बाघ ही क्यों हो जाता है बाघ के खून का प्यासा

    • Author, कमलेश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

ये तो सभी जानते हैं कि बाघ दूसरे जानवरों को मारकर उन्हें अपना भोजन बनाता है. लेकिन मध्य प्रदेश के कान्हा राष्ट्रीय पार्क की एक घटना में एक बाघ ने ही दूसरे बाघ को मारकर खा लिया.

ऐसा बहुत कम होता है कि एक बाघ दूसरे बाघ को मारकर खा जाए. लेकिन अलग-अलग टाइगर रिज़र्व में ऐसी कुछ घटनाएं सामने आई हैं.

कान्हा राष्ट्रीय पार्क के रिसर्च ऑफिसर राकेश शुक्ला ने बताया, ''19 जनवरी को पेट्रोलिंग के दौरान एक बाघ की हड्डियां मिली थीं. इस बाघ को किसी दूसरे बाघ को खाते देखा गया था. हालांकि अभी ये स्पष्ट नहीं है कि जिसे मारा गया वो बाघ था या बाघिन. इसकी जांच की जा रही है. लेकिन, उसकी ह​ड्डियों से पता चलता है कि वो बालिग नहीं था. उसकी उम्र करीब डेढ़ साल रही होगी. वहीं मारने वाला बाघ चार से पांच साल का बालिग था. दोनों के बीच लड़ाई हुई थी.''

अपनी प्रजाति के जीव को खाना सामान्य बात नहीं है. इसे कैनिबलिज़्म कहते हैं. जैसे कि इंसानों में ऐसा होना अस्वाभाविक माना जाता है उसी तरह ये दूसरी प्रजातियों में भी बहुत कम होता है.

लेकिन कान्हा राष्ट्रीय पार्क में ऐसा होने के क्या कारण हैं. दो बाघों के बीच में लड़ाई होना तो स्वाभाविक है लेकिन एक-दूसरे को खा जाने की स्थिति क्यों आ जाती है.

क्या हैं कारण

इस संबंध में वाइल्ड लाइफ एक्टिविस्ट अजय दुबे कहते हैं कि ऐसा बहुत कम होता है लेकिन इस तरह की घटनाएं पहले भी देखी गई हैं. ये बिग कैट फैमिली की आदत होती है. वो लड़ाई में न सिर्फ मार डालते हैं बल्कि कभी-कभी खा भी लेते हैं.

अजय दुबे बताते हैं, ''आमतौर पर ऐसा तब होता है जब बाघ लड़ाई में बहुत ज़्यादा गुस्से में होता है. इस तरह खाने का मतलब ये नहीं है कि वो भूख मिटा रहा है बल्कि उसे बहुत ज़्यादा नाराज़गी है. वो अपना गुस्सा निकालता है और शव को क्षत-विक्षत करके भी छोड़ देता है. फिर बाद में दूसरे जानवर भी उस शव को खा लेते हैं.''

वन्यजीव विशेषज्ञ और लेखक वाल्मीक थापर कहते हैं कि पूरे भारत में बाघ और पूरी दुनिया में शेर के मामले में ऐसी घटनाएं होती हैं.

रणथंभौर टाइगर रिजर्व में भी ऐसा हुआ है. वो इतने गुस्से में लड़ते हैं कि दूसरे बाघ को खा जाते हैं. लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता. पर वो क्यों खाते हैं या क्यों छोड़ देते हैं, इसका जवाब किसी के पास भी नहीं है. ये सिर्फ बाघ के दिमाग में होता है.

अपना-अपना इलाका बांटकर रखने वाले इस तेज-तर्रार और खूंखार जानवर के बीच लड़ाइयां क्यों होती हैं?

इस सवाल पर अजय दुबे बताते हैं कि बाघों और बाघ-बाघिन के बीच लड़ाई होने की अलग-अलग वजहें होती हैं. बाघों के बीच अक्सर इलाके को लेकर लड़ाई होती है.

बाघिन कभी इलाका नहीं बनाती. लेकिन जब एक बाघ दूसरे के इलाके में घुसने की कोशिश करता है तो उनके बीच लड़ाई हो जाती है. फिर इसमें बाघ इतना गुस्सा हो जाता है कि वो मारने के बाद उसे खाकर मिटा देना चाहता है.

वह कहते हैं कि बाघिन की बात करें तो इलाके को लेकर बाघ और बाघिन के बीच कभी लड़ाई नहीं होती. इनमें लड़ाई की वजह मेटिंग होती है.

इसमें भी दो-तीन स्थितियां होती हैं. कई बार बाघिन के मेटिंग (समागम) से मना करने पर बाघ उससे लड़ पड़ता है. कई मामलों में बाघिन अपने बच्चों के कारण भी मेटिंग से मना करती है.

बाघिन के बच्चे दो साल तक उसके साथ रहते हैं. बाघ उसके बच्चों को भी मार सकता है क्योंकि बच्चे न होने पर बाघिन मेटिंग के लिए तैयार हो जाती है. शेर, तेंदुआ और बाघ सभी में यही प्रवृति पाई जाती है.

बाघों की लड़ाई को लेकर राकेश शुक्ला एक और कारण बताते हैं. वह कहते हैं, ''कई बार दो बाघ एक बाघिन के लिए लड़ जाते हैं. इसमें भी वो एक-दूसरे पर हमला कर देते हैं. फिर अगर बात नाबालिग बाघ की हो तो वो जब मां से अलग होते हैं तो दूर-दूर तक निकल जाते हैं. उनमें बालिग बाघ जितनी परिपक्वता नहीं होती. फिर ​किसी बड़े बाघ से उनका सामना होने पर लड़ाई में उनका मरना तय होता है.''

वह कहते हैं कि कान्हा राष्ट्रीय पार्क भी उच्च घनत्व क्षेत्र है. यहां बाघों की संख्या ज़्यादा है. ऐसे में इलाक़े और बाघिन को लेकर टकराव बढ़ जाता है.

बाघों में तनाव

बाघों में लड़ाई तो होती है लेकिन मारकर खा जाना बाघ की मानसिक स्थिति की ओर भी इशारा करता है.

अजय दुबे कहते हैं, ''इतना ज़्यादा गुस्सा तनाव के कारण भी हो सकता है. ये मुझे तनाव प्रबंधन में फेलियर होना भी लगता है. बाघ बहुत तनाव में हो सकता है और ये तनाव क्यों है, ये देखने लायक है. ये बहुत ज़्यादा पर्यटन के कारण भी होता है. पर्यटकों की भीड़ के चलते तनाव बढ़ जाता है और फिर ऐसा होना अनोखा मामला होता है.''

वहीं तनाव और हार्मोनल बदलाव के बारे में राकेश शुक्ला भी कहते हैं. लेकिन वो पर्यटन के बढ़ते दबाव को इसका कारण नहीं मानते हैं. उन्होंने कहा कि इस बारे में कुछ भी स्पष्ट तौर पर नहीं कहा जा सकता.

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