मोहम्मद रफ़ी ने जब मौलवियों के कहने पर छोड़ दिया था गाना

- Author, प्रदीप सरदाना
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार एवं फिल्म समीक्षक
करीब चार साल पहले बाल कलाकार के रूप में फिल्मों में प्रवेश करने वाली एक मुस्लिम अभिनेत्री ज़ायरा वसीम ने हाल ही में फिल्म लाइन छोड़ने का एलान करते हुए जो सब कहा है, उसका आशय यह है कि इस्लाम के अनुसार फिल्मों में काम करना गलत है.
उनके अल्लाह को ये मंजूर नहीं. फिल्मों में काम करने से मेरे ईमान में दखलंदाज़ी हो रही थी. इससे मेरे मजहब के साथ मेरा रिश्ता खतरे में पड़ गया.
ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि किसी कलाकार ने आध्यात्मिक या धार्मिक वजहों से फ़िल्मी दुनिया से किनारा करने का फ़ैसला लिया हो.
इस फेहरिस्त में विनोद खन्ना का नाम लिया जाता है. वो कामयाबी के शिखर पर थे जब उनकी ज़िंदगी में ओशो में आए.
विनोद खन्ना ने ओशो से दीक्षा ली और उनके आश्रम के गार्डन में माली का काम करने के लिए तैयार हो गए. ऐसा ही कुछ मोहम्मद रफी के साथ भी हुआ था.
एक बार हरदिल अज़ीज़ और महान गायक मोहम्मद रफी ने भी मौलवियों के कहने पर तब फिल्मों में गाना बंद कर दिया था, जब वह अपने करियर के शिखर पर थे.

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जब रफ़ी ने भी मौलवियों के कहने पर छोड़ दिया था गाना
लेकिन यह तो अच्छा हुआ कि जल्द ही रफी साहब को यह एहसास हो गया कि फिल्मों में गाना कहीं से भी ग़लत नहीं है.
वरना दुनिया ऐसे सैकड़ों नगमों से महरूम रह जाती जो उन्होने एक ब्रेक के बाद फिर से गाए.
यह बात तब की है जब मोहम्मद रफी साहब हज पर गए तो उन्हें कहा गया कि अब आप हाजी हो गए हैं. इसलिए अब आपको गाना-बजाना सब बंद कर देना चाहिए.
रफी साहब एक सीधे-सच्चे और बेहद शरीफ इंसान थे. वह लोगों की बातों में आ गए और उन्होंने गाना छोड़ दिया. जिससे फिल्मी दुनिया में हड़कंप मच गया.
जिस गायक की दीवानगी लोगों के सिर चढ़ कर बोल रही थी, वह अचानक गाना बंद कर दे, तो उनके प्रशंसकों के दिल पर क्या बीतेगी, यह कल्पना की जा सकती है.
हालांकि आज भारतीय फिल्म संगीत की इस बड़ी घटना के बारे में ज़्यादातर लोगों को कुछ पता नहीं है.
कुछ लोग इस घटना को अफवाह बताते हैं और कुछ कहते हैं ऐसा कुछ हुआ ही नहीं था.
यहाँ तक रफी जिन मशहूर संगीतकार जोड़ी कल्याणजी आनंदजी के साथ बरसों गाते रहे. जिनके साथ रफी ने 'सारे शहर में आपसा कोई नहीं' और 'वादा करले साजना' जैसे कितने ही सुपर हिट गीत दिए, उन्हें भी ऐसी कोई घटना याद नहीं कि रफी साहब ने कभी इस्लाम के आधार पर गाना छोड़ दिया था.
इस जोड़ी में अब मौजूद आनंद जी से जब मैंने इस संबंध में बात की तो वह बोले, "मुझे तो ऐसी घटना याद नहीं आ रही कि उन्होंने किसी मौलवी के कहने पर गाना छोड़ दिया हो. हमारे साथ तो वह अंत तक गाते रहे."

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शाहिद रफ़ी बताते हैं हक़ीक़त
लेकिन जब इस घटना का सच जानने के लिए मैंने रफ़ी साहब के बेटे शाहिद रफ़ी से बात की तो उन्होंने इस घटना को सच बताते हुए बाक़ायदा पुष्टि की.
शाहिद रफ़ी साहब मेरे पूछने पर बताते हैं, "जी यह सच है, रफ़ी साहब ने इस्लाम की बात पर एक बार फ़िल्मों में गाना बंद कर दिया था. लेकिन अल्लाह का शुक्र है कि उन्होंने कुछ समय बाद अपने फ़ैसले को बदल दिया और सभी ने राहत की सांस ली."
क्या यह तभी की बात है जब वह हज से लौटे थे और उनको मौलवियों ने अब फ़िल्मों के गीत संगीत से दूर रहने की सलाह दी?
यह पूछने पर शाहिद रफ़ी बताते हैं, "जी बिल्कुल, उन्होंने ऐसा फ़ैसला किया था. मसले कुछ ऐसे बन गए थे. यह सन 1971 की बात है, रफ़ी साहब और हमारी अम्मा दोनों हज पर गए थे. जब वह वहाँ से लौटने लगे तो वहाँ के मौलवियों ने ही उन्हें कहा कि अब आप हाजी हो गए हैं. इसलिए अब आपको फ़िल्मों में नहीं गाना चाहिए. इसके बाद उन्होंने देश लौटकर गाने गाना बंद कर दिया."
तब कितने समय तक रफ़ी साहब ने गाने नहीं गाए और क्या नौशाद साहब के समझाने पर ही उन्होंने फिर से गाना शुरू किया?
इस पर शाहिद रफ़ी बताते हैं, "कितने समय तक गाना नहीं गाया यह तो पूरा याद नहीं. लेकिन यह पता है कि उनको नौशाद साहब ने भी समझाया, कुछ और लोगों ने भी और मेरे बड़े भाइयों ने भी समझाया. उनके गाना बंद करने से घर परिवार का ख़र्च चलना बंद हो जाना था."
"तब भाइयों ने कहा कि आपका गला ही परिवार के रोज़गार का ज़रिया है. अब आप न कोई नौकरी कर सकते हैं और न कोई बिज़नेस और न कुछ और. बस अल्लाह ने जो गला दिया है, जो इतनी ख़ूबसूरत आवाज़ बख़्शी है, वही सब कुछ है. इसलिए आप फ़िल्मों में फिर से गाइए. तब रफ़ी साहब ने एक ब्रेक के बाद फिर से फ़िल्मों में गाना शुरू किया."

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रफी ने रिकॉर्डिंग बंद कर दी थी...
उधर, पुराने फ़िल्म प्रचारक रहे और रफ़ी साहब पर 'एक फ़रिश्ता था वो' और 'वो जब याद आए' जैसी पुस्तक लिख चुके धीरेन्द्र जैन बताते हैं, "नौशाद साहब ने ही मुझे बताया था कि रफ़ी साहब ने हज से लौटकर फ़िल्मों में गाना बंद कर दिया था. हज से लौटकर क़रीब कई महीने तक रफ़ी साहब ने किसी गीत की रिकॉर्डिंग नहीं की थी. उनको मौलवियों ने कहा था कि हज के बाद नाचना गाने की इजाज़त हमारे दीन धर्म में नहीं है, इसलिए आप अब गाना बंद कर दीजिए."
जैन आगे बताते हैं, "तब नौशाद साहब ने उन्हें समझाया कि यह गाना छोड़ कर ग़लत कर रहे हो मियां. ईमानदारी का पेशा कर रहे हो, किसी का दिल नहीं दुखा रहे. यह भी एक इबादत है. अब बहुत हो गया, अब गाना शुरू कर दो. तब रफ़ी साहब ने फिर से गाना शुरू कर दिया."
आज भी रफ़ी साहब किस तरह देश दुनिया में लोगों के दिल में बसे हैं, वह सब किसी से छिपा नहीं है. रफ़ी साहब के इंतक़ाल को अगले साल जुलाई में 40 बरस हो जाएँगे. लेकिन रफ़ी के गीत आज भी उतने लोकप्रिय हैं, जितने उनके रहते थे.
कोई उनसे आगे या उनकी बराबरी तो क्या उनके ज़्यादा क़रीब भी नहीं पहुँच सका. ये तो भला हो नौशाद साहब का और रफ़ी साहब के बेटों का जिनकी सलाह मान उन्होंने फिर से गाना शुरू किया और अपनी वापसी के बाद क़रीब 8 साल तक वह लगातार गीत गाते रहे.
नौशाद के साथ था रफ़ी का मज़बूत रिश्ता
मोहम्मद रफ़ी ने अपने करियर की शुरुआत 1944 में ही कर दी थी. रफ़ी लाहौर से नौशाद के वालिद की ही चिट्ठी लेकर नौशाद के पास मुंबई आए थे.
तभी नौशाद, रफी से शुरुआत से ही कोरस से लेकर थोड़े बहुत युगल गीत तक गँवाते रहे. लेकिन फ़िल्म के हीरो के लिए आवाज़ देने का मौक़ा उन्होंने भी रफ़ी को काफ़ी बाद में दिया. इससे पहले उन्होंने रफ़ी से फ़िल्म 'मेला' (1948) का सिर्फ़ एक शीर्षक गीत गवाया- 'ये ज़िंदगी के मेले', जो सुपर हिट हो गया.
इसके बाद तो रफ़ी, नौशाद के ही नहीं और भी कई संगीतकारों के प्रिय बनते चले गए. लेकिन नौशाद के साथ रफ़ी ने शास्त्रीय संगीत पर आधारित जो गीत गाए उनका कोई मुक़ाबला नहीं.
इसके अलावा 'मधुबन में राधिका नाचे रे', 'कोई सागर दिल को बहलाता नहीं', 'कल रात ज़िंदगी से मुलाक़ात हो गयी', 'आज की रात मेरे दिल की सलामी' और 'आज पुरानी राहों से कोई मुझे आवाज़ न दे', भी उन 150 गीतों में से कुछ हैं जो उन्होंने नौशाद के निर्देशन में गाए.

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ब्रेक से पहले ज़बरदस्त लोकप्रिय थे रफ़ी
1971 में जब रफ़ी हज पर गए थे तब उनकी पहचान देश के सर्वाधिक लोकप्रिय और सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक के रूप में हो गई थी. उनकी इस बड़ी पहचान में सबसे बड़ी भूमिका रही, नौशाद के संगीत में 1952 में प्रदर्शित फ़िल्म 'बैजू बावरा' के दो गीतों की.
ये गीत थे- 'ओ दुनिया के रखवाले' और 'मन तड़पत हरि दर्शन को आज'. रफ़ी ने राग दरबारी और राग मालकौंस पर आधारित अपने आरोह अवरोह की जो बानगी पेश की वह आज भी अनुपम है.

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हज जाने से पहले मिल गए थे 5 फ़िल्मफेयर
रफ़ी साहब को अपने करियर में कुल 6 फ़िल्मफेयर पुरस्कार मिले. जिनमें 5 पुरस्कार उनको हज जाने से पहले 1968 तक मिल गए थे. वे गीत थे- 'चौदहवीं का चाँद हो तुम', 'तेरी प्यारी प्यारी सूरत को', 'चाहूँगा मैं तुझे साँझ सवेरे', 'बहारों फूल बरसाओ' और 'दिल के झरोखे में तुझको बिठाकर'.
इन गीतों के अलावा रफ़ी तब तक जिन और अनेक गीतों से लोकप्रिय हुए थे उनमें कुछ गीत ये भी हैं- 'ये महलों ये तख्तों ये ताजों की दुनिया', 'खोया खोया चाँद', 'टूटे हुए ख्वाबों ने', 'ये चाँद सा रोशन चेहरा', 'छलकाए जाम', 'आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे', 'बड़ी मस्तानी है मेरी महबूबा', 'लिखे जो खत तुझे', 'तेरी आँखों के सिवा', 'बदन पे सितारे लिपेटे हुए', 'रात के हमसफर', 'ये रेशमी ज़ुल्फें', 'कौन है जो सपनों में आया', 'मैं कहीं कवि न बन जाऊं', 'ये मेरा प्रेमपत्र पढ़के', 'यूं ही तुम मुझसे बात करती हो' और 'ये दुनिया ये महफ़िल मेरे काम की नहीं.'

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वापसी पर भी दिए कई यादगार गीत
हज से वापसी के एक अंतराल के बाद रफ़ी ने फिर से फ़िल्मों में गीत गाना शुरू किया तब भी उन्होंने एक से एक सुंदर गीत अपने श्रोताओं को दिए.
यहाँ तक कि 1977 में आई फ़िल्म 'हम किसी से कम नहीं' के एक गीत 'क्या हुआ तेरा वादा' के लिए रफ़ी को पहली बार सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला. साथ ही इसी गीत के लिए उन्हें छठी बार फ़िल्मफेयर पुरस्कार पाने का मौक़ा भी मिला.
अपनी इस वापसी के बाद रफ़ी ने 'हम किसी से कम नहीं' के साथ 'यादों की बारात', अभिमान, बैराग, लोफ़र, हवस, दोस्ताना, अदालत, अमर अकबर एंथनी, कुर्बानी और क़र्ज़ जैसी कई फ़िल्मों के लिए बहुत से यादगार गीत गाए. जिनमें 'दर्द ए दिल दर्द ए जिगर', 'तेरी गलियों में न रखेंगे क़दम', 'क्या देखते हो', 'तेरी बिंदिया रे', 'चुरा लिया है तुमने जो दिल को', 'चाँद मेरा दिल', 'पीते पीते कभी कभी यूं जाम', 'आज मौसम बड़ा बेईमान है' और 'तुमसे दूर रहके हमने जाना प्यार क्या है'.
ज़ाहिर है यदि रफ़ी साहब अपने फ़ैसले को नहीं बदलते तो शायद फ़िल्म संगीत का अनमोल ख़ज़ाना इतना समृद्ध और रफ़ी साहब के सुरीले संगीत का शानदार सफ़र भी अधूरा सा लगता.
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