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अशोक गहलोत के ख़िलाफ़ राजस्थान में बढ़ी बग़ावत
- Author, नारायण बारेठ
- पदनाम, जयपुर से बीबीसी हिंदी के लिए
राजस्थान में चुनावी हार के बाद सत्तारूढ़ कांग्रेस की अंतर्कलह सतह पर आ गई है. राज्य के खाद्य मंत्री रमेश मीणा ने हार के कारणों का पता लगाने की मांग की है.
उधर कृषि मंत्री लाल चंद कटारिया ने इस्तीफ़े की पेशकश कर दी है. पार्टी का एक वर्ग मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पुत्र के चुनाव लड़ने पर सवाल उठा रहा है. राज्य में लोकसभा की सभी 25 सीटों पर कांग्रेस को हार का मुँह देखना पड़ा है.
मुख्यमंत्री गहलोत के चुनाव क्षेत्र सरदारपुरा और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट के टोंक विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा है.
ख़बरें है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने पार्टी कार्यसमिति की बैठक में इस बात पर नाराज़गी ज़ाहिर की है कि मुख्यमंत्री गहलोत ,मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री कमलनाथ और पूर्व केंद्रीय मंत्री चिदंबरम ने पार्टी संगठन से ज़्यादा अपने अपने पुत्रों को तवज्जो दी. इसके बाद पार्टी में कलह और तेज़ हो गई.
खाद्य मंत्री मीणा ने बीबीसी से कहा, "वे किसी एक नेता के बारे में नहीं कह रहे हैं. बल्कि पराजय के कारणों की जाँच की बात कह रहे हैं. आख़िर ऐसा क्या हुआ कि पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा और कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत पाई."
राज्य के कृषि मंत्री कटारिया ने सोमवार को अपना इस्तीफ़ा भेज दिया. लेकिन मुख्यमंत्री कार्यालय ने उनके इस्तीफ़े की पुष्टि नहीं की है. कटारिया तब से अपना फ़ोन स्विच ऑफ़ किए हुए हैं.
कृषि मंत्री ने अपने इस्तीफ़े में कहा कि वे अपने क्षेत्र में पार्टी की पराजय से दुखी हुए हैं और त्यागपत्र दे रहे हैं. सहकारिता मंत्री उदय लाल आंजना ने मीडिया से कहा अगर पार्टी समय रहते राष्ट्रीय लोकतान्त्रिक पार्टी के हनुमान बेनीवाल से गठबंधन कर लेती तो कांग्रेस को बहुत लाभ होता.
बीजेपी ने बेनीवाल के लिए नागौर सीट छोड़ दी थी और बदले में बेनीवाल की पार्टी ने अपने प्रभाव क्षेत्रों में बीजेपी का समर्थन किया था. आंजना ने कहा कि मुख्यमंत्री गहलोत के पुत्र वैभव गहलोत को पार्टी जालौर संसदीय क्षेत्र से मैदान में उतारती तो परिणाम कुछ और होते.
पार्टी का एक वर्ग मुख्यमंत्री गहलोत पर निशाना साधे हुए है. आरोप है कि गहलोत ने अपने पुत्र वैभव के चुनाव क्षेत्र जोधपुर को अधिक समय दिया और इससे पार्टी को नुक़सान हुआ.
कहां-कहां रह गई कमी
ख़बरें ये भी हैं कि पार्टी कार्यसमिति में भी इस पर चर्चा हुई. इस पर गहलोत ने पत्रकारों से कहा, "मीडिया ने संदर्भ से हटा कर ख़बरें प्रकाशित की हैं. जब किसी बात का संदर्भ बदल दो तो उसका अर्थ भी अलग हो जाता है. ये पार्टी का आंतरिक मामला है."
गहलोत ने कहा कि पार्टी प्रमुख राहुल गाँधी को कहने का पूरा अधिकार है कि किस नेता की कहाँ कमी रही और कहाँ निर्णय में चूक हुई. जब परिणामों की समीक्षा हो रही है तो स्वाभाविक है कि वो बताए कहाँ कमी रही है.
राज्य में लोकसभा चुनावों में पराजय के बाद मुख्यमंत्री गहलोत और उप-मुख्यमंत्री पायलट समेत अनेक नेता दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं. इस बीच जयपुर से कांग्रेस प्रत्याशी रहीं ज्योति खंडेलवाल ने आरोप लगाया है कि कुछ नेताओं ने उन्हें हराने के लिए काम किया और इससे बीजेपी को मदद मिली.
खंडेलवाल ने इस बाबत पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को शिकायत की है. खाद्य मंत्री मीणा ने बीबीसी से कहा, "सभी की बराबर की ज़िम्मेदारी है. अभी मैं कह दूँ कि किसी एक विशेष व्यक्ति ने काम नहीं किया तो यह ठीक नहीं होगा. 25 लोक सभा सीट और 200 विधानसभा सीटों पर सभी ने मिल कर काम किया है.
मगर अब हमें ब्लॉक स्तर से लेकर विधानसभा, ज़िला, प्रदेश और सत्ता संगठन सभी स्तर पर विचार करना चाहिए कि कहां क्या कमी रही.
राजस्थान पिछले साल दिसंबर माह में संपन्न विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने 200 में से 99 सीटें जीतकर बीजेपी को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया था. मगर पांच महीने बाद जब लोकसभा चुनाव हुए तो कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा.
राज्य में सियासत पर नज़र रखने वाले स्थानीय पत्रकार अवधेश अकोदिया कहते हैं, "कांग्रेस का प्रदर्शन 2014 के लोकसभा चुनावों से भी ख़राब रहा. पहले यह माना जा रहा था कि अगर चुनाव बेरोज़गारी या किसानों के मुद्दों पर आधारित होगा तो बीजेपी और कांग्रेस में कुछ मुक़ाबला होगा मगर देखते-देखते चुनाव भावनात्मक मुद्दों पर चला गया."
बीजेपी को क्यों हुआ लाभ
अकोदिया कहते हैं, "राष्ट्रवाद केंद्रीय मुद्दा बन गया और इसमें मोदी का चेहरा अहम हो गया. ऐसे में चुनाव का पूरा रंग ही बदल गया. विधानसभा चुनावों में अलग मुद्दे थे. मगर लोकसभा चुनावों में वे मुद्दे पीछे छूट गए और इसका बीजेपी को लाभ मिला.''
राजस्थान में कांग्रेस के नेता मंच और सभा जलसों में अपनी एकता की तस्वीर प्रस्तुत करते रहे. लेकिन हक़ीक़त इससे उलट थी. पार्टी में गुट विभाजन साफ़ दिखाई देता था और इसका पार्टी के प्रदर्शन पर बुरा असर पड़ा.
स्थानीय पत्रकार राजीव जैन कहते हैं, "इन चुनावों में बीजेपी का प्रचार अभियान अधिक संगठित और नियोजित नज़र आया. बीजेपी ने कांग्रेस के मुक़ाबले ज़्यादा अच्छी रणनीति तैयार की और इसका उसे फ़ायदा भी मिला."
जीत का श्रेय लेने के लिए तो बहुत दावेदार होते हैं. लेकिन हार तो यतीम होती है. इसीलिए राज्य की सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी में पराजय के लिए सब एक दूसरे को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं.
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