ममता बनाम प्रियंका शर्मा: एक MEME या सोशल मीडिया पोस्ट पर लोगों को जेल क्यों हो जाती है?

- Author, सिन्धुवासिनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
आपने प्रियंका चोपड़ा की मेट गाला वाली तस्वीर तो देखी होगी, शायद उससे जुड़े मीम्स भी शेयर किए होंगे. लेकिन सोचिए अगर आपको ऐसे ही कोई मीम शेयर करने की वजह से जेल में डाल दिया जाए तो?
भारतीय जनता युवा मोर्चा की सदस्य प्रियंका शर्मा को एक ऐसा ही मीम शेयर करने पर जेल की हवा खानी पड़ी है. उन्होंने प्रियंका चोपड़ा की तस्वीर को फ़ोटोशॉप करके उसमें पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का चेहरा लगा दिया.
इसके बाद तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता विभास हज़ारा ने उनके ख़िलाफ़ एफ़आईआर करा दी और 10 मई को हावड़ा पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया.
ये मामला सोशल मीडिया में आने और पश्चिम बंगाल सरकार की तमाम आलोचनाओं के बाद और ज़्यादा चर्चा में आ गया. बीजेपी समेत आम लोगों ने इसे अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला बताया.
महज एक मीम के आधार पर किसी को गिरफ़्तार कर जेल भिजवाने के लिए पश्चिम बंगाल पुलिस भी सवालों के घेरे में आ गई.
आख़िरकार सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार और पुलिस दोनों को फटकार लगाते हुए प्रियंका शर्मा को रिहा किए जाने का आदेश दिया.
अदालत ने प्रियंका को मंगलवार को ही रिहा किए जाने का आदेश दिया था लेकिन उन्हें बुधवार की सुबह 9:40 बजे रिहा किया गया.
अदालत ने इसे लेकर भी पश्चिम बंगाल पुलिस और राज्य सरकार के वकील को लताड़ लगाई. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पहली नज़र में ये मनमाने तरीके से दर्ज किया मामला लगता है.
बेंच ने प्रियंका को लिखित में माफ़ी मांगने को कहा. बेंच ने कहा कि अभिव्यक्ति की आज़ादी से समझौता नहीं किया जा सकता लेकिन ये ध्यान रखा जाना भी ज़रूरी है कि आपकी वजह से किसी और के अधिकारों का हनन न हो.
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जो क़ानून है ही नहीं, उसके आधार पर गिरफ़्तारी
वहीं, दूसरी तरफ़ ये भी ख़बर है कि इधर सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई चल रही थी और उधर पश्चिम बंगाल पुलिस ने चुपके से मामले की 'क्लोज़र रिपोर्ट' पेश कर दी.
जेल से बाहर आने पर प्रियंका ने कहा कि पुलिस ने उनसे जबरन एक माफ़ीनामे पर हस्ताक्षर करवाया. उन्होंने कहा कि वो माफ़ी नहीं मांगेंगी और ये केस लड़ेंगी.
प्रियंका शर्मा की तरफ़ से अदालत में पेश हुए सीनियर काउंसल नीरज किशन कौल ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि उन्हें एफ़आईआर की कॉपी नहीं दी गई है इसलिए अभी वो नहीं जानते कि प्रियंका पर पुलिस ने कौन सी धाराएं लगाई थीं.
प्रियंका शर्मा तो फिर भी बहुत जल्दी रिहा हो गईं लेकिन ऐसे बहुत से मामले हैं जिनमें लोगों महज एक सोशल मीडिया पोस्ट की वजह से जेल जाना पड़ा और उन पर अब तक मुक़दमा चल रहा है.
इससे भी ज़्यादा की हैरत की बात ये है कि ऐसे मामलों में पुलिस कई बार आईटी एक्ट की धारा- 66 ए के तहत केस दर्ज करती है जबकि सुप्रीम कोर्ट ने इस धारा को साल 2015 में ही निरस्त कर दिया था.

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योगी आदित्यनाथ पर फ़ेसबुक पोस्ट और 42 दिन जेल में
ऐसे ही कुछ लोगों में से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर के ज़ाकिर अली त्यागी भी हैं.
ज़ाकिर ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर दर्ज मुक़दमों के बारे में एक फ़ेसबुक पोस्ट लिखी थी.
उन्होंने बीबीसी से बातचीत में बताया, "उस वक़्त मेरी उम्र तक़रीबन 17 साल थी. 2 अप्रैल 2017 को रात आठ-नौ बजे के लगभग पुलिस मेरी घर आई और मुझे अपने साथ ले गई. उनके पास न कोई वॉरंट था और न कोई दूसरे कागज़ात. उनके पास बस मेरे फ़ेसबुक पोस्ट का प्रिंटआउट था."
ज़ाकिर पर आईटी एक्ट की धारा 66 ए लगाई गई जिसे सुप्रीम कोर्ट ने साल 2015 में ही असंवैधानिक ठहरा दिया था. फिर उन्हें मुज़फ़्फ़रनगर जेल में डाल दिया गया और 42 दिन बाद ही उन्हें ज़मानत मिल पाई.
ज़ाकिर बताते हैं, "मेरे जेल से बाहर आने के बाद 18 मई को पुलिस ने अदालत में मेरे ख़िलाफ़ चार्जशीट दायर और इस बार मुझ पर 124 ए (देशद्रोह) का मुक़दमा भी किया जा चुका था.
ज़ाकिर अली का ये मामला अब भी मुज़फ़्फ़रनगर अदालत में लंबित है. उनके मुक़दमे की अगली तारीख़ 7 जून है, यानी दो साल के बाद भी अभी ज़ाकिर इस मुक़दमे में फंसे हुए हैं.
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'लोग ऐसे देखते हैं जैसे आतंकवादी हूं'
कुछ ऐसी ही कहानी बहराइच के हारून ख़ान की भी है.
21 साल के हारून ने नवंबर 2018 में उत्तर प्रदेश की बीजेपी सरकार के ख़िलाफ़ एक पोस्ट शेयर की थी जिसके बाद उनपर आईटी एक्ट की 66 ए और दो अन्य धाराओं के तहत ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया और उन्हें जेल में डाल दिया गया. एक हफ़्ते तक तक जेल में रहने के बाद हारून को ज़मानत मिली.

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हारून का केस भी अभी अदालत में लंबित है.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "मेरे जेल जाने के बाद आस-पास के लोगों का मेरे प्रति रवैया बिल्कुल बदल गया है. वो मुझे ऐसे देखते हैं जैसे मैं कोई आतंकवादी हूं. ये सब मेरे लिए बहुत तकलीफ़देह है."

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कौन बचाएगा बोलने की आज़ादी?
कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी का मामला तो काफ़ी चर्चित रहा है. असीम के कुछ कार्टूनों की वजह से उन पर देशद्रोह, आईटी एक्ट की धारा और 66 ए और राष्ट्रीय प्रतीक अवमानना निरोधक क़ानून के तहत मामला दर्ज करके उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया.
हालांकि उनकी गिरफ़्तारी के बाद देश भर में विरोध प्रदर्शन होने लगे और एक महीने के अंदर ही देशद्रोह का मुक़दमा वापस ले लिया गया.
साल 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने आईटी एक्ट की धारा 66 ए को असंवैधानिक करार दिया और इस तरह असीम पर सिर्फ़ एक क़ानून के तहत ही मामला चलता रहा है- राष्ट्रीय प्रतीक अवमानना निरोधनक क़ानून के तहत.
असीम त्रिवेदी ने बीबीसी से बाचतीचीत में कहा, "2015 के बाद तक़रीबन डेढ़ साल तक मुझे केस के बारे में कोई अपडेट नहीं मिला. 2017 में मेरे ख़िलाफ़ फिर एक चार्जशीट दायर कर दी गई. अभी मैं होली से एक दिन पहले अदालत में गया था. अब तक तीन-चार तारीखें पड़ी हैं और अगली तारीख़ दिसंबर में है."
असीम कहते हैं कि चूंकि उनका मामला राष्ट्रीय मीडिया में आ गया था इसलिए उन्हें बहुत ज़्यादा परेशानी नहीं हुई लेकिन वो ये मानते हैं कि कई ऐसे मामले हैं जिनके बारे में कोई नहीं जानता.
उन्होंने कहा, "ऐसे कई लोग हैं जिन्हें छोटे-छोटे मामलों में लंबे वक़्त तक ज़मानत नहीं मिल पाती. वो साल-दर-साल अभियुक्त ही बने रहते हैं और शारीरिक-मानसिक प्रताड़ना झेलते हैं."
असीम कहते हैं कि भारत में अभिव्यक्ति की आज़ादी की रक्षा के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए हैं और न ही इसे प्राथमिकता के तौर पर देखा गया है.
वो कहते हैं, "ऐसे वकील और ऐक्टिविस्ट भी कम हैं जो ऐसे मामलों में आपकी मदद कर पाएं. राजनीतिक पार्टियों के लिए ये कोई मुद्दा नहीं है. हां, इस बार कांग्रेस के घोषणापत्र में देशद्रोह क़ानून को ख़त्म करने की बात की गई है. यहां हमें ये भी नहीं भूलना चाहिए कि इसी कांग्रेस के कपिल सिब्बल ने आईटी एक्ट की धारा 66 ए का पुरज़ोर बचाव किया था."
हालांकि असीम मानते हैं कि अभिव्यक्ति की आज़ादी को किसी पार्टी के घोषणापत्र में जगह मिलना बड़ी बात है भले ही वो चुनावी मुद्दा न पाया हो.
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'नेताओं और पार्टी की आलोचना देशद्रोह नहीं'
साइबर क़ानून विशेषज्ञ विराग गुप्ता के मुताबिक़ अमूमन ऐसे मामलों के तीन पहलू होते हैं:
- सुप्रीम कोर्ट की विफलता
- राजनीतिक मामलों में अलग तरीके से कार्रवाई
- क़ानूनी विरोधाभास
विराग गुप्ता ने कहा कि 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने आईटी एक्ट की धारा-66ए को निरस्त कर दिया है. चूंकि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले देश के क़ानून बन जाते हैं इसलिए अब अगर किसी पर 66ए के तहत केस दर्ज किया जाता है तो वो पूरी तरह ग़ैरक़ानूनी और सुप्रीम कोर्ट की अवहेलना है.
विराग गुप्ता ने बीबीसी से बताया, "इसी साल फ़रवरी में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर अदालत को बताया गया कि उसके आदेश के बावजूद कैसे 66ए के तहत गिरफ़्तारियां और कार्रवाई हो रही है. न सिर्फ़ पुलिस की तरफ़ से गिरफ़्तारी हो रही है बल्कि बाक़ायदा मजिस्ट्रेट ऐसे मामलों का संज्ञान ले रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट ने इस पर तल्ख़ टिप्पणी भी की और ऐसी गिरफ़्तारियां रोके जाने का आदेश दिया. अदालत ने अपने आदेश की प्रतियां राज्य सरकारों, जिलाधिकारियों और पुलिस विभाग को भेजे जाने का आदेश दिया."
विराग गुप्ता के मुताबिक़, इन सबके बावजूद सुप्रीम कोर्ट के आदेश को न तो क़ानून की किताबों में ठीक से शामिल किया गया और न ही इसके अधार पर होने वाली गिरफ़्तारियां रुकीं.
विराग गुप्ता मानते हैं कि कि 66 ए को ख़त्म किए जाने का एक नुक़सान भी हुआ है. नुक़सान ये कि अब ऐसे मामलों में अवमानना, राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून और देशद्रोह क़ानून के तहत केस दर्ज किए जाने लगे हैं.
इसके अलावा विराग गुप्ता नेताओं और चर्चित व्यक्तियों से जुड़े मामलों में पुलिस की अतिरिक्त सक्रियता और ज़रूरी मामलों में उसकी उदासीनता पर भी सवाल उठाते हैं.
विराग गुप्ता ज़ोर देकर कहते हैं कि देश या राज्य के प्रतिनिधियों या उनकी नीतियों की आलोचना को देशद्रोह नहीं माना जा सकता.
वो कहते हैं, "नेता और देश एक नहीं हैं. अगर किसी नेता को लगता है कि उसका अपमान किया गया है या उसकी छवि को नुक़सान पहुंचा है तो अवमानना का केस दर्ज करा सकता है लेकिन देशद्रोह का नहीं."
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सुप्रीम कोर्ट में वकील अमित जॉर्ज कहते हैं कि अगर किसी पर ऐसे मामलों में केस दर्ज हो तो उसके लिए सबसे ज़रूरी है कि वो अच्छे वकील या ऐक्टिविस्ट से संपर्क करे क्योंकि असल में देखा जाए तो इससे लड़ने का कोई तय मैकेनिज़्म नहीं है.
अमित कहते हैं, "ऐसे मामले अदालतों में लंबे खिंचते तो ज़रूर हैं लेकिन उनका कन्विक्शन रेट यानी दोष साबित होने की दर बहुत कम होती है. ऐसे मामले आख़िरकार ठंडे बस्ते में डाल दिए जाते हैं और इनमें सज़ा भी बहुत कम लोगों को ही होती है."
जाने-माने कार्टूनिस्ट मंजुल का मानना है कि आम तौर पर नेता अपनी आलोचना को लेकर सहज नहीं होते हैं. फिर चाहे वो भारतीय नेता हों या विदेशी.
मंजुल कहते हैं, "नेता ख़ुद को आम जनता से ऊपर मानते हैं शायद इसीलिए उन्हें लगता है कि वो आलोचनाओं से भी ऊपर हैं. फिर चाहे भारत में वो ममता बनर्जी हों या अमरीका में डोनल्ड ट्रंप. हांलाकि बराक ओबामा और शशि थरूर जैसे कुछ नेता ज़रूर हैं जो अपनी आलोचनाओं का जवाब भी मज़ाकिया अंदाज़ में देकर उसे टालने की कोशिश करते हैं."
मंजुल कहते हैं कि हास्य के भी अलग-अलग रंग हो सकते हैं. कोई मीम वाक़ई मज़ाकिया हो सकता है तो कोई भद्दा भी. लेकिन एक मीम या कार्टून शेयर करने के लिए किसी को जेल में डाल दिया जाना अजीब है.

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क़ानून जो विवादों में है
देशद्रोह क़ानून- सेडिशन लॉ या देशद्रोह क़ानून एक औपनिवेशिक क़ानून है जो ब्रिटिश राज के समय बना था.
अनुच्छेद 124ए के तहत अगर कोई भी व्यक्ति सरकार विरोधी सामग्री लिखता है या बोलता है या फिर ऐसी सामग्री का समर्थन भी करता है तो उसे आजीवन कारावास या तीन साल की सज़ा हो सकती है.
ब्रिटिश राज के समय इसका इस्तेमाल महात्मा गांधी के ख़िलाफ़ तक किया गया था. इस पर मार्च 1922 में उन्होंने कहा था कि यह क़ानून लोगों की स्वतंत्रता को दबाने के लिए बनाया गया है.
राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून (एनएसए)- इसे 1980 में लाया गया था. यह केंद्र और राज्य सरकारों को ऐसी शक्तियां देता है जिसके तहत राष्ट्र हित में किसी भी शख़्स को बिना सूचना हिरासत में लिया जा सकता है.
इस क़ानून में बिना ट्रायल के किसी शख़्स को एक साल तक हिरासत में रखा जा सकता है.
आईटी एक्ट की धारा 66 ए -इसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा साल 2015 में निरस्त किया जा चुका है लेकिन अब भी पुलिस कई बार इसके तहत लोगों पर कार्रवाई करती है.
इस धारा के तहत पुलिस को यह अधिकार दिया गया था कि वो सोशल मीडिया या इंटरनेट पर की गई 'आपत्तिजनक' टिप्पणी के लिए किसी को भी गिरफ़्तार कर सकती है. इस धारा के तहत अधिकतम तीन साल की जेल की सज़ा का भी प्रावधान था.
हालांकि इसे अभिव्यक्ति के आज़ादी के ख़िलाफ़ बताते हुए सुप्रीम कोर्ट द्वारा निरस्त किया जा चुका है और पुलिस इसका हवाला देकर किसी पर कोई कार्रवाई नहीं कर सकती.
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प्रियंका शर्मा जैसे ही कुछ और मामले
- हाल ही में मणिपुर के टीवी पत्रकार किशोरचंद्र वांगखेम को एनएसए के तहत गिरफ़्तार किया गया था. उन पर आरोप थे कि उन्होंने मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह की आलोचना का एक वीडियो फ़ेसबुक पर पोस्ट किया था.
133 दिन जेल में रहने के बाद उन्हें मणिपुर हाईकोर्ट ने रिहा करने का आदेश दिया. अदालत ने उन पर लगाए गए एनएसए और दर्ज किए गए मुक़दमे को ख़ारिज कर दिया.
किशोरचंद्र ने बीबीसी से बताया था कि उन्हें जेल में किसी तरह से शारीरिक रूप से प्रताड़ित नहीं किया गया लेकिन उनके परिवार को मानसिक प्रताड़ना दी गई.
उन्होंने बताया कि सादे कपड़ों में पुलिसकर्मी उनके घर के पास आने जाने लगे और जेल जाने के बाद आसपास के लोग उनके चरमपंथी समूह से जुड़े होने की चर्चा भी करने लगे थे.
-साल 2012 में बाल ठाकरे के निधन के बाद मुंबई की दो लड़कियों को उनकी फ़ेसबुक पोस्ट के लिए गिरफ़्तार कर लिया गया था.
शहीन ढाडा ने अपनी फ़ेसबुक पोस्ट में बिना बाल ठाकरे का नाम लिए मुंबई बंद पर सवाल उठाया था.
उन्होंने लिखा था, ''हर दिन हज़ारों लोग मरते हैं लेकिन दुनिया फिर भी चलती है. लेकिन एक राजनेता की मृत्यु से सभी लोग बौखला जाते हैं. आदर कमाया जाता है और किसी का आदर करने के लिए लोगों के साथ ज़बरदस्ती नहीं की जा सकती. मुंबई आज डर के मारे बंद हुई है न कि आदर भाव से."
उनकी फ़ेसबुक फ़्रेंड रीनू श्रीनिवासन ने ये पोस्ट 'लाइक' की थी. इसके बाद शहीन और रीनू दोनों को गिरफ़्तार करके 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था.
हालांकि पर्सनल बॉन्ड भरने के कुछ घंटों बाद ही उन्हें रिहा भी कर दिया गया था.
इसके बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने महाराष्ट्र सरकार को दोनों लड़कियों को 50-50 हज़ार रुपये का मुआवज़ा देने को कहा था लेकिन राज्य सरकार ने आयोग की बात नहीं मानी और लड़कियों को हर्ज़ाना नहीं दिया.
महाराष्ट्र सरकार ने अपनी दलील में कहा था कि 'तनावपूर्ण हालात को देखते हुए उस वक़्त लड़कियों की गिरफ़्तारी उचित थी.'
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