क्या आदमखोर हो चुके बाघ को मार देना ही एकमात्र विकल्प है

    • Author, स्वामीनाथन नटराजन
    • पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस

मध्य भारत में बड़े स्तर पर एक खोज अभियान चल रहा है. 100 से अधिक वन विभाग के अधिकारी, गार्ड्स, बेहोश करने वाले विशेषज्ञ, शार्पशूटर्स, ट्रैकर्स और पशुचिकित्सकों की सेना एक बाघिन का शिकार करने में लगी है जो करीब 160 वर्ग किलोमीटर के विशाल इलाके में घूम रही है.

वन विभाग ने 100 से अधिक कैमरों के जाल बिछाए हैं. लेकिन यह बड़ी बिल्ली इंसानों का मात देते हुए अब भी उनकी पकड़ से बाहर है.

स्थानीय गांववाले उतावले होते हुए फौरन इस बाघिन को वहां से हटाए जाने की मांग कर रहे हैं.

पांढरकवड़ा रेंज के क्षेत्रीय वन अधिकारी केएम अपर्णा कहते हैं, "इस इलाके में पहाड़ी, घाटियां और घने जंगल हैं. घने जंगल और झाड़ियां बाघिन को कवर दे रहे हैं. इस इलाके की कई जगहों पर केवल पैदल ही पहुंचा जा सकता है. यही वजह है कि इस अभियान में वक्त लग रहा है."

भारतीय वन विभाग के दिशानिर्देशों के मुताबिक जानवर को बेहोश करके पकड़ने के लिए हर संभव प्रयास किए जाने चाहिए. लेकिन इसमें सफलता नहीं मिलती है तो अधिकारी को उस जानवर को मारने का अधिकार दिया गया है.

लोगों की मौतें

भारत के पर्यावरण मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक बाघों और हाथियों की वजह से अप्रैल 2014 से मई 2017 के बीच 1,144 लोग मारे गए हैं.

हालांकि इनमें से 1,052 हाथियों की वजह से मारे गए जबकि 92 लोगों की मौत बाघ के कारण हुई.

इसके अलावा अन्य मांसाहारी जैसे कि तेंदुआ, शेर और भालू भी इंसानों को मारते हैं. सांप और कुत्तों की वजह से भी हर साल हज़ारों मौतें होती हैं.

बाघों का समर्थन

सभी जंगली जानवरों में बाघ सबसे अधिक भयभीत करने वाला पशु है लेकिन शहरी अभिजात वर्ग इसका समर्थन करता है और यही कारण है कि अधिकारी अन्य विकल्पों को तलाश करने के लिए मजबूर होना पड़ता है ताकि ये बिग कैट जीवित रह सकें.

वन्यजीव संरक्षणकर्ता अजय दुबे कहते हैं, "जंगलों में कई इंसानों की मौतें हुई हैं. ये हम इंसान ही हैं जो बाघों की जगह में घुसपैठ करते हैं."

लेकन वन विभाग इससे सहमत नहीं है. डीएनए टेस्ट इस बात का सबूत है कि यह बाघिन पांच लोगों की मौत की ज़िम्मेदार है.

केएम अपर्णा कहते हैं, "इस बाघिन ने हाल में एक आदमी को मारा है जो खेत में काम कर रहा था और उसकी बॉडी को घसीटते हुए सड़क के पार जंगलों में ले गई. यहां तक कि जब ग्रामीणों के एक समूह ने उस पर पत्थर फेंकना शुरू किया तो भी वो नहीं डरी. यह सामान्य व्यवहार नहीं था."

सितंबर में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने इस बाघ की शूटिंग पर रोक लगाने की याचिका को ख़ारिज कर दिया, जिसके बाद यह खोजी अभियान फिर से शुरू हुआ.

नाकामयाबी

सशस्त्र वन रेंजर हाथियों का उपयोग कर रहे थे क्योंकि उन्हें घने जंगलों में घुसना था जहां वाहन नहीं जा सकते.

न केवल हाथी इन मुश्किल हालातों में घुस सकते हैं बल्कि शार्पशूटर्स के लिए भी यह एक लाभ की स्थिति होती है और साथ ही उनके लिए एक सुरक्षित जगह भी.

लेकिन इस दौरान अक्तूबर के पहले हफ्ते में खोजी अभियान में शामिल एक प्रशिक्षित हाथी भटक गया और उसने एक महिला को कुचल दिया.

इसके बाद सभी पांच हाथियों को इस अभियान से हटा दिया गया.

बाघ की आबादी

भारत में कई वर्षों से घट रही बाघ की आबादी, संरक्षण प्रयासों के बाद 2006 से लगातार बढ़ी है.

आज भारत में दुनिया भर के 60 फ़ीसदी बाघ रहते हैं. 2014 में किए गए एक राष्ट्रीय जनगणना से पता चला है कि बाघ की आबादी 2,226 हो गई है, यानी पिछले तीन सालों में इसमें 30% की वृद्धि हुई है.

लेकिन इस बाघिन समेत कई बाघ तयशुदा अभयारण्य से बाहर रहते हैं. इसकी वजह से अक्सर इंसानों और बाघों के बीच हिंसक टकराव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है.

1.3 अरब की आबादी और तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाले देश में ऐसी बहुत कम ही जगहें हैं जहां इंसानी गतिविधियां न के बराबर हैं.

आदमखोर

माना जाता है कि केवल घायल और वृद्ध बाघ ही आदमखोर बनते हैं. लेकिन अक्सर युवा बाघ भी इंसानों को मारते देखे गए हैं.

भारत के वन्यजीव अध्ययन केंद्र के निदेशक के उल्लास करंथ कहते हैं, "अधिकतर बाघ इंसानों के लिए पूरी तरह हानिकारक होते हैं. एक हज़ार में एक से भी कम आदमखोर बनते हैं. लेकिन हम चांस नहीं ले सकते और जो बाघ आदमखोर साबित हो गया उसे जितनी जल्दी संभव हो मार दिया जाना चाहिए."

देश के कई राज्यों में जानवरों को बेहोश करने और उन्हें पकड़ने में सक्षम प्रशिक्षित लोगों की कमी है. बेहोश करने वाले डार्ट्स का उपयोग करना भी मुश्किल होता है क्योंकि उन्हें बेहद नजदीक से दागा जाता है.

करंथ कहते हैं, "उन्हें बेहोश कर किसी अन्य जगह पर छोड़ना और लोगों को मारने का दावत देना है. शहरों में लोग अपने घरों में सुरक्षित बैठ कर बाघों की सुंदरता की बातें करते हैं, जबकि यह ग्रामीण लोग ही होते हैं जो ऐसे बाघों को एक जगह से दूसरी जगह छोड़े जाने पर जोखिमों की स्थिति में होते हैं."

पागलपन

वन्यजीव संस्थान के पूर्व डीन, जे जे जॉनसिंह याद करते हैं कि दक्षिण भारत में तीन महिलाओं की हत्या करने वाले बाघ की मौत का किस तरह स्थानीय लोगों ने जश्न मनाया था.

वो बताते हैं, "मैं ऊटी में था, जब चार साल पहले एक आदमखोर बाघ को गोली मारी गई थी. लोगों ने मृत बाघ के शव का जुलूस निकाला. स्थानीय लोगों के लिए यह बड़ी राहत की बात थी."

वो कहते हैं, "जब एक आदमखोर शिकार पर होता है तो वहां की पूरी आबादी में डर घुस जाता है. कैसे इसने किसी व्यक्ति को घायल किया और मार डाला इसकी कहानी जंगल की आग की तरह फैल जाएगी और यह डर लोगों में पागलपन पैदा कर देता है."

वो कहते हैं, "यह आम जीवन की गतिविधियों में अचानक से रुकावट ला सकता है. लगभग सभी काम रुक से जाते हैं. स्कूलों, दुकानों को कई दिनों के लिए बंद करना पड़ता है. दूसरे जानवरों के मामले में ऐसा नहीं होता है."

टाइगर रिजर्व के पास रहने वाले ग्रामीण समुदाय भी शिकारियों के गतिविधियों के बार में जानकारी देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि उन्हें हटाने से बाघों के संरक्षण के प्रयासों में बाधा आएगी. अजय दुबे कहते हैं बाघ के समर्थन में देश के कई हिस्सों से मैसेज लगातार प्राप्त हो रहे हैं.

वो कहते हैं, "यदि आप इस जानवर को मारेंगे तो उसके साथ ही उसके दो शावक भी मारे जाएंगे. 3000 की आबादी में से तीन जावनरों का मारा जाना एक बड़ा नुकसान है."

हालांकि इन तमाम बहसों के बीच स्थानीय लोगों में डर मौजूद है और उन्हें उम्मीद है कि उनकी इस समस्या का निदान जल्द ही हो जाएगा.

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