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ईरान को क्यों तबाह करना चाहता है अमरीका?
अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने कहा है कि वो ईरान के तीन ठिकानों पर हमला करने के लिए पूरी तरह से तैयार थे, लेकिन हमला होने के सिर्फ़ 10 मिनट पहले उन्होंने अपना फ़ैसला बदल दिया.
एनबीसी मीट द प्रेस कार्यक्रम में उन्होंने इसका कारण बताया, "मैंने पूछा कि हमले में कितने लोग मारे जाएंगे. सेना के जनरल ने पहले मुझसे थोड़ा समय मांगा और फिर मुझे बताया कि क़रीब डेढ़ सौ लोगों की मौत होगी. मैंने इस पर फिर से सोचा. मैंने कहा कि उन्होंने एक मानव रहित ड्रोन को उड़ा दिया है और इसके जवाब में हम आधे घंटे में 150 मौतों के ज़िम्मेदार होंगे. मैंने कहा हमला रोक दो."
मामला कुछ ऐसा है कि गुरुवार को ईरान ने एक अमरीकी ड्रोन को मार गिराया था. ईरान का दावा है कि अमरीकी ड्रोन ईरानी हवाई क्षेत्र में था जबकि अमरीका इस दावे को ग़लत बताता है. ईरान ने ये भी कहा कि कम से कम 35 लोगों को लेकर जा रहा अमरीका का एक विमान ईरानी हवाई क्षेत्र के बिल्कुल नज़दीक से होकर गुज़रा था लेकिन उन्होंने तनाव न बढ़ाने के लिए उस पर हमला नहीं किया.
ट्रंप का कहना है कि परमाणु संधि से अमरीका के बाहर जाने और प्रतिबंध लगने से ईरान पहले ही काफी कमज़ोर हो चुका है और अमरीका ईरान से युद्ध नहीं करना चहता.
बीबीसी संवाददाता मानसी दाश ने अमरीका के डेलावेयर विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर मुक्तदर ख़ान से बात की और उनसे पूछा कि क्या वाकई युद्ध की स्थिति बन रही है या फिर इसका नाता अमरीका में होने वाले राष्ट्रपति चुनावों से है यानी इसका फ़ायदा ट्रंप चुनावों में उठा सकते हैं.
प्रोफ़ेसर मुक्तदर ख़ान ने बताया कि शुरू से ही ट्रंप प्रशासन का एजेंडा रहा है कि ईरान को कंट्रोल किया जाए. मध्य पूर्व में बढ़ता प्रभाव, यमन में हुती विद्रोहियों को ईरान के सपोर्ट को अमरीका सख्त ना पसंद करता है.
अमरीका में दो चीजें हैं, जब साल 1979 में ईरान में क्रांति आई थी तो वहां लगभग 400 दिनों तक अमरीकी दूतावास में अमरीकियों को बंधक बनाकर रखा लगा था इससे अमरीका में ईरान विरोधी भावनाएं काफ़ी प्रबल हो गई.
दूसरा इसराइल की भी लॉबिंग अमरीका में बेहद मजबूत है, फ़लीस्तीन के मसले को ध्यान से हटाने के लिए इसराइल ने इस बात पर ज़ोर दिया कि ईरान के परमाणु हथियार पूरे देश के लिए खतरा हैं. इसराइल के अरबपति अमरीकी चुनाव में पैसे लगाते हैं, 2016 राष्ट्रपति चुनाव में भी इसराइल ने रिपब्लिकन को पैसे दिए थे. इज़रायल का भी एजेंडा एंटी-ईरान रहा है.
ईरान में सत्ता परिवर्तन चाहता है अमरीका?
अब इज़राइल के मध्य पूर्व में अपना वर्चस्व स्थापित करने का एक ही ख़तरा है और वो है ईरान. तो इज़राइल चाहता है कि अमरीका ही ईरान को ख़त्म कर दे.
अमरीका ईरान पर दो-तीन ऑपरेशन कर चुका है जिसमें से एक साइबर अटैक था. 1990 से 1993 में जब भी ईरान कोई न्यूक्लियर टेस्ट तो इज़राइल की उस पर प्रतिक्रिया आती थी. उस वक्त की खबरों को देखें तो पता चलता है कि इज़राइल को लगता था कि ईरान बम बना कर उन पर हमला कर देगा. लेकिन सोचने वाली बात है कि अगर ईरान इज़राइल पर हमला कर भी देता तो वह खुद जवाबी कार्रवाई में बर्बाद हो जाता.
ईरान के पास उस तकनीक की कमी है जिससे वो यूरेनियम को एनरिच कर सके यानी यूरेनियम को परमाणु हथियार में तब्दील करने के लिए उसे 90 फ़ीसदी तक रिफ़ाइन करना पड़ता है. ईरान तो कभी 20 फ़ीसदी भी इसका शोधन नहीं कर सका. वहीं इज़राइल के पास 200 परमाणु हथियार हैं.
एक बड़ी वजह ये भी है कि अमरीका चाहता है कि ईरान में सत्ता परिवर्तन हो. 1953 में जब ईरान लोकतांत्रिक देश बना था तो तत्कालीन प्रधानमंत्री ने देश के ऑयल फ़ील्ड का राष्ट्रीयकरण कर दिया था. उस वक्त अमरीका ने वहां तख्तापलट किया और लोकतंत्र को बादशाहियत में बदल दिया और ईरान की कमान मोहम्मद रज़ा पहलवी के हाथों में आ गई. चूंकि वह अमरीका की मदद से सत्ता में थे तो वो हमेशा अमरीका का समर्थन करते रहे.
लेकिन ईरान में 1979 की क्रांति के बाद हालात बदल चुके हैं, शिया ट्रांसफ़ॉर्मेशन के बाद अब ईरान मध्य-पूर्व में काफ़ी शक्तिशाली हो चुका है और अमरीका के लिए चैलेंज बन गया है.
अमरीका चाहता है कि वहां फिर सत्ता परिवर्तन हो और अमरीका का समर्थन करने वाला नेता तेहरान की गद्दी पर बैठे. वह चाहता है कि जैसे सउदी अरब, पाकिस्तान, पहले तुर्की अमरीका के साथ रहते थे वैसे ही तेहरान भी अमरीका की ओर झुकाव रखे.
पहले अमरीका ने सोचा कि व्यापार प्रतिबंध लगा कर ईरान को क़ाबू किया जाए लेकिन अब जब बात नहीं बन रही है तो अमरीका ईरान को कष्ट देना चाहता है ताकि वहीं की जनता इन हालात से तंग आकर अपने नेता के खिलाफ़ खुद विद्रोही हो जाए और जनता ही तख्तापलट की शुरुआत करे.
भारत पर इसका असर पड़ेगा
पिछले कुछ दिनों में भारत ने ये साफ़ कर दिया है कि वह ईरान से तेल नहीं खरीदेगा. लेकिन भारत इसे कैसे रिप्लेस करेगा इसकी कोई साफ़ तस्वीर सामने नहीं पेश की गई है.
ये तो तय है कि अगर इस क्षेत्र में युद्ध होगा तो इसका असर सभी पर पड़ेगा. खास कर यहां पड़ने वाले देशों में तेल की भारी किल्लत हो सकती है. पिछले हफ्ते टैंकर हमले के बाद से ही कीमतों में इज़ाफ़ा होने लगा था.
अमरीका को इससे कोई नुकसान नहीं होगा. वो मध्य-पूर्व से तेन लेना बंद कर चुका है और वह खुद अपनी ज़रुरत से ज्यादा तेल का उत्पादन कर लेता है. अमरीका के पास एक सा का ऑयल रिज़र्व है. लेकिन बाकी देशों की अर्थव्यवस्था थप्प हो जाएगी. वैश्विक संकट की स्थिति पैदा हो जाएगी.
अमरीका की सबसे मुखर हो कर आलोचना जर्मनी ने की है, वहीं रूस और चीन ने दबी आवाज़ में ही सही कहा है कि अमरीका को ऐसे कदम नहीं उठाने चाहिए.
लेकिन समझना होगा कि अमरीका में अहम पदों पर बैठे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन और विदेश मंत्री माइक पोम्पियो दोनो ही ईरान विरोधी है.
खासकर जॉन बोल्टन का एक अहम मक़सद है कि वो ईरान को कंट्रोल करें और यहां सत्ता परिवर्तन हो.
ऐसे में ये स्थिति बहुत नाज़ुक है क्योंकि अगर किसी के भी संयम खोने से जंग छिड़ेगी तो ये सबका नुकसान होगा.
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