में प्रभावी विपक्ष की भूमिका निभानी चाहिए. जबकि दूसरे धड़े ने सुझाया कि हमें बीजेपी सरकार का समर्थन करना चाहिए."
कर्नाटक में वर्तमान हालात के कारण ही यह हृदय परिवर्तन हुआ है कि बीजेपी से लड़ने के लिए धर्मनिरपेक्ष गठबंधन में शामिल होने वाले अब बीजेपी में शामिल होने पर विचार करने लगे हैं.
गठबंधन सरकार गिरने के बाद बीजेपी राज्य में अपने सबसे बड़े नेता बी.एस. येदियुरप्पा के नेतृत्व में सरकार बनाने में क़ामयाब रही है.

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येदियुरप्पा को सोमवार को सदन में विश्वासमत हासिल करना है. बीजेपी अपने 106 विधायकों को लेकर तो आश्वस्त है मगर उसे छह और सदस्य चाहिए होंगे ताकि 222 सदस्यों वाले सदन में वह आसानी से बहुमत साबित कर सके.
सदन में बहुमत का आंकड़ा घट इसलिए गया है क्योंकि स्पीकर ने पहले तीन और बाद में 13 विधायकों को दल बदल निरोधक कानून के तहत अयोग्य ठहरा दिया है. ऐसे में भारतीय जनता पार्टी की सरकार उसी स्थिति में फंस जाएगी, जिसमें कांग्रेस-जेडीएस की सरकार फंसी थी.

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सदन में सदस्यों की संख्या घट जाएगी और ख़ाली जगहों को भरने के लिए उपचुनाव करवाने में कम से कम छह महीने का समय लगेगा.
क्या कर रहा है जेडीएस नेतृत्व
अपनी पार्टी के नेता जीटी देवेगौड़ा के बयान को लेकर जेडीएस प्रमुख और पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा ने अपने ही अंदाज़ में स्थिति संभालने की कोशिश की.
उन्होंने कहा, "विधानसभा में हमारे 34 विधायक हैं. हम सकारात्मक विपक्ष की भूमिका निभाएंगे. जीटी देवेगौड़ा अपने विचार रखने के लिए स्वतंत्र हैं."
इस बीच देवेगौड़ा ने यह भी कहा है कि उनकी पार्टी उस वित्त विधेयक को पारित करने का समर्थन करेगी, जिसे 30 जुलाई तक पास करना ज़रूरी है.
मगर राजनीतिक विश्लेषक महादेव प्रकाश ने बीबीसी हिंदी को बताया को बताया कि उन्हें लगता है कि एचडी देवेगौड़ा यह कहकर मामले को घुमाने की कोशिश कर रहे हैं.

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प्रकाश मानते हैं, "यहां गोवा जैसे हालात पैदा होंगे. जेडीएस का टूटना तय है. कांग्रेस के साथ गठबंधन को लेकर विधायकों में नाख़ुशी रही है. हो सकता है कि विभाजन उस समय न हो जब येदियुरप्पा विश्वात मत हासिल करने की कोशिश कर रहे होंगे. मगर कुछ विधायक सोमवार को शायद सदन का बहिष्कार करेंगे."
महादेव प्रकाश मानते हैं, "दरअसल जेडीएस के विधायक कुमारस्वामी और उनके भाई एचडी रेवन्ना के तौर-तरीक़े से भी नाख़ुश हैं. उनमें से कई पहले से कहते रहे हैं कि उन्हें पार्टी से नहीं बल्कि परिवार से दिक्कत है."
मगर यह भी सच है कि पहले के जनता दल का नया अवतार जनता दल सेक्युलर कांग्रेस विरोधी वोटों का प्रतिनिधित्व करता रहा है.

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कर्नाटक के दक्षिणी हिस्से में जेडीएस ने कब्ज़ा रहा था, जहां पर एचडी देवेगौड़ा के वोक्कालिगा समुदाय का प्रभुत्व है. मगर मई 2019 में लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस और जेडीएस के गठबंधन के कारण बीजेपी को इस जगह पर जड़ें जमाने का मौक़ा मिल गया. था
अगर आने वाले दिनों या हफ़्तो में जेडीएस में टूट होती है तो उससे कर्नाटक में कांग्रेस विरोधी वोटों का एकीकरण होगा. और इस बार फ़ायदा जेडीएस को नहीं, बीजेपी को होगा.
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