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मोदी से आर-पार की जंग के लिए ममता कितनी तैयार? - नज़रिया
- Author, कल्याणी शंकर
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
इसमें कोई शक नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ धरने पर बैठने के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के राजनीतिक क़द में बढ़ोतरी हुई है.
ममता बनर्जी लोकसभा चुनावों के लिए बनाई अपनी रणनीति के तहत धीरे-धीरे क़दम बढ़ा रही हैं ताकि वह नरेंद्र मोदी को पटखनी देकर प्रधानमंत्री पद पर बैठ सकें.
शारदा चिटफ़ंड घोटाले के मामले में कोलकाता के पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार से सीबीआई की पूछताछ के ख़िलाफ़ धरने पर बैठना भी राष्ट्रीय राजनीति में आने की ओर उठाया गया एक क़दम है.
सीबीआई ने राजीव कुमार पर शारदा चिटफ़ंड मामले में सुबूतों को नष्ट करने का आरोप लगाया है.
इस मामले में ममता बनर्जी इसप्लानाडे इलाक़े के मेट्रो चैनल पर धरने पर बैठी. यह वही जगह है जहां पर साल 2006 में उन्होंने सिंगूर में टाटा मोटर्स की फैक्ट्री के लिए खेती की ज़मीन के अधिग्रहण के ख़िलाफ़ धरना दिया था.
हालांकि, इस समय विपक्ष में प्रधानमंत्री पद के लिए कई उम्मीदवार हैं. लेकिन अभी तक विपक्षी दलों में किसी एक चेहरे के लिए आम सहमति नहीं बनी है.
लेकिन ममता बनर्जी ने अपनी जगह राहुल गांधी और शरद पवार जैसे उम्मीदवारों के साथ पहली पंक्ति में बना ली है.
अगर ममता बनर्जी अपने इस वर्तमान संघर्ष में मोदी को हरा देती हैं तो वह निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी हासिल कर लेंगी.
विपक्षी दलों का समर्थन
ममता बनर्जी ने अपनी इस लड़ाई में विपक्षी दलों का समर्थन हासिल किया है.
लेकिन ये ममता बनर्जी की एक ख़ास छवि की वजह से हुआ है जो उन्होंने बीते कई सालों में बनाई है.
इसके साथ ही क्षेत्रीय नेताओं में एक तरह का डर है कि अगर ममता के साथ कुछ होता है तो भविष्य में वही उनके साथ भी हो सकता है.
इस बात की भी संभावना है कि क्षेत्रीय दल राहुल गांधी की अपेक्षा ममता बनर्जी के साथ ज़्यादा सहज हैं.
इसी के चलते पूर्व प्रधानमंत्री देवेगैड़ा से लेकर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और अन्य क्षेत्रीय नेता जैसे चंद्रबाबू नायडु लोकतंत्र बचाने की अपील पर उनके समर्थन में आकर खड़े हो जाते हैं.
ममता बनर्जी इसी समय बेहद चालाकी से इस राजनीतिक अवसर का फ़ायदा उठाकर ख़ुद को लाइमलाइट में ले आती हैं.
ये देखना अपने आप में रोचक है कि रविवार की रात धरने का ऐलान करने के बाद कितनी तेज़ी से उनकी पार्टी उनके समर्थन में खड़ी हो गई.
उनकी पार्टी के कार्यकर्ता कुछ ही मिनटों में धरनास्थल पर पहुंच गए और आम आदमी पार्टी से लेकर राहुल गांधी ने तेज़ी से उनका समर्थन करने की घोषणा करते हुए उनके साथ बातचीत कर ली.
धरने का बैकग्राउंड
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे पहली बात ये ही हुई कि ममता बनर्जी ने अपना राजनीतिक माद्दा दिखाते हुए 19 जनवरी को लगभग सभी विपक्षी दलों को कोलकाता में अपनी रैली में शामिल कर लिया.
कोलकाता के ब्रिगेड ग्राउंड की रैली में 23 पार्टियों के नेताओं ने जब एक साथ हाथ उठाए तो बीजेपी के लिए ये काफ़ी असहज करने वाला संकेत था.
इस रैली का संदेश ये था कि ममता बनर्जी अपने मतदाताओं की नज़र में खुद को एक बड़ी राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित करना चाहती हैं.
हालांकि, इसका व्यापक संदेश पूरे देश के लिए था कि विपक्षी नेता उनके नेतृत्व तले खड़े होने के लिए तैयार हैं.
ऐसे में उम्मीद ये है कि जब विपक्षी नेता अपना नेता चुनने के लिए प्रक्रिया शुरू करें तो दीदी किसी तरह की प्रतिस्पर्धा नहीं चाहती हैं.
मोदी के ख़िलाफ़ मोर्चा
साल 2014 से ममता बनर्जी मोदी सरकार के ख़िलाफ़ अपना मोर्चा खोले हुए हैं. इसमें गोहत्या से लेकर गोमांस पर प्रतिबंध, जीएसटी, नोटबंदी और कई अन्य विवादास्पद मुद्दे शामिल हैं.
ममता ने अपनी छवि एक ऐसे विद्रोही नेता के रूप में बनाई है जो कि देश के लिए संघर्ष कर सकती हैं.
ऐसे में एक ऐसी महिला की छवि, जो कि शक्ति के प्रति आसक्त नहीं है, इन सबने ममता बनर्जी की काफ़ी मदद की है.
इसके साथ ही उन्होंने युवाओं को लुभाने में सफलता हासिल की है, और युवा शक्ति ही राजनीति में ममता बनर्जी की मदद करती है.
ममता की रणनीति समझने के लिए उनके चार दशक लंबे राजनीतिक करियर के पीछे उनकी सोच को समझना ज़रूरी है.
दिल्ली की राजनीति
सात बार की लोकसभा सदस्य ममता बनर्जी दिल्ली की राजनीति के लिहाज़ से नौसिखिया नहीं हैं.
वह अब तक तीन बार केंद्रीय मंत्री रह चुकी हैं और उनके पास राष्ट्रीय अनुभव भी है.
80 के दशक की शुरुआत में ही ममता बनर्जी ने समझ लिया था कि पश्चिम बंगाल में उनका मुख्य विरोधी दल सीपीआई-एम है. और, उन्होंने तब से ही साम्यवाद के ख़िलाफ़ अपना मोर्चा खोला हुआ है.
नंदीग्राम से लेकर सिंगूर धरना करते हुए उनका मुख्य उद्देश्य कॉमरेड्स को सत्ता से बाहर करना था.
वह संघर्ष की राजनीति करने वाली नेता हैं और सड़क की राजनीति में माहिर मानी जाती हैं.
इसी एकाग्रता के चलते ममता बनर्जी ने साल 2011 में 33 सालों से सत्ता पर विराजमान सीपीआई-एम को सत्ता से बाहर कर दिया.
इसके बाद 2016 में भी ममता बनर्जी ने सफलतापूर्वक वापसी की, और अब वह हैट्रिक की तैयारी में हैं.
लोकसभा चुनाव की बात की जाए तो साल 2014 के चुनाव में ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की 42 में से 34 सीटों पर जीत दर्ज की थी. इस तरह वह बीजेपी, कांग्रेस, एआईएडीएमके के बाद सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति बनकर उभरी थीं.
इसमें अब अगला बड़ा प्रदर्शन आगामी 12 फरवरी को होगा जब संसद सत्र ख़त्म होने से पहले सभी ग़ैर-बीजेपी मुख्यमंत्री धरने पर बैठेंगे.
इस तरह ये रणनीति आगे बढ़ेगी और ममता बनर्जी यहां भी केंद्र में रहेंगी.
हालांकि, ममता बनर्जी के लिए प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी के लिए दूसरे नेताओं का समर्थन हासिल करना एक चुनौती होगा क्योंकि वे भी अपने आपको प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार मानते हैं.
ऐसे में ममता बनर्जी की महत्वाकांक्षाएं चाहें जो भी हों लेकिन फ़िलहाल के लिए उन्होंने अपने आपको बीजेपी-विरोधी गुट के प्रमुख के रूप में पेश कर दिया है.
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