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ममता बनर्जी का क़द धरने से बढ़ा या ये बीजेपी का डर है
- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
तेजस्वी यादव और एम कनिमोढ़ी तो एक दिन पहले ही यहां आ गए थे. मंगलवार शाम आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और तेलुगू देशम पार्टी प्रमुख चंद्रबाबू नायडू ममता बनर्जी से मिलने कोलकाता पहुंचे.
राहुल गांधी से लेकर अरविंद केजरीवाल तक और महबूबा मुफ़्ती से उमर अब्दुल्लाह तक, जो नहीं आ पाए, उन्होंने सीबीआई के कथित दुरुपयोग को लेकर धरने पर बैठी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री को या तो फ़ोन कर साथ खड़े रहने का भरोसा दिलाया, या उनके पक्ष में बयान दिया और मामला संसद तक गूंजा.
हाल के वर्षों में किसी भी मुद्दे, यहां तक कि रफ़ाल लड़ाकू विमान सौदे में कथित गड़बड़ी या नरेंद्र मोदी सरकार के अविश्वास प्रस्ताव पर, विपक्ष इतनी मज़बूती से एक साथ खड़ा नहीं दिखा है जितना केंद्रीय जांच ब्यूरो के कथित ग़लत इस्तेमाल पर.
लोकसभा में बीजू जनता दल सांसद के भर्तहरि महताब ने सीबीआई के रवैए को 'ग़ैर-पेशेवर' बताया और केंद्र सरकार को याद दिलाया कि ये (भारत) अंधेर नगरी नहीं है.
नवीन पटनायक का बीजेडी हाल तक लगभग सभी मामलो में यहां तक कि विपक्षी एकता के मुद्दे पर भी तटस्थता बरतता रहा है.
टीआरएस के अलावा सब साथ
फ़िलहाल तेलंगाना राष्ट्र समीति के अलावा सभी विपक्षी दल और शिव सेना तक एकजुट हैं.
ये मामला इतना बड़ा बनकर उभरा है कि सोमवार को एनसीपी नेता शरद पवार के घर पर बैठक हुई जिसके बाद उन्होंने कहा कि जो ममता के साथ हुआ वो केजरीवाल के साथ दिल्ली में हो चुका है.
ममता बनर्जी जिस बात को लेकर धरने पर बैठीं वो रविवार की उस घटना से संबंधित थी जिसमें सीबीआई का 40 लोगों का एक दल कोलकाता के पुलिस कमिशनर राजीव कुमार के घर शारदा और रोज़ वैली चिट फंड से पूछताछ के सिलसिले में जा पहुंचा.
टीम का कहना था कि राजीव कुमार साक्ष्यों को मिटाने की कोशिश कर रहे हैं.
ममता बनर्जी ने इस पूरे मामले को उसी हफ़्ते हुई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण से जोड़ दिया जिसके दौरान पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के मुताबिक़ उन्हें धमकी दी गई थी.
मामले को मुद्दा बनाकर तृणमूल कांग्रेस प्रमुख धरने पर बैठ गईं और फिर मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा.
लेकिन साथ ही पूरे देश का फ़ोकस मेट्रो चैनल की तरफ़ मुड़ गया.
राजनीतिक विश्लेषक कल्याणी शंकर कहती हैं कि इस पूरे मामले ने "ममता बनर्जी की राष्ट्रीय नेता की दावेदारी को मज़बूती दी है."
कल्याणी शंकर कहती हैं कि इसकी कोशिश उन्होंने जनवरी माह में हुई विपक्ष की रैली में भी की थी लेकिन इस घटना ने उन्हें बहुत आगे पहुंचा दिया.
ममता बनर्जी दिसंबर 2006 में इसी मेट्रो चैनल पर टाटा समूह की सिंगूर फ़ैक्ट्री के ख़िलाफ़ धरने पर बैठी थीं और उसके बाद वो प्रदेश की मुखिया बनी थीं और अब दूसरी बार सूबे की मुख्यमंत्री की कुर्सी पर हैं.
बीजेपी की मजबूरी
लेकिन राजनीतिक विश्लेषक और बीजेपी को बहुत क़रीब से जानने वाले शेखर अय्यर का कहना है कि ममता बनर्जी ने जो किया वो उनकी मजबूरी है क्योंकि बीजेपी सूबे में पैठ बना रही है और ममता बनर्जी घबराई हुई हैं.
शेखर अय्यर कहते हैं कि प्रदेश में कांग्रेस कमज़ोर पड़ चुकी है, वामपंथी दलों के ज़मीनी लोग ममता के दल में शामिल हो चुके हैं तो जनता को भी एक विपक्ष की तलाश है जो उसे बीजेपी में दिख रही है.
हाल के दिनों में कांग्रेस के जाने-माने दिवंगत नेता ग़नी ख़ान चौधरी के परिवार के कुछ लोगों के बीजेपी में शामिल होने को शेखर अय्यर बीजेपी की बेहतर होती स्थिति के उदाहरण के तौर पर पेश करते हैं.
जानकार कहते हैं कि बीजेडी के इस मामले में ममता के साथ खड़े होने को चिट फंड में हुई जांच से जोड़कर ही देखा जाना चाहिए.
उनका कहना है कि इस मामले में बीजेडी के कुछ नेता पहले गिरफ्तार हो चुके हैं. वो भी चाहते हैं कि किसी तरह से इस जांच का दायरा पश्चिम बंगाल से आगे ने बढ़े.
लेकिन इसका दूसरा पहलू ये भी है कि बीजेपी के लिए इस बार उत्तर प्रदेश, बिहार और हिंदी पट्टी के दूसरे राज्यों में सीटों की तादाद को और बढ़ाना मुश्किल है, बल्कि कहा तो ये जा रहा है कि वो घटेगी, तो उसकी भरपाई वो पश्चिम बंगाल और ओडीशा जैसे राज्यों से करना चाहती है.
उत्तर-पूर्व जहां बीजेपी ने ज़मीन मज़बूत की थी, एक तो सीटें कम हैं और दूसरे नागरिकता संशोधन मसौदे को लेकर भारी नाराज़गी है.
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