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नागरिकता संशोधन विधेयक पर क्या है भाजपा की असल राजनीति
- Author, अभिमन्यु कुमार साहा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
नागरिकता संशोधन विधेयक के ख़िलाफ़ अब आवाज़ एनडीए के भीतर से भी उठने लगी है. गठबंधन में शामिल नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड ने इसके ख़िलाफ़ हल्ला बोलने की घोषणा की है.
पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव केसी त्यागी ने कहा है कि पार्टी पुरानी नीतियों और सिद्धांतों पर क़ायम रहेगी. उन्होंने कहा है कि वो "भाजपा को आंख मूंद कर समर्थन नहीं करेंगे."
पार्टी नागरिकता संशोधन विधेयक के विरोध में 27 और 28 जनवरी को असम में निकाली जाने वाली रैली में शामिल होगी. उसके वरिष्ठ नेता ख़ुद इस रैली में शिरकत करेंगे.
इससे पहले एनडीए में शामिल रही असम गण परिषद इस मुद्दे पर गठबंधन से अपना नाता तोड़ चुकी है और इसके नेता विधेयक को असम संस्कृति के लिए ख़तरा बता रहे हैं.
विवाद की वजह क्या है?
नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 लोकसभा से पास हो चुका है और राज्यसभा के अगले सत्र में इस पर विस्तार से चर्चा होगी.
ये विधेयक जुलाई, 2016 में संसद में पेश किया गया था, जिसके तहत अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान तथा बांग्लादेश के हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई धर्म के मानने वाले अल्पसंख्यक समुदायों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान है.
पड़ोसी देशों के मुस्लिम समुदाय से जुड़े लोगों को इसके दायरे से बाहर रखा गया है. विधेयक में प्रावधान है कि ग़ैर-मुस्लिम समुदायों के लोग अगर भारत में छह साल गुज़ार लेते हैं तो वे आसानी से नागरिकता हासिल कर पाएंगे. पहले ये अवधि 11 साल थी.
इस मुद्दे पर अब विवाद बढ़ता दिख रहा है. भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के घटक दल, जिनका कुछ आधार मुस्लिम मतादाताओं के बीच भी है, उनमें इसे लेकर बेचैनी है.
सवाल उठता है कि क्या चुनाव आते-आते इस मुद्दे पर एनडीए कुनबा बिखरने लगेगा? इस सवाल के जवाब में असम के वरिष्ठ पत्रकार नवा ठाकुरिया कहते हैं कि इससे भाजपा को पूर्वोत्तर में नुक़सान झेलना पड़ सकता है.
वो कहते हैं, "इस विधेयक से पूर्वोत्तर भारत के अलावा देश का अन्य हिस्सा बहुत प्रभावित नहीं होगा. हिंदी पट्टी के क्षेत्र इसके समर्थन में है. सिर्फ़ विरोध है पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों, पश्चिम बंगाल और बिहार के कुछ हिस्सों में."
"अन्य जगहों पर अपनी मज़बूती बनाने के लिए एक राष्ट्रीय पार्टी किसी एक क्षेत्र का बलिदान कर सकती है. असम की बात की जाए तो यहां भी भाजपा को बहुत नुक़सान नहीं होगा. कुछ नुक़सान से अगर अन्य राज्यों में फ़ायदा मिलता है तो यह रणनीति बेहतर मानी जाएगी."
हिंदू अब एक वोट बैंक बन चुका है
वहीं वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी भी नवा ठाकुरिया की बातों से सहमत दिखते हैं. वो कहते हैं कि भाजपा का मूल मक़सद हिंदू राष्ट्रवाद और राष्ट्रवादी भावनाओं को भुनाने का है.
वो कहते हैं, "पार्टी ये संदेश देने की कोशिश कर रही है कि जिन घुसपैठियों ने भारत में बहुत जगह बना ली है, ख़ासकर कश्मीर, पूर्वोत्तर राज्यों में बांग्लादेश और दूसरे पड़ोसी देशों से जो लोग अवैध तरीक़े से आकर रह रहे हैं, वो उन्हें यहां नहीं रहने देना चाहते हैं."
सरकार ऐसे घुसपैठियों में से कुछ को नागरिकता देना चाहती हैं और कुछ को नहीं. अगर पाकिस्तान से हिंदू आ रहे हैं तो उन्हें नागरिकता दी जाएगी, लेकिन मुसलमान आते हैं तो नागरिकता नहीं दी जाएगी.
वो कहते हैं कि ये पूरी राजनीति देश के बाक़ी हिस्सों में भुनाने और वोट बैंक मज़बूत करने की कोशिश है.
असम के वरिष्ठ पत्रकार ठाकुरिया इसके पीछे की रानजीति समझाते हैं. वो कहते हैं "भारत के 60 प्रतिशत हिंदू अब 'वोट बैंक' बन गए हैं. पहले दलित वोट बैंक होता था, मुस्लिम वोट बैंक होता था, लेकिन अब हिंदू भी वोट बैंक बन चुका है."
और यही कारण है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी इसका विरोध नहीं करना चाहती है. राज्य सभा में कांग्रेस इस बिल का विरोध ज़रूर करेगी पर इसके ख़िलाफ़ वोट नहीं करेगी.
ठाकुरिया कहते हैं कि अगर कांग्रेस इसके ख़िलाफ़ वोट करेगी तो वो राजस्थान, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और दूसरे इलाक़े खो सकती है.
जदयू के विरोध का मतलब क्या
जदयू, भाजपा के विधेयक के ख़िलाफ़ असम में हल्ला बोलेगी, लेकिन इस विरोध का कितना असर होगा, इस सवाल पर नवीन जोशी कहते हैं कि जदयू राज्य सभा में इसके ख़िलाफ़ वोटिंग ज़रूर करेगी लेकिन अजीब बात यह है कि पार्टी राज्य में भाजपा के साथ चुनाव लड़ेगी.
जदयू को राज्य में अपनी राजनीति चमकानी है तो इसका विरोध कर रहे हैं. ऐसा कर नीतीश कुमार मुस्लिम वोट हासिल कर पाएंगे और आख़िरकार संभावित फ़ायदा सहयोगी पार्टी भाजपा की केंद्र में सरकार बनाने में ही होगा.
नवीन जोशी आगे जोड़ते हैं, "भाजपा के लिए 2014 जैसी स्थितियां आज नहीं है. कई नकारात्मकताएं आ गई हैं. वादाख़िलाफ़ी के आरोप हैं. किसानों, विभिन्न वर्गों में, सम्पन्न मराठा और जाटों में भी नाराज़गी है. एससी-एसटी एक्ट को लेकर सवर्ण नाराज़ हैं."
"उनकी इन्हीं नाराज़गी को कम करने के लिए सवर्णों को 10 फ़ीसदी आरक्षण दिया गया. अब नागरिकता विधेयक के ज़रिए पूरी कोशिश उन्हें रोकने की ही है. कुल मिलाकर असम के ज़रिए हिंदी क्षेत्र के हिंदूओं को प्रभावित करने का प्रयास किया जाएगा."
पूर्वोत्तर में कितना विरोध
पूर्वोत्तर के राज्यों में सभी विधेयक के विरोध में नहीं हैं. अरुणाचल प्रदेश इस विधेयक का समर्थन कर रहा है.
वहीं असम के आधे हिस्से में इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठ रही है तो आधा हिस्सा इसके समर्थन में खड़ा है. त्रिपुरा भी इसके पक्ष में है. सिक्किम भी शांत है. मेघालय और मणिपुर में थोड़ा विरोध है.
असम चाहता है कि 24 मार्च, 1971 के बाद बांग्लादेश से आए सभी व्यक्ति को वहां से बाहर निकाला जाए, फिर चाहे वो हिंदू हों या मुसलमान.
यहां बांग्लादेश से आए लोगों की नागरिकता का मुद्दा दशकों से है. कई साल तक हिंसक आंदोलन भी हुए. इसके बाद साल 1985 में असम और केंद्र सरकार के बीच एक समझौता हुआ था कि 24 मार्च 1971 के बाद राज्य में आने वाले तमाम घुसपैठियों को विदेशी घोषित कर राज्य से निकाल दिया जाए.
पश्चिम बंगाल पर भाजपा की नज़र
आगामी लोकसभा चुनावों में भाजपा की नज़र न सिर्फ़ हिंदी भाषी क्षेत्रों पर है, बल्कि अन्य भाषाई क्षेत्र में भी पार्टी अपने विस्तार की रणनीति बना रही है.
नागरिकता संशोधन विधेयक इसी रणनीति का हिस्सा है. नवा ठाकुरिया बताते हैं कि असम के पूर्वी और मध्य भाग में ही सिर्फ़ इसका विरोध है, जहां भाजपा को थोड़ा नुक़सान हो सकता है.
भाजपा को इसका मुख्य रूप से फ़ायदा पश्चिम बंगाल में होगा जहां पहले बंगाली होना ही पहचान थी. अब पश्चिम बंगाल में मामला 'बंगाली हिंदू' बनाम 'बंगाली मुस्लिम' का हो चुका है.
वहां के लोग अब धर्म के आधार पर बंट रहे हैं. वहां का मुस्लिम वोट तृणमूल कांग्रेस और अन्य पार्टियों को जा सकता है लेकिन हिंदू वोट पर भाजपा की नज़र है और हो सकता है कि हिंदू अब भाजपा को वोट करें.
असम में भाजपा को दो से तीन सीटों का नुक़सान होगा तो बंगाल में 10 से 12 सीटों का फ़ायदा भी हो सकता है.
यही कारण है कि भाजपा बंगाल और असम जैसे राज्यों की रैलियों में नागरिकता का मुद्दा उठाती रही है.
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