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क्या बंगाल का यह अर्जुन तोड़ पाएगा दीदी का चक्रव्यूह?
- Author, प्रभाकर एम.
- पदनाम, बैरकपुर (पश्चिम बंगाल) से लौटकर, बीबीसी हिंदी के लिए
"इस बार यहां कांटे की टक्कर है. दिनेश त्रिवेदी निचले स्तर के लोगों के साथ ज्यादा नहीं घुलते-मिलते. लेकिन अर्जुन सिंह इस तबके में काफी लोकप्रिय हैं. वर्ष 2009 और 2014 के चुनाव में दिनेश त्रिवेदी के सारथी की भूमिका में रहे अर्जुन इस बार उनको कड़ी चुनौती दे रहे हैं. नतीजा कुछ भी हो सकता है"
काकिनाड़ा इलाके में फलों का ठेला लगाने वाले अजय चौहान इन शब्दों में ही इलाके की चुनावी राजनीति का इतिहास, भूगोल और भविष्य बता देते हैं.
कोलकाता से सटे उत्तर 24-परगना ज़िले की बैरकपुर संसदीय सीट इस बार सुर्खियों में है. इसकी वजह यह नहीं है कि तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवार और पूर्व रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी जीत की हैट्रिक लगाने के लिए यहां मैदान में हैं.
बल्कि यह है कि इलाके की भाटपाड़ा सीट से तृणमूल के टिकट पर लगातार चार बार विधायक रहे अर्जुन सिंह इस बार बीजेपी के टिकट पर त्रिवेदी को चुनौती दे रहे हैं.
अर्जुन ने बीते दो चुनावों में त्रिवेदी की जीत में अहम भूमिका निभाई थी. हालांकि, नामालूम वजहों से त्रिवेदी और उनके संबंधों में शुरू से ही ठंडापन रहा और त्रिवेदी अपनी जीत में उनकी भूमिका को खारिज करते रहे.
अर्जुन क्यों बने विरोधी?
तृणमूल कांग्रेस की दलील है कि अर्जुन इस बार लोकसभा चुनाव लड़ना चाहते थे. लेकिन ममता ने जब त्रिवेदी को ही तीसरी बार टिकट दिया तो अर्जुन ने मुकुल राय का हाथ थाम लिया और बीजेपी में शामिल हो गए.
ममता बनर्जी अब अपनी रैलियों में अर्जुन सिंह को गद्दार करार देती हैं.
गुरुवार को इलाके में अपनी रैली में ममता ने किसी का नाम लिए बिना कहा, "इलाके में दो-दो गद्दार हैं. एक बड़ा (मुकुल राय) और एक छोटा (अर्जुन सिंह). छोटे गद्दार ने लोकसभा का टिकट मांगा था. लेकिन मैं एक व्यक्ति को आखिर कितना कुछ दे सकती हूं? उनकी मांगें खत्म होने का नाम ही नहीं लेतीं."
दूसरी तरफ अर्जुन सिंह ने ममता के इस आरोप को सिरे से ख़ारिज कर दिया है. वह कहते हैं कि अगर कोई गद्दार है तो वह खुद ममता बनर्जी ही हैं.
क्या दो बार दिनेश के लिए काम करने के बाद इस बार उनके मुकाबले खड़े होने पर कोई दबाव है. इस सवाल पर अर्जुन का कहना है, "ऐसा कुछ नहीं है. इलाके के लोग मेरे साथ हैं. इस बार लोग तृणमूल को हराने के लिए तैयार हैं."
कितनी महत्वपूर्ण सीट?
कोलकाता से सटी इस सीट की अहमियत इसी से पता चलती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह तक अर्जुन के समर्थन में रैलियां कर चुके हैं.
कभी ममता के बेहद करीबी समझे जाने वाले अर्जुन के साथ तृणमूल की तल्खी लगातार बढ़ने की दो वजहें हैं. पहली तो यह कि वह बीजेपी के टिकट पर दिनेश के ख़िलाफ़ मैदान में हैं.
दूसरी अहम वजह यह है कि अर्जुन के इस्तीफे से खाली हुई भाटपाड़ा विधानसभा सीट पर 19 मई को होने वाले उपचुनाव में इस बार अर्जुन के पुत्र पवन सिंह बीजेपी के टिकट पर मैदान में हैं.
ममता ने यहां से कभी अपने दाहिने हाथ रहे पूर्व परिवहन मंत्री मदन मित्र को मैदान में उतारा है. ममता अपनी रैलियों में लोगों से बाप-बेटे की ज़मानत ज़ब्त कराने की अपील करती रही हैं.
ममता अपने भाषणों में मौजूदा चुनावी लड़ाई की तुलना साल 1857 के सिपाही विद्रोह से करती हैं. उस विद्रोह में बैरकपुर की भूमिका काफी अहम थी और ममता भरोसा जताती हैं कि लोग उसी तर्ज पर इस बार नरेंद्र मोदी और भाजपा को करारा जवाब देंगे.
अर्जुन को इस बार बैरकपुर में कमल खिलने का पक्का भरोसा है. उनका दावा है कि वर्ष 2009 और 2014 में दिनेश त्रिवेदी की जीत के पीछे उनका ही हाथ था. वे कहते हैं कि इस बार दिनेश की हार तय है.
दूसरी ओर, दिनेश त्रिवेदी को जीत की हैट्रिक लगाने का पूरा भरोसा है. वह कहते हैं, "अर्जुन की बाहुबली वाली छवि का फ़ायदा मुझे ही मिलेगा. लोग बाहुबली नहीं चाहते."
सूनी पड़ी जूट मिलें
हिंदीभाषी बहुल यह इलाका कभी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से आने वाले जूट मिल मजदूरों का स्वर्ग था. 70-80 के दशक में सोना उगलने वाली इलाके की जूट मिलों में से अधिकतर या तो बंद हो चुकी हैं या बीमार हैं.
लेफ्टफ्रंट के शासनकाल में उग्र ट्रेड यूनियन गतिविधियों के चलते इनके बंद होने का जो सिलसिला शुरू हुआ था वह तृणमूल के शासनकाल में भी जस का तस है.
बैरकपुर से लोकर, नोआपाड़ा, काकिनाड़ा, भाटपाड़ा और जगद्दल में हुगली के किनारे कतार में खड़ी इन जूट मिलों में तो कइयों के दरवाजे पर बरसों से मोटे ताले लटक रहे हैं तो कई बीमार चल रही ही हैं.
इन मिलों के अलावा डकबैक समेत तमाम कारखाने लंबे समय से बंद हैं. ऐसे कल-कारखानों की सूची लगातार लंबी होती जा रही है. बीजेपी नेता अर्जुन सिंह इसके लिए तृणमूल कांग्रेस सरकार को जिम्मेदार ठहराते हैं.
हर चुनावों में यह बंद मिलें प्रमुख मुद्दा होती हैं और इस बार भी अपवाद नहीं है.
30 साल तक इलाके की एक जूट मिल में काम करने वाले विजय राय कहते हैं, "अब जूट मिलों और उनमें काम करने वाले मजदूरों के सुनहरे अतीत पर धूल की मोटी परतें चढ़ गई हैं.''
''तृणमूल कांग्रेस की सरकार के आने के बाद इलाके के लोगों में किस्मत बदलने की उम्मीद जगी थी. लेकिन अब तक हालात में कोई बदलाव नहीं आया है."
जूट मिल बंद होने के बाद मेहनत-मजदूरी कर पेट पालने वाले रामानंद प्रसाद कहते हैं, "चुनावों के बाद नेताओं को हमारी समस्याओं और बंद जूट मिलों की याद ही नहीं आती. पार्टी कोई भी हो, नेताओं का चरित्र एक जैसा है."
प्रसाद कहते हैं कि अभी चुनावों की गहमा-गहमी है, लेकिन चुनाव बीतते ही सब कुछ शांत हो जाएगा. तब कोई नेता किसी बंद मिल या उसके मजदूरों की ख़बर लेने नहीं आएगा.
भाजपा का उभार
वर्ष 2004 तक वामपंथी ट्रेड यूनियनों की मजबूत पकड़ के चलते सीपीएम यह सीट जीतती रही थी. लेकिन वर्ष 2009 के चुनावों में तृणमूल कांग्रेस के दिनेश त्रिवेदी ने 49.28 फीसदी वोट लेकर सीपीएम उम्मीदवार को लगभग 56 हजार वोटों से हरा दिया.
उस साल बीजेपी को यहां महज 3.56 फीसदी वोट मिले थे. वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में दिनेश दोबारा जीत तो गए लेकिन पार्टी को मिलने वाले वोटों में लगभग चार फीसदी की गिरावट आई.
सीपीएम को मिलने वाले वोट भी 17 फीसदी घट गए. इसका फ़ायदा मिला बीजेपी को. उसके वोट तेजी से बढ़ कर 21.92 फीसदी तक पहुंच गए और उसके उम्मीदवार आरके हांडा को 2.30 लाख से ज्यादा वोट मिले.
बीजेपी को उम्मीद है कि उनका अर्जुन इस बार यहां तृणमूल कांग्रेस का चक्रव्यूह तोड़ते हुए मछली की आंख भेद देगा.
राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ पंडित कहते हैं, "तृणमूल कांग्रेस भले यहां लगातार तीसरी बार जीत के दावे करे, अर्जुन सिंह के पाला बदलने से उसकी राह मुश्किल जरूर हो गई है. अर्जुन को तृणमूल के तमाम चुनावी पैंतरे मालूम है और वह भी उसी के वोट बैंक में सेंध लगाएंगे."
अब सभी निगाहें 23 मई पर टिकी हैं. यह देखने के लिए कि अर्जुन मछली की आंख पर सटीक निशाना लगा पाते हैं या नहीं.
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