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लोकसभा नतीजों में 'मोदी सुनामी' के अगले दिन कैसा था कांग्रेस दफ्तर का हाल
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवददाता, दिल्ली के कांग्रेस मुख्यालय से
"एक दिन में माहौल कितना बदला नज़र आ रहा है."
कांग्रेस पार्टी के दिल्ली स्थित मुख्यालय में बैठे एक कैमरामैन ने अपने साथी कैमरामैन से ये बात कही और दोनों हंसने लगे. उनका इशारा 23 मई की सुबह चुनावी नतीजों के शुरुआती रुझान के समय दफ़्तर के अंदर और इसके बाहर जश्न के माहौल की तरफ़ था. लेकिन एक दिन बाद मुख्यालय वीरान पड़ा था
वोटों की गिनती के दौरान एक तरफ़ ढोल-बाजे और नारों की आवाज़ गूँज रही थी और दूसरी तरफ़ कुछ पंडित पार्टी की जीत के लिए हवन कर रहे थे. माहौल इस तरह का बना था जैसे कि पार्टी चुनाव जीतने वाली है.
लेकिन दिन में 2-3 बजे तक आवाज़ें बंद होने लगीं, जश्न का माहौल मायूसी में बदलने लगा और लोगों के चेहरे मुरझाने लगे. कुछ समय बाद हवन भी बंद हो गया. उस समय तक चुनावी रुझान पार्टी के इस क़दर ख़िलाफ़ हो चुके थे कि प्रार्थनाएं और नारे भी वहां मौजूद पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं का मनोबल ऊंचा नहीं कर पा रहे थे.
वीरानी और ताले
मोदी सुनामी के नाम से जाने वाले लोकसभा चुनाव के नतीजों के आने के एक दिन बाद कांग्रेस पार्टी के हेडक्वॉर्टर में मातम सा छाया हुआ था. ऐसा लग रहा था कि आज दफ़्तर में छुट्टी है.
अध्यक्ष राहुल गाँधी के कमरे के दरवाज़े पर एक बड़ा सा ताला लगा हुआ था. उनका कमरा वैसे भी अक्सर बंद रहता है. उनके कमरे से सटा अहमद पटेल का कमरा है. वो भी बंद पड़ा था. सच तो ये है कि सभी बड़े नेताओं के कमरों के दरवाज़े बंद थे.
दोपहर तक भी वहां रोज़ सुबह नज़र आने वाले प्रवक्ताओं में से एक भी मौजूद नहीं था. हाँ, कुछ जिज्ञासु रिपोर्टर और कैमरामैन वहां ज़रूर मौजूद थे. वो एक कमरे में बैठे इस बात का इंतज़ार कर रहे थे कि पार्टी का कोई प्रवक्ता उनसे बात करने के लिए मिल जाए.
थोड़ी देर में मीडिया से डील करने वाली पार्टी की एक शख्सियत अंदर आई. लेकिन वह एक घंटे से अधिक समय से फ़ोन पर इस तरह से चिपके हुए थे मानो वो किसी से बात करने से कतरा रहे हों. जो आपसे रोज़ मिलते थे, वो आज अपना दामन बचाते फिर रहे थे.
सियासी पार्टियों के दफ़्तरों में चाय, समोसों और पकौड़ों का दौर चलता रहता है. कांग्रेस ऑफ़िस में आज कैंटीन तो खुली थी लेकिन वहां खाने-पीने वाले बहुत कम नज़र आए.
कैसे बदलेंगे हालात
मैं उस कमरे में जाकर बैठ गया जहाँ मुट्ठी-भर पत्रकार और कैमरामैन बैठे थे. थोड़ी देर बाद अचानक से हलचल हुई, बाहर से आवाज़ आई कि अशोक गहलोत आए हुए हैं. सभी उस कमरे की तरफ़ भागे लेकिन जब तक मैं वहां मौजूद था, राजस्थान के मुख्यमंत्री बाहर मीडिया से बात करने बाहर नहीं आए थे.
हरी घास वाले लॉन के किनारे अंग्रेज़ों के ज़माने में बनी सफ़ेद इमारत में पार्टी के कार्यालय में जश्न के माहौल कई बार देखे गए हैं. लेकिन 24, अकबर रोड पर पिछले पांच सालों में, यानी 2014 में हुए आम चुनाव में करारी हार के बाद, ऐसे कम ही मौक़े आए होंगे जब धूमधाम और धमाकेदार हलचल देखने को मिली हो.
पिछले साल दिसंबर में राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में जीत के बाद इमारत में एक बार फिर से चहल-पहल ज़रूर बढ़ी. नेताओं की हाज़िरी भी बढ़ने लगी और 2019 की चुनावी मुहिम के दौरान रोज़ प्रेस कॉन्फ्रेंस होने से भीड़भाड़ और भी बढ़ी.
ऐसा लगने लगा था कि दक्षिण एशिया की सबसे पुरानी पार्टी के मुख्यालय में एक बार फिर से जान पड़ गई है. लेकिन गुरुवार को आए नतीजों के बाद एक बार फिर से पार्टी का मुख्यालय बेजान और वीरान सा लगने लगा है.
क्या पार्टी को एक नए चेहरे की ज़रूरत है? नई लीडरशिप क्या इस मुख्यालय में नई जान फूंक सकती है? दफ़्तर के अंदर बैठे पार्टी के कुछ लोगों के अनुसार राहुल गाँधी के प्रति पार्टी की वफ़ादारी पक्की है.
उनके अनुसार शनिवार को कांग्रेस वर्किंग समिति की बैठक में राहुल गाँधी इस्तीफ़े की पेशकश कर सकते हैं लेकिन इसे किसी भी क़ीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा.
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