सिंधु जल संधि को समाप्त क्यों नहीं कर सकता भारत?

    • Author, अभिजीत श्रीवास्तव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ़ के काफिले पर हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान से 'मोस्ट फेवर्ड नेशन' का दर्जा वापस लेने की घोषणा तो कर दी लेकिन कई हलकों में यह आवाज़ भी उठ रही है कि भारत को सिंधु जल समझौते को समाप्त कर देना चाहिए, हालांकि आधिकारिक तौर पर ऐसा अब तक कुछ नहीं कहा गया है.

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में विदेश सचिव रहे कंवल सिब्बल कहते हैं, "भारत को जितना सख़्त होना चाहिए वो नहीं हो पा रहा है. भारत को सिंधु जल संधि को तोड़ देना चाहिए, इससे पाकिस्तान सीधा हो जाएगा."

हालाँकि कई जानकारों को लगता है ये इतना सीधा नहीं है.

पाकिस्तान में भारत के पूर्व राजदूत जी पार्थसारथी कहते हैं, "जम्मू-कश्मीर में भारत को हाइड्रो-इलेक्ट्रिक पावर की ज़रूरत को पूरा करने के लिए पानी की आवश्यकता है लेकिन सिंधु जल संधि को तोड़ देना एक विवादित विषय है."

भारत के पूर्व विदेश सचिव मुचकुंद दूबे भी कहते हैं, "संधि को रद्द करके पाकिस्तान को मिले उसके अधिकार से वंचित करने से बहुत बड़ा मतभेद हो सकता है, बहुत बड़ी घटनाएं हो सकती हैं."

दरअसल पिछले कुछ सालों के दौरान भारत-पाकिस्तान के बीच जितनी बार विवाद बढ़ा है, उतनी बार सिंधु जल समझौते को तोड़ने की बात उठती रही है.

जब कश्मीर के उड़ी में सेना मुख्यालय पर हमले के बाद भारत ने जल विवाद पर दिल्ली में होने वाली बैठक को रद्द कर दिया था.

तब पाकिस्तान के अंग्रेज़ी अख़बार 'द न्यूज़' ने लिखा था कि जैसे जैसे जलवायु परिवर्तन की हकीक़त सामने आ रही है और जल संसाधनों की किल्लत बढ़ती जा रही है, भारत का 'पानी को हथियार के रूप में' इस्तेमाल करने की संभावना और बढ़ती जाएगी.

वहीं 'एक्सप्रेस ट्रिब्यून' ने लिखा था कि जलवायु परिवर्तन के कारण भारत और पाकिस्तान के बीच जल विवादअन्य सभी विवादों पर भारी है.

कराची के उर्दू अख़बार 'डेली एक्सप्रेस' ने लिखा कि "समय की मांग है कि जल विवाद पर बातचीत जारी रहनी चाहिए और पाकिस्तान अपने हितों का बचाव करे."

क्या है सिंधु जल संधि?

ब्रिटिश राज के दौरान ही दक्षिण पंजाब में सिंधु नदी घाटी पर बड़े नहर का निर्माण करवाया था. उस इलाके को इसका इतना लाभ मिला कि बाद में वो दक्षिण एशिया का एक प्रमुख कृषि क्षेत्र बन गया.

भारत और पाकिस्तान के बीच बंटवारे के दौरान जब पंजाब को विभाजित किया गया तो इसका पूर्वी भाग भारत के पास और पश्चिमी भाग पाकिस्तान के पास गया.

बंटवारे के दौरान ही सिंधु नदी घाटी और इसके विशाल नहरों को भी विभाजित किया गया. लेकिन इससे होकर मिलने वाले पानी के लिए पाकिस्तान पूरी तरह भारत पर निर्भर था.

पानी के बहाव को बनाए रखने के उद्देश्य से पूर्व और पश्चिम पंजाब के चीफ़ इंजीनियरों के बीच 20 दिसंबर 1947 को एक समझौता हुआ.

इसके तहत भारत को बंटवारे से पहले तय किया गया पानी का निश्चित हिस्सा 31 मार्च 1948 तक पाकिस्तान को देते रहना तय हुआ.

1 अप्रैल 1948 को जब समझौता लागू नहीं रहा तो भारत ने दो प्रमुख नहरों का पानी रोक दिया जिससे पाकिस्तानी पंजाब की 17 लाख एकड़ ज़मीन पर हालात ख़राब हो गए.

भारत के इस कदम के कई कारण बताए गए जिसमें एक था कि भारत कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान पर दबाव बनाना चाहता था. बाद में हुए समझौते के बाद भारत पानी की आपूर्ति जारी रखने पर राज़ी हो गया.

स्टडी के मुताबिक 1951 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने टेनसी वैली अथॉरिटी के पूर्व प्रमुख डेविड लिलियंथल को भारत बुलाया. लिलियंथल पाकिस्तान भी गए और वापस अमरीका लौटकर उन्होंने सिंधु नदी घाटी के बंटवारे पर एक लेख लिखा.

ये लेख विश्व बैंक प्रमुख और लिलियंथल के दोस्त डेविड ब्लैक ने भी पढ़ा और ब्लैक ने भारत और पाकिस्तान के प्रमुखों से इस बारे में संपर्क किया. और फिर शुरू हुआ दोनो पक्षों के बीच बैठकों का सिलसिला.

ये बैठकें करीब एक दशक तक चलीं और आखिरकार 19 सितंबर 1960 को कराची में सिंधु नदी घाटी समझौते पर हस्ताक्षर हुए.

समझौते में क्या है?

जी पार्थसारथी कहते हैं कि सिंधु समझौते के तहत सिंधु नदी घाटी की नदियों को पूर्वी और पश्चिमी नदियों में विभाजित किया गया.

समझौते के मुताबिक झेलम और चेनाब को पश्चिमी नदियां बताते हुए इनका पानी पाकिस्तान के लिए होगा कहा गया.

जबकि रावी, ब्यास और सतलज को पूर्वी नदियां बताते हुए इनका पानी भारत के लिए तय किया गया.

समझौते के मुताबिक भारत पूर्वी नदियों के पानी का, कुछ अपवादों को छोड़कर, बेरोकटोक इस्तेमाल कर सकता है. वहीं पश्चिमी नदियों के पानी के इस्तेमाल का कुछ सीमित अधिकार भारत को भी दिया गया था. जैसे बिजली बनाना, कृषि के लिए सीमित पानी.

इस संधि में दोनों देशों के बीच समझौते को लेकर बातचीत करने और साइट के मुआयना आदि का प्रावधान भी था.

इसी समझौते के तहत सिंधु आयोग भी स्थापित किया गया जिसके तहत दोनों देशों के कमिश्नरों के मिलने का प्रस्ताव था.

यानी दोनों कमिश्नर इस समझौते के किसी भी विवादित मुद्दे पर बातचीत कर सकते हैं और समय-समय पर आपस में मिलेंगे, ऐसा प्रावधान रखा गया था.

इसमें यह भी था कि जब कोई एक देश किसी परियोजना पर काम करता है और दूसरे को उस पर कोई आपत्ति है तो पहला देश उसका जवाब देगा, दोनों पक्षों की बैठकें होंगी.

बैठकों में भी यदि कोई हल नहीं निकल पाया तो दोनों देशों की सरकारों को इसे सुलझाना होगा.

साथ ही ऐसे किसी भी विवादित मुद्दे पर तटस्थ विशेषज्ञ की मदद लेने या कोर्ट ऑफ़ ऑर्बिट्रेशन में जाने का प्रावधान भी रखा गया है.

विवाद के विषय

सिंधु नदी घाटी के पानी को लेकर दोनों के बीच खींचतान भी चलता रहा है.

पाकिस्तान भारत की बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं पाकल (1,000 मेगावाट), रातले (850 मेगावाट), किशनगंगा (330 मेगावाट), मियार (120 मेगावाट) और लोअर कलनाई (48 मेगावाट) पर आपत्ति उठाता रहा है. जी पार्थसारथी कहते हैं, "कश्मीर अपने जलसंसाधनों का पूरा उपयोग नहीं कर पा रहा है."

वहीं भारत के कश्मीर में वहां के जलसंसाधनों का राज्य को लाभ नहीं मिलने की बात कही जाती रही है.

जब बीजेपी के समर्थन से महबूबा मुफ़्ती जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री थीं तो उन्होंने कहा था कि सिंधु जल संधि से राज्य को 20 हज़ार करोड़ का नुकसान हो रहा है और केंद्र उसकी भरपाई के लिए क़दम उठाए.

भारत के पूर्व कैबिनेट सचिव, रक्षा सचिव, गृह सचिव और जल संसाधन सचिव रहे नरेश चंद्रा ने बीबीसी से कहा था कि, "जब तुलबुल प्रोजेक्ट कश्मीर में बनने की बात आई तो पाकिस्तान ने आपत्ति जताई. तुलबुल प्रोजेक्ट में बारिश के दौरान पानी रोकने की बात थी जो समझौते के अनुसार नहीं किया जा सकता था क्योंकि समझौते में ये लिखा गया था कि पानी का इस्तेमाल इस तरह से कर सकते थे कि उसकी धारा बहती रहे."

हालांकि उनका मानना था कि यह भारत और पाकिस्तान के बीच ऐसा समझौता है जो काफी सफल रहा है.

तो क्या भारत समझौता तोड़ सकता है?

सिंधु नदी घाटी संधि पर 1993 से 2011 तक पाकिस्तान के कमिश्नर रहे जमात अली शाह ने बीबीसी को बताया था कि, "समझौते के मुताबिक कोई भी एकतरफ़ा तौर पर इस संधि को नहीं तोड़ सकता है या बदल सकता है. भारत-पाकिस्तान को साथ मिलकर ही इस संधि में बदलाव करना होगा या एक नया समझौता बनाना होगा."

वहीं वैश्विक झगड़ों पर किताब लिख चुके ब्रह्म चेलानी ने भी लिखा था कि "भारत वियना समझौते के लॉ ऑफ़ ट्रीटीज़ की धारा 62 के अंतर्गत यह कह कर पीछे हट सकता है कि पाकिस्तान चरमपंथी गुटों का उसके ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर रहा है. अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने कहा है कि अगर मूलभूत स्थितियों में परिवर्तन हो तो किसी संधि को रद्द किया जा सकता है."

वहीं मुचकुंद दूबे कहते हैं, "बंटवारे के बाद सिंधु घाटी से गुजरने वाली नदियों पर नियंत्रण को लेकर उपजे विवाद की मध्यस्थता विश्व बैंक ने की थी. लिहाजा यदि भारत यह समझौता तोड़ता है तो पाकिस्तान सबसे पहले विश्व बैंक के पास जाएगा. और विश्व बैंक भारत पर ऐसा नहीं करने के लिए दबाव बनेगा. विदेश नीति के लिहाज यह विश्व बैंक और इसके सदस्य देशों के साथ संबंध ख़राब करने वाला होगा."

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