You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
लोकसभा चुनाव 2019: चुनाव आते ही बीजेपी ध्रुवीकरण की राजनीति क्यों अपना लेती है- नज़रिया
- Author, रामदत्त त्रिपाठी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
आम चुनाव एक ऐसा अवसर होता है जिसमें सत्तारूढ़ दल अपनी पाँच साल की उपलब्धियों और भावी योजनाओं को जनता के बीच रखकर एक और जनादेश माँगता है.
लेकिन इस चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के स्टार प्रचारक मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने प्रचार को बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक अथवा हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण पर ले जाते हुए दिख रहे हैं. एक नज़र से इसे संसदीय लोकतंत्र के लिए एक ख़तरनाक संकेत के तौर पर देखा जा सकता है.
महात्मा गांधी की कर्मस्थली वर्धा में चुनाव प्रचार करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, "कांग्रेस ने हिंदू आतंकवाद शब्द का प्रयोग करके देश के करोड़ों लोगों पर दाग लगाने की कोशिश की थी. आप ही बताइए हिंदू आतंकवाद शब्द सुनकर आपको गहरी पीड़ा नहीं होती? हज़ारों साल में क्या एक भी ऐसी घटना है, जिसमें हिंदू आतंकवाद में शामिल रहा हो."
सामान्य धारणा है कि हिंदू या सनातन धर्म को मानने वाले लोग आमतौर पर शांति प्रिय होते हैं.
पर ये सवाल तो बनता है कि जिस विचारधारा से जुड़े लोगों ने गांधी जैसे महात्मा की हत्या की उस विचारधारा को मानने वाले लोगों के लिए किस विशेषण का इस्तेमाल किया जाए?
अथवा वो लोग जो किसी के घर में घुसकर या फिर राह चलते लोगों को गोहत्या के नाम पर पीट-पीट कर मार डालते हैं या अपनी ड्यूटी कर रहे पुलिस अधिकारी को मार देते हैं, उन्हें क्या कहकर पुकारा जाए.
भारत जैसे विविधता भरे देश में नीतियाँ बनाने और सरकार चलाने में सभी को प्रतिनिधित्व मिले, इसीलिए भारतीय संविधान सभा ने जानबूझकर देश में संसदीय लोकतंत्र की स्थापना की थी, ताकि किसी एक धर्म वालों का बोलबाला न हो.
उस समय स्वतंत्रता आंदोलन के मूल्यों से ओत-प्रोत भारतीय समाज ने 'हिंदू राष्ट्र' की बात करने वालों को हाशिए पर कर दिया था.
लेकिन आगे चलकर गुजरात बहुसंख्यक राजनीति की प्रयोगशाला बनाऔर पिछले लोकसभा चुनाव में इसका विस्तार अखिल भारतीय स्तर पर देखा गया.
लगता है इस बार भी भाजपा धार्मिक ध्रुवीकरण के सहारे ही अपनी नाव पार लगाना चाहती है.
ध्रुवीकरण के लिए एक खलनायक या घृणा के प्रतीक की आवश्यकता होती है.
पहले ये प्रतीक बाबरी मस्जिद थी. अब मस्जिद ढह चुकी है और बीजेपी मंदिर निर्माण का वादा पूरा नही कर सकी.
विकास और रोज़गार के नाम पर ज़्यादा कुछ बताने लायक नही है. शायद यही वजह है कि आँकड़ों में हेरफेर या वास्तविकता छुपाने के आरोप सामने आ रहे हैं.
अब नया विलेन पाकिस्तान है जिसके सहारे राष्ट्रवाद और 'आतंकवाद' के नाम पर सीधे मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सहारनपुर में चुनाव प्रचार करते हुए कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार को पाकिस्तानी चरमपंथी मसूद अज़हर का 'दामाद' कहा.
उसके बाद वे बिसाहड़ा गाँव में प्रचार के लिए गए, जहाँ अख़लाक़ हत्याकांड के मुलज़िम उनकी सभा में अगली कतार में बैठे थे.
चुनाव आयोग की स्पष्ट मनाही के बावजूद प्रचार में ना केवल सेना की बहादुरी को पार्टी की उपलब्धियों के रूप में पेश किया जा रहा है, बल्कि योगी आदित्यनाथ ने भारतीय सेना को 'मोदी की सेना' बना दिया, जिस पर अनेक पूर्व सैन्य अधिकारियों में खुलकर आपत्ति की है. देखना है कि चुनाव आयोग इस पर क्या कार्रवाई करता है?
प्रधानमंत्री मोदी मुद्दे गढ़ने में माहिर हैं. कांग्रेस नेता और उनके मुख्य प्रतिद्वंदी बनकर उभरे राहुल गांधी ने अमेठी के अलावा केरल के वायनाड से चुनाव लड़ने का जो निर्णय किया उसे भी उन्होंने बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक अभियान से जोड़ दिया है.
वर्धा की ही सभा में मोदी ने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा, "देश ने कांग्रेस को दंडित करने का फ़ैसला कर लिया है, इसलिए कुछ नेता उन सीटों से चुनाव लड़ने से डर रहे हैं जहाँ बहुसंख्यक आबादी का प्रभुत्व है और अब वह उस सीट से लड़ने को मजबूर हैं, जहाँ बहुसंख्यक आबादी अल्पसंख्यक है."
मोदी सरकार में पूर्व मंत्री एमजे अकबर ने एक हिंदी अख़बार में अपने लेख में एक क़दम आगे जाकर कहा, "ये इतिहास में पहली बार होगा, जब कोई कांग्रेस अध्यक्ष जीत के लिए मुस्लिम लीग पर निर्भर होगा. ज़रा इसके सम्भावित असर के बारे में विचार करें."
हाल ही में न्यूज़ीलैंड में मस्जिद पर चरमपंथी हमले के बाद वहाँ की सरकार और समाज ने दिखाया कि अल्पसंख्यकों के साथ किस तरह का अपनत्व दिखाया जाता है.
भारत में अपनी जाति बिरादरी वाली सुरक्षित सीट से चुनाव लड़ने का चलन नेताओं में देखा जाता है.
क्या ऐसा नहीं हो सकता कि प्रधानमंत्री मोदी राहुल गांधी के वायनाड सीट से चुनाव लड़ने का जवाब मुरादाबाद अथवा रामपुर से चुनाव लड़ कर दें और साबित करें कि वो वास्तव में "सबका साथ और सबका विकास" चाहते हैं.
( ये लेखक के निजी विचार हैं)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)