महाराष्ट्र: कांग्रेस के पंजे में दोबारा जान आएगी?

    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवददाता दिल्ली

महाराष्ट्र कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को उम्मीद है कि पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव में युवाओं को प्राथमिकता देगी. राज्य में पार्टी के निचली सतह के लोगों से बातें करने के बाद अंदाज़ा होता है कि लोकसभा में बुरी तरह से पिटने के बाद कार्यकर्ताओं का मनोबल टूट सा गया है.

लेकिन वो विधानसभा में अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं. मुंबई की महिला कांग्रेस की भावना जैन कहती हैं, "मुझे लगता है कि राहुल गांधी प्रदर्शन के आधार पर पार्टी में सुधार लाएंगे. वह आगामी विधानसभा चुनाव में युवाओं को मौक़ा देने के लिए दृढ़ हैं."

मुंबई के ही नितिन शिंडे कहते हैं कि पार्टी के नेताओं में ताल-मेल की कमी से लोकसभा चुनाव में इतनी बुरी तरह से हार हुई. "राज्य के बड़े नेताओं के बीच बहुत कम ताल-मेल था. उम्मीदवारों के चयन से लेकर चुनावी मुहिम की योजना तक में बड़े नेताओं में आपसी मतभेद था. हम चाहते हैं कि पार्टी विधानसभा में युवा नेताओं को बड़े फ़ैसले लेने दे."

133 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी की अपने जन्मस्थान मुंबई में हालत बुरी है. पिछले आम चुनाव में नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने कांग्रेस-मुक्त भारत का वादा किया था. पांच साल बाद हुए आम चुनाव में पार्टी 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में अपना खाता भी खोल नहीं पायी.

आगामी लोकसभा सत्र में सुरेश उर्फ़ बालू धानोरकर महाराष्ट्र से कांग्रेस पार्टी के अकेले जलते चिराग़ होंगे. उन्होंने चंद्रपुर लोकसभा चुनावी क्षेत्र से केंद्रीय मंत्री हंसराज अहीर को हरा कर कांग्रेस पार्टी के लिए राज्य में अकेली सीट हासिल की. दिलचस्प बात ये है कि चुनाव से पहले वो शिव सेना के विधायक थे और उनकी उम्मीदवारी पक्की नहीं थी.

सच तो ये है कि महाराष्ट्र में कांग्रेस पार्टी का खाता ही नहीं खुलता, क्योंकि शुरू में पार्टी आला कमान ने धानोरकर का नाम उम्मीदवारों की लिस्ट से ख़ारिज कर दिया था. राज्य के नेताओं के हस्तक्षेप के बाद उनका नाम लिस्ट में दोबारा शामिल किया गया.

महाराष्ट्र में कांग्रेस की ये सबसे ख़राब हार थी और लगातार दूसरी भारी शिकस्त. पिछले आम चुनाव में इसे राज्य में केवल दो सीटें मिली थीं. कांग्रेस पार्टी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के गठबंधन ने पहली बार लोकसभा चुनाव एक साथ मिल कर लड़ा था लेकिन दोनों 48 में से केवल पांच सीटें जीत सकीं.

अब सब की निगाहें अक्तूबर में होने वाले महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव पर टिकी हैं. पिछली बार कांग्रेस और एनसीपी अलग-अलग चुनाव लड़ी थीं और उन्हें 42 और 41 सीटें मिली थीं जबकि बीजेपी को 122 और शिव सेना को 63. बीजेपी और शिव सेना ने गठबंधन करके सत्ता हासिल कर ली. पंद्रह साल में ये कांग्रेस-एनसीपी की पहली हार थी.

इस बार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को एक बार फिर से बीजेपी और शिवसेना का सामना करना पड़ेगा. भावना जैन कहती हैं कि विधानसभा चुनाव से आम चुनाव अलग होता है.

वे कहती हैं, "महाराष्ट्र में किसान बेहाल हैं, युवाओं के पास नौकरियां नहीं हैं, विकास रुक गया है. ये मुद्दे आम लोगों से जुड़े हैं. इन मुद्दों को लेकर हम एक बार फिर जनता के पास जाएंगे."

यवतमाल के एक किसान गौतम शिर्के कहते हैं कि उनके गांव के काफ़ी लोगों ने आम चुनाव में बीजेपी को वोट दिया था लेकिन उनके अनुसार विधानसभा चुनाव में स्थानीय मुद्दों पर वोट दिए जाएंगे.

लेकिन एनसीपी के नेता और वकील मजीद मेमन के अनुसार विधानसभा की तैयारी से पहले लोकसभा में हुई ग़लतियों को सुधारना होगा. "इस चुनाव में (लोकसभा) कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन नहीं किया."

ग़लतियों की बात करें तो एक बात पर सभी सहमत हैं कि जनता ने न केवल महाराष्ट्र में बल्कि देश भर में मोदी को वोट दिया. मोदी लहर के आगे कांग्रेस और एनसीपी की रणनीति ने काम नहीं किया. लेकिन विश्लेषक कहते हैं कि कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन से भी कई चूक हुई."

राजनीतिक विश्लेषक सुहास पल्शिकर कहते हैं कि कांग्रेस संगठन के तौर पर राज्य में काफ़ी कमज़ोर है जिससे इसे नुक़सान हुआ. उनके अनुसार कांग्रेस में चुनाव के समय "कई नेता इससे जुड़ने लगते हैं और चुनाव के बाद नज़र नहीं आते. ऐसे नेताओं को वो "कचड़ा" कहते हैं और उनकी सफाई पर ज़ोर देते हैं.

लोकसत्ता के संपादक गिरीश कुबेर के अनुसार कांग्रेस के नेता राहुल गाँधी का राज्य में पार्टी के नेताओं ने उस तरह से साथ नहीं दिया जिसकी उन से उम्मीद की जा रही थी.

पिछले आम चुनाव की तरह इस बार भी एनसीपी ने चार सीटें हासिल कीं. विश्लेषक ये कहते हैं कि कांग्रेस के साथ गठबंधन के समय एनसीपी कह सकती है कि वो कांग्रेस से बड़ी पार्टी है इसलिए वो इससे अधिक सीटों पर चुनाव लड़ेगी. एनसीपी और कांग्रेस के नेताओं के बीच इस बारे में अभी चर्चा नहीं हुई है लेकिन ये मुद्दा उठ सकता है.

लेकिन इस बार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और एनसीपी के बीच गठबंधन बना भी तो चुनाव जीतना आसान नहीं होगा. प्रकाश आंबेडकर के पिछड़े वर्गों पर आधारित नए दल वंचित बहुजन अघाड़ी (वीबीए) ने लोकसभा चुनाव में एक सीट हासिल की और इसे लगभग 10 प्रतिशत वोट मिले. इसका प्रदर्शन कांग्रेस से थोड़ा ही कम था. ये दल कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को कम से कम सात सीटों पर हार का कारण बना.

नांदेड़ इसका एक उदाहरण है जो राज्य के कांग्रेस अध्यक्ष अशोक चौहान का निर्वाचन क्षेत्र था, जिसे उन्होंने 2014 की मोदी लहर में बचाने में कामयाबी हासिल की थी. इस बार वो 40,000 से कुछ अधिक वोटों से हार गए. यहाँ अशोक चौहान ने 4,42,138 मत प्राप्त किए, जबकि VBA ने 1,65,341 वोट लिया. वीबीए वोटों के साथ, कांग्रेस के पास 6,07,479 वोट हो सकते थे और बीजेपी के प्रताप चिकलिकर को हरा सकते थे जिन्होंने 4,82,148 वोट हासिल किए.

भावना जैन कहती हैं, "प्रकाश आंबेडकर का मक़सद ही था चुनाव में भाग लेकर कांग्रेस को हराना."

कांग्रेस के कार्यकर्ताओं से लेकर सियासी विश्लेषक सभी ये मानते हैं कि अगर विधान सभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करना है तो कांग्रेस में युवाओं को चांस देना होगा और एनसीपी से गठबंधन अनिवार्य होगा.

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