जम्मूः कठुआ के लोग आख़िर क्यों बीजेपी से नाराज़ हैं- ग्राउंड रिपोर्ट

    • Author, मोहित कंधारी
    • पदनाम, कठुआ के रसाना गांव से

देश भर में लोकसभा चुनाव के चलते जगह-जगह चहल-पहल नज़र आ रही है. कहीं सियासी पार्टियों के उम्मीदवारों के पोस्टर चर्चा का विषय बने हुए हैं तो कहीं चुनावी सभा की तैयारियां ज़ोरशोर से चल रही हैं.

चाय की दूकान हो, गाँव की चौपाल हो या फिर गली-मोहल्ला- हर जगह राजनीति सिर चढ़ कर बोल रही है.

लेकिन जम्मू के कठुआ जिले में पड़ने वाले रसाना और उसके आस पास के गांवों में आज भी सन्नाटा पसरा हुआ है.

दूसरे चरण का चुनाव प्रचार ख़त्म होने में सिर्फ तीन दिन बाकि हैं लेकिन अभी तक गाँव में चुनावी माहौल नज़र नहीं आ रहा.

हम गाँव के अन्दर कदम रखते हैं तो एक अजीब-सी ख़ामोशी हमारा स्वागत करती है.

पूरे गाँव में कहीं भी किसी दीवार पर कोई पोस्टर नहीं है, ना ही किसी नेता के आने की सुगबुगाहट की सुनाई देती है. न तो किसी उम्मीदवार ने अपना पोस्टर चिपकवाया है और न ही कोई नेता वोटरों को लुभाने के लिए गाँव का रुख कर रहा है.

यह गाँव -रसाना- उधमपुर-डोडा लोकसभा सीट के अंतर्गत आता है. यहां लगभग 16.85 लाख मतदाता 18 अप्रैल को 12 उम्मीदवारों की किस्मत का फैसला करेंगे. ये लोकसभा सीट डोडा, किश्तवार और रामबन के अलावा कठुआ, उधमपुर और रियासी के जिलों तक फैली हुई है.

भाजपा की ओर से डॉ जीतेन्द्र सिंह दूसरी बार यहां से अपनी किस्मत आजमा रहे हैं. रियासत में सदर-इ-रियासत रहे चुके डॉ करण सिंह के बेटे विक्रमादित्य सिंह कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस के साझा उम्मीदवार के तौर पर यहां से उनके ख़िलाफ़ चुनाव मैदान में डटे हुए हैं.

88 साल की उम्र में डॉ करण सिंह खुद अपने बेटे के लिए जनता के बीच जा कर वोट मांग रहे हैं.

डॉ करण सिंह ने खुद इस सीट पर 1967-1980 के बीच लगातार चार बार जीत हासिल कर लोगों का प्रतिनिधित्व किया है. अपनी हर चुनावी सभा में वो वोटर्स से 'डोगरा अस्मिता' के नाम पर वोट डालने की अपील कर रहे हैं.

डॉ जीतेन्द्र सिंह की राह मुश्किल बनाने के लिए भाजपा से नाराज़ बागी उम्मीदवार लाल सिंह भी इस चुनाव में अपनी किस्मत आज़मा रहे हैं.

13 अप्रैल 2018 के दिन उन्होंने मंत्री परिषद से त्यागपत्र दे दिया था और उसके बाद से वो जनता के बीच उनकी मांगों को लेकर लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं.

लाल सिंह ने 'डोगरा स्वाभिमान संगठन पार्टी' के उम्मीदवार के तौर अपना नामांकन भरा है.

वहीं डॉ जीतेन्द्र सिंह के ख़िलाफ़ जम्मू कश्मीर नेशनल पैंथरस पार्टी के चेयरमैन हर्षदेव सिंह भी चुनाव मैदान में डटे हुए हैं.

2014 के लोकसभा चुनाव में डॉ जीतेन्द्र सिंह ने कांग्रेस के दिग्गज नेता गुलाम नबी आज़ाद को 60,000 से ज्यादा वोटों से हराया था. लेकिन इस दफ़ा कठुआ जिले के लोगों की नाराज़गी डॉ जीतेन्द्र सिंह को महंगी पड़ सकती है.

डॉ सिंह की स्थिति मजबूत करने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खुद रविवार के दिन कठुआ में एक बड़ी चुनावी रैली संबोधित किया.

कठुआ जिले की पांच असेंबली सीट में रहने वाले लोगों के लिए पार्टी ने विशेष जनसभा का भी आयोजन किया है.

इससे पहले बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह ने उधमपुर में और गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भद्रवाह में डॉ जीतेन्द्र सिंह के लिए प्रचार किया था.

कठुआ में नाराज़ वोटरों को लुभाने के लिए भाजपा ने पार्टी में अभी-अभी शामिल हुए क्रिकेटर गौतम गंभीर को भी मैदान में उतारा था. उन्होंने रामनगर और नागरी में रैली कर डॉ सिंह के लिए वोट मांगे थे.

भाजपा से क्यों नाराज़ हैं रसाना के वोटर?

पिछले साल जनवरी में कठुआ के रसाना इलाक़े में बकरवाल समुदाय से ताल्लुक रखने वाली एक आठ साल की बच्ची का पहले अपहरण हुआ और अपहरण के सात दिन बाद बच्ची का शव इलाक़े के एक जंगल के पास मिला.

पुलिस की क्राइम ब्रांच ने अपने आरोपपत्र में दावा किया था कि बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार के बाद उसकी हत्या की गयी थी.

आरोपपत्र में ये भी कहा गया था कि बलात्कार और हत्या से पहले उसे नशीली दवाएं खिलाई गई थीं और जिसके बाद बच्ची को इलाक़े के एक मंदिर में बंधक बना कर रखा गया था.

पुलिस ने इस मामले में आठ लोगों को ग़िरफ़्तार किया जो अब जेल में हैं. क्राइम ब्रांच ने कहा था कि इस पूरी साज़िश के मास्टरमाइंड सांझी राम जिन्हें ग़िरफ़्तार कर लिया गया था. इस मामले का ट्रायल अभी पंजाब के पठानकोट में चल रहा है.

पिछले साल अप्रैल में मामले की सुनवाई कठुआ की एक अदालत में शुरू हुई थी. लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर केस को पठानकोट ट्रांसफर किया गया था.

रसाना के लोगों की वो मांग क्या है?

बकरवाल समुदाय की आठ साल की बच्ची के साथ हुए बलात्कार और मर्डर के मामले में उच्चस्तरीय जांच करवाने की मांग को लेकर स्थानीय लोग महीनों कूटा मोड़ पर धरने पर बैठे रहे लेकिन आज भी मामले की सीबीआई जांच करवाए जाने की मांग पूरी नहीं की जा सकी है.

आज कूटा का चौराहा बिल्कुल सुनसान पड़ा है. वहां दिन भर में कई मुसाफिर थोड़ी देर बैठ कर आगे निकल जाते है.

आसपास के दुकानदारों ने बीबीसी हिंदी से बताया की रसाना गाँव के लोग भाजपा से नाराज़ जरूर हैं लेकिन वो यह भी जानते हैं केंद्र की सरकार चुनने के लिए प्रधानमंत्री का चयन करना बड़ा जरूरी है. इसलिए वो अपना वोट नरेन्द्र मोदी को देने के लिए तैयार हैं, लेकिन वे लोग डॉ जीतेन्द्र सिंह को अपना वोट नहीं देना चाहते.

कूटा मोड़ पर मिठाई की दूकान चला रहे मुकेश कुमार कहते हैं, "यहां के सब गाँववाले सरकार से नाराज़ हैं. उनकी सीबीआई जांच की मांग पूरी नहीं हुई इसलिए वो भाजपा के उम्मीदवार को वोट न देकर किसी अन्य को वोट देंगे."

परचून की दूकान के मालिक गुलशन कुमार शर्मा का कहना है, "यहां सीबीआई जांच की पूरी नहीं हो सकी जिसके चलते लोगों में रोष है और वो सरकार से नाराज़ हैं."

आज भी गांव वाले भाजपा के 25 पूर्व विधायकों और दोनों सांसदों से नाराज़ हैं.

गांव वालों का कहना है कि रसाना में हुई घटना की वजह से पूरी रियासत में उथल-पुथल मच गयी थी, भाजपा के मंत्रियों को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा और जब उस पर भी बात नहीं बनी तो भाजपा और पीडीपी की गठबंधन सरकार भी टूट गई.

रसाना से सटे सतुरा गाँव के सरपंच भागमल खजुरिया ने बताया, "पिछले साल रसाना गाँव के लोगों की इज्ज़त गलियों में नीलाम हुई थी. यहाँ के लोग बड़े गुस्से में हैं. उन्होंने आसपास के गांवों के लोगों से अपील करते हुए कहा कि कोई भी भाजपा के उम्मीदवार डॉ जीतेन्द्र सिंह को अपना वोट न दें."

भागमल खजुरिया कहते हैं, "डेमोक्रेसी में नाराज़गी जाहिर करने का यही एक ज़रिया होता है. अगर इलेक्शन में इस इलाके से उनको वोट न पड़ें तो नरेन्द्र मोदी को भी महसूस होगा की इस इलाके के लोग सरकार से नाराज़ थे."

2014 के लोकसभा चुनावों का हवाला देते हुए भागमल खजुरिया कहते हैं, "कठुआ के लोगों ने डॉ जीतेन्द्र सिंह को खुले दिल से वोट देकर जिताया था लेकिन कठुआ के लोगों पर और ख़ासकर रसाना के लोगों पर मुसीबत का पहाड़ टूटा, हालात इतने नाज़ुक हो गए थे कि लोगों का यहां रहना भी मुश्किल हो गया था."

"डर के कारण रसाना के लोग कूटा से पलायन करके चले गए, लेकिन डॉ जीतेन्द्र सिंह ने यहाँ आकर लोगों की कोई सुध नहीं ली, उनका हाल नहीं जाना. लोगों में इतनी नाराज़गी है की 16.85 लाख वोटों में से डॉ जीतेन्द्र सिंह को 5 हज़ार वोट भी न मिलें.

अप्पर गुढ़ा मेहतियन गाँव के केवल कुमार बताते हैं, "जब से हमने डॉ जीतेन्द्र सिंह को जीताकर दिल्ली भेजा था उस दिन से वो हमें नज़र नहीं आए. उनका कहना था पार्टी को कोई दूसरा कैंडिडेट तैयार करना चाहिए था. जरूरी नहीं कि लोकसभा सीट पर उनका ही नाम लिखा हुआ है. क्या इतनी बड़ी पार्टी के पास कोई दूसरा उम्मीदवार नहीं था."

केवल कुमार ने कहा, "हमने इस इलाके में कोई तरक्की तो देखी नहीं, हम जैसे रह रहे थे उसी प्रकार से आज भी रह रहे हैं."

वहीं हीरानगर के दीपक शर्मा कहते हैं, "भाजपा के 25 विधायकों ने पीडीपी की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती के आगे घुटने टेक दिए थे. वो मंत्री की कुर्सी पर बैठना चाहते थे. उन्होंने पद के लुत्फ़ भी ले लिए और उनकी कुर्सी भी छूट गयी है, अब मुझे लगता हैं डोडा-उधमपुर सीट से डॉ जीतेन्द्र सिंह हार जायेंगे."

घगवाल के रहने वाले एक युवा अमन कुमार ने बताया, "हम भाजपा को क्यों वोट देंगे. इन्होंने आज तक हमारी एक नहीं सुनी, कठुआ गैंगरेप मामले में सीबीआई जांच की मांग भी पूरी नहीं की. 25 विधायकों में से एक भी हमारे पास कूटा मोड़ पर धरने में शामिल होने के लिए नहीं आया. किसी ने भी हमारी आवाज़ नहीं सुनी."

रसाना के रहने वाले खेम राज ने कहा, "रसाना केस के चलते बीजेपी ने अपने वोट खो दिए हैं. नहीं तो इस गाँव से 100 प्रतिशत वोटिंग प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हक में होनी थी. डॉ जीतेन्द्र सिंह को कोई भी वोट नहीं देना चाहता."

विक्रांत जसरोटिया कहते हैं, "डॉ जीतेन्द्र सिंह कैबिनेट में मंत्री थे. वह अगर चाहते तो रसाना मामले में सीबीआई जांच करवा सकते थे लेकिन ऐसा नहीं हुआ."

हीरानगर में चन खात्रियाँ के रहने वाले ब्यास चाँद ने बताया कि पिछले कई बरसों में किसी भी सरकार ने उनकी सुनवाई नहीं की और न ही उन्हें सरकार की तरफ़ से चलायी जा रही स्कीम के तेहत कोई राहत राशि मिली है.

वो कहते हैं, "चुनाव के समय वोट देते समय वो इस बात का विशेष ध्यान रखेंगे की वो अपना वोट किसी अच्छे नेता को दें जिससे उनके जीवन में खुशहाली आए."

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