You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
बूथ लेवल तक की जानकारी 'लोकतंत्र के लिए ख़तरा'
- Author, संदीप राय
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
वोटरों को 'धमकाने' वाला मेनका गांधी का वीडियो सामने आने के बाद मतदान की गोपनीयता पर सवाल खड़े होने लगे हैं.
लोग पूछने लगे हैं कि जब मतदान गोपनीय है तो कैसे प्रत्याशियों को पता चल जाता है कि उन्हें कहां से कितना वोट मिला है?
यह लोकतंत्र के लिए ख़तरा इस तरह है कि 'वोट न देने वाले इलाके' के लोगों के साथ भेदभाव किया जा सकता है, या 'अपने वोटरों' को अधिक लाभ दिए जा सकते हैं, दोनों ही स्थितियों में यह लोकतंत्र की भावना के प्रतिकूल है.
जब मतदाता किसी बूथ पर वोटिंग करता है तो उसके सिवाय किसी को पता नहीं होता कि उसने किसको वोट दिया है.
यहां तक कि मतदान अधिकारी भी मतदाता की केवल जांच-परख करते हैं और पोलिंग एजेंट को भी इस पूरी प्रक्रिया से दूर रखा जाता है.
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स (एडीआर) के संस्थापक प्रोफ़ेसर जगदीप छोकर कहते हैं, "हर बूथ और ईवीएम का नंबर होता है. मतगणना के समय ईवीएम को बूथ और उसके नंबर के आधार पर उसी क्रम में रखा जाता है."
उनके मुताबिक़, "मोहल्ले के आधार पर या आबादी की एक निश्चित संख्या के आधार पर मतदान केंद्र बनाया जाता है इसलिए वोटों की गिनती के समय प्रत्याशी के प्रतिनिधियों को आसानी से पता चल जाता है कि कहां से कितने वोट मिले और ये सूचना भी सार्वजनिक होती है."
वो कहते हैं, "जब मतपत्रों से चुनाव होते थे तो एक विधानसभा या संसदीय क्षेत्र के सभी मतदान केंद्रों के वोट आपस में मिला दिए जाते थे उसके बाद गिनती होती थी जिसे बूथ के हिसाब से आंकड़े सामने नहीं आते थे, लेकिन ईवीएम के आने के बाद ये संभव नहीं रहा."
गोपनीय मतदान
आज़ादी के तुरंत बाद 1951 में हुए चुनावों में पहली बार सीक्रेट बैलट यानी गोपनीय मतपत्रों के ज़रिए चुनाव कराए जाने का फैसला हुआ.
इसके पीछे गोपनीय मतदान को सुनिश्चित करने की मंशा थी.
साल 1961 में कंडक्ट ऑफ़ इलेक्शन रूल्स की धारा 59ए के तहत एक चुनाव क्षेत्र के सभी बूथों के मतपत्रों को आपस मिला देने का नियम बना. इससे बूथ के स्तर पर मतदान के पैटर्न को जानना और उस आधार पर चुनाव बाद भेदभाव की आशंका कम हो गई. लेकिन जब 2008 के बाद ईवीएम के ज़रिए चुनाव कराए जाने लगे तो वोटों को मिलाना असंभव हो गया, यहां तक कि चुनाव आयोग की वेबसाइट पर भी बूथ के स्तर तक की वोटिंग का ब्योरा जारी किया जाता है.
प्रोफ़ेसर जगदीप कहते हैं, "पहले ये पता लगा पाना मुश्किल होता था कि किस बूथ पर कितने प्रतिशत वोट किसको मिले, जिससे वोटरों के एक ख़ास समूह की पहचान करना आसान नहीं था."
पहचानना कितना आसान
प्रोफ़ेसर छोकर कहते हैं कि 'गोपनीयता का अलग-अलग स्तर है. मौजूदा चुनाव व्यवस्था में निजी स्तर पर तो गोपनीयता है लेकिन बूथ लेवल पर नहीं है. और इसका फ़ायदा उठाने के लिए राजनीतिक लोग ये कहते हैं कि इससे उन्हें चुनाव प्रचार प्रबंधन में आसानी होती है.'
बूथ लेवल आंकड़ों से राजनीतिक पार्टियों के चुनाव प्रचार प्रबंधन में चाहे आसानी हो या न हो लेकिन इससे एक स्तर पर वोटरों की गोपनीयता ज़रूर भंग हो जाती है.
असल में राजनीतिक पार्टियों के बूथ लेवल कार्यकर्ताओं के पास मतदाताओं की पूरी लिस्ट होती है.
मतगणना के समय पोलिंग एजेंट और काउंटिंग एजेंट मतगणना केंद्र पर मौजूद होते हैं. उनके लिए लिस्ट से मिलान कर ये चिह्नित करना बहुत कठिन नहीं रह जाता कि किस बूथ से किसको कितने वोट मिले हैं.
प्रोफ़ेसर छोकर कहते हैं, "आजकल इसमें कोई शंका नहीं रह गई है कि हर उम्मीदवार को ये पता लग सकता है कि किस बूथ में उसे कितने वोट मिले हैं, इसके बाद हारने या जीतने वाले उम्मीदवार का व्यवहार उस इलाके के लोगों के लिए बदल सकता है."
गोपनीयता को सुनिश्चित करने के लिए चुनाव आयोग ने सरकार को कई बार प्रस्ताव भेजे, लेकिन अभी तक किसी ठोस कार्रवाई का आश्वासन नहीं आया.
टोटलाइज़र है काट
प्रोफ़ेसर छोकर के मुताबिक, "इसकी काट के लिए चुनाव आयोग ने 'टोटलाइज़र' नाम की एक मशीन लाने का प्रस्ताव दिया है, लेकिन सरकारें उदासीन नज़र आ रही हैं."
वो कहते हैं कि टोटलाइज़र एक से अधिक ईवीएम और बूथ के वोटों को मिला देता है और बूथ स्तर पर वोटरों की पहचान को मुश्किल बना देता है. लेकिन सरकार ने इसे अभी हरी झंडी नहीं दी है क्योंकि राजनितिक पार्टियों का कहना है कि उनके लिए ये सूचना बहुत ज़रूरी है कि उन्हें किस बूथ पर कितने वोट मिले ताकि अगले चुनाव की रणनीति उसी हिसाब से बना सकें.
साल 2015 में लॉ कमीशन ने भी टोटलाइज़र मशीन का समर्थन किया.
चुनाव आयोग और लॉ कमीशन के प्रस्ताव के अनुसार, टोटलाइज़र मशीन के ज़रिए 14 मतदान केंद्रों के वोट मिला दिए जाएं और उसके बाद उसकी गिनती हो.
इस मशीन को भारत इलेक्ट्रॉनिक्स ने ही विकसित किया है, जो ईवीएम भी बनाती है.
सरकार ने प्रस्ताव ख़ारिज किया
टोटलाइज़र को लेकर सैद्धांतिक रूप से प्रमुख राजनीतिक दलों का सकारात्मक रुख़ था.
सुप्रीम कोर्ट का इस पर एक आदेश भी आया था जिसमें कहा गया था कि सरकार सितंबर 2016 तक फैसला ले. लेकिन सरकार ने इस प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया, मंत्रियों का तर्क था कि इससे 'पोलिंग बूथ मैनेजमेंट' प्रभावित होगा.
प्रोफ़ेसर छोकर कहते हैं, "राजनीतिक दल अपना फायदा देखते हैं, भले ही देश का नुकसान हो जाए. चुनाव सुधार में ये एक बड़ा एजेंडा है और लोकतंत्र की मज़बूती के लिए बहुत ज़रूरी भी है."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)