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राष्ट्रीय कार्यकारिणी में दिखी बीजेपी की बेचैनी
- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बीजेपी राष्ट्रीय अधिवेशन का दूसरा दिन नए नारों, क़िस्सों, मोदी की शान में क़सीदे और ख़ुद नरेंद्र मोदी के लंबी स्पीच की नज़र रहा. इसमें तक़रीबन सवा घंटे के आसपास उन्होंने कहा कि "ये मोदी भी संगठन की पैदाइश है."
संगठन वाला ये वाक्य पैतृक संगठन आरएसएस के लिए प्रतिबद्धता जताने को था या पार्टी के दूसरे नेताओं के लिए संदेश (?!) जिनके बारे में कहा जाता है कि वो मोदी-शाह के वर्चस्व को लेकर लंबे समय से नाख़ुश रहे हैं.
मोदी की जगह किसी और चेहरे की आरएसएस की तलाश की कोशिशों की बातें भी हाल के दिनों में रह-रहकर सुनी जाती रही हैं.
पुराने रिश्तों पर नई पॉलिश
दिल्ली के रामलीला मैदान में तैयार हॉल के भीतर और बाहर मोदी-शाह के साथ-साथ दूसरे नेताओं की तस्वीर वाले बैनर-पोस्टर तो कई दिनों से दिख रहे थे, शनिवार को जब लालकृष्ण आडवाणी कार्यक्रम में शामिल होने थोड़ी देर से पहुंचे तो मोदी खड़े होकर उनकी तरफ़ बढ़े, कुछ इतनी गर्मजोशी से कि रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपना भाषण रोककर 'आडवाणी जी को नमस्कार' किया.
मुरली मनोहर जोशी को तो नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण के शुरुआत में ही 'राजनीति और विद्वता का संगम' बुलाकर आदर दिया.
मोदी, नितिन गडकरी के सुबह में पेश किए गए उस राजनीतिक प्रस्ताव के पारित हो जाने के बाद बोल रहे थे जिसमें 2019 का चुनाव नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लड़ने का फ़ैसला किया गया है.
वैसे ये महज़ एक औपचारिक क़दम था क्योंकि हर तरफ़ लगे पोस्टरों और नेताओं के कार्यक्रम के पहले दिन यानी शुक्रवार को दिए गए भाषणों में जो एक नारा बार-बार सामने आ रहा था वह था: अबकी बार फिर मोदी सरकार.
'कहो दिल से मोदी जी एक बार फिर से;' '2019 में जाइए सब कुछ भूल, याद रखिए सिर्फ़ मोदी और कमल का फूल,' जैसे नारे भी कार्यक्रम ख़त्म होते-होते तक सुनने में आ गए.
और 'नमो अगेन' लिखा कैप कार्यक्रम स्थल में हर तरफ़ दिखाई देने लगा था. अमित शाह ने घोषणा भी की कि जो चाहे नमो ऐप पर इसे कोरियर से इसे मंगवा सकता है.
नितिन गडकरी के कुछ पुराने और नए साक्षात्कारों के आधार पर कहा जा रहा था कि वो मोदी के विकल्प हो सकते हैं.
कहा जा रहा था अगर चुनाव बाद कुछ दिक्कत की स्थिति बनती है, यानी अगर पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता है, तो मोदी की जगह गडकरी दूसरे दलों को अधिक स्वीकार्य हो सकते हैं.
'हवाई चप्पल वाले अब हवाई जहाज़ में'
गडकरी ने अपने भाषण में कहा कि मोदी हुकूमत में प्रगति का ये हाल है कि 'जो हवाई चप्पल पहनते थे वो अब हवाई जहाज़ में चल रहे हैं.'
हालांकि, गडकरी के एक बयान को मीडिया में ख़ूब जगह मिली थी कि जब नौकरी नहीं तो आरक्षण की मांग क्यों हो रही है.
अब मोदी सरकार को उम्मीद है कि सामान्य वर्ग में दिए गए 10 प्रतिशत आरक्षण का पार्टी को चुनावी लाभ मिलेगा.
बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने अपने स्वागत भाषण में इसका ज़िक्र ख़ासतौर पर किया था.
मोदी के भाषण में भी इसका ज़िक्र आया लेकिन वो बार-बार ये आश्वासन देते रहे कि इससे एससी-एसटी और ओबीसी को मिलने वाले आरक्षण कोटे पर किसी तरह का असर नहीं होगा.
कई जानकारों का मानना है कि सामान्य वर्ग में दिया गया 10 प्रतिशत का आरक्षण बीजेपी को फ़ायदे की बजाए नुक़सान भी पहुंचा सकता है अगर एससी-एसटी वर्ग में ये संदेश गया कि ये उनका कोटा काटने की शुरुआत है.
दो अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट के अनुसूचित जाति और जनजाति उत्पीड़न क़ानून में बदलाव के खिलाफ़ हुए भारत बंद के दौरान में 12 दलितों की जिस तरह मौतें हुईं उससे एससी वर्ग में बेहद नाराज़गी है.
हालांकि फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट का था और बाद में मोदी सरकार ने संसद से क़ानून बनाकर अदालत के फ़ैसले को निरस्त कर दिया लेकिन दलितों के मन में ये बात घर कर गई है कि सुप्रीम कोर्ट का ऐसा फ़ैसला सरकार की तरफ़ से विरोध न होने के कारण आया.
इस मामले को लेकर वो चंद दिनों में कई कार्यक्रम करने वाले हैं.
साथ में वो मामला भी है जिसमें कुछ लोगों ने दिल्ली के जंतर मंतर के पास संविधान की प्रतियां जलाई. उसका ज़िक्र भी दलितों के कई हाल में हुए कार्यक्रमों में बार-बार हो रहा है.
पार्टी ने शुक्रवार को गरीब कल्याण और कृषि पर अलग-अलग प्रस्ताव पारित किए हैं. लेकिन इसका कृषि संकट पर कितना असर होगा ये देखना होगा.
पिछले साल हुई किसान रैली में दिल्ली में देश भर के किसान आए और उनमें से बहुत सारे साफ कहते सुने गए कि इस सरकार को हम उखाड़ फेकेंगे.
हालांकि, मध्य प्रदेश के चुनाव में पार्टी को मंदसौर में सफलता मिली जहां किसान आंदोलन के दौरान छह लोग मारे गए थे.
गडकरी ने बीएसपी और एसपी के यूपी में हुए गठबंधन को लेकर कहा कि उनमें लाज-शर्म नहीं, हालांकि उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया.
गठबंधन और कांग्रेस रहे छाए
बीजेपी भले ही गठबंधन को लेकर तरह-तरह के नारे गढ़ रही है लेकिन दो दिनों में कम से कम जिन 10 बड़े नेताओं के भाषण हुए हैं उनमें इस गठबंधन का ज़िक्र हुआ है.
'जब भी जी चाहे नई दुनियां बसा लेते हैं लोग, एक चेहरे पर कई चेहरे लगा लेते हैं लोग', गठबंधन की व्याख्या अगर गडकरी ने इस गाने के माध्यम से यूं की तो वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि सभी नरेंद्र मोदी से घबराते हैं इसलिए कांग्रेस का शहज़ादा, उत्तर प्रदेश की बहनजी, आंध्र प्रदेश के बाबू और पश्चिम बंगाल की दीदी सब साथ आने की बात कर रहे हैं.
अमित शाह ने दावा किया कि जहां 2014 में एनडीए के साथ 24 दल थे, अब वो संख्या 35 पर पहुंच गई है.
हालांकि, हाल के दिनों में बिहार से लेकर असम तक एनडीए के कई सहयोगी दल उससे अलग हुए हैं और कई रोज़ दिन नई-नई मांगे उसके सामने रख रहे हैं.
मोदी सरकार में उनके सहयोगी दल लोकजनशक्ति पार्टी के चिराग पासवान ने बीजेपी को अधिक सीटें देने को ही मजबूर नहीं किया बल्कि ये भी कह दिया कि राम मंदिर एनडीए के एजेंडे का हिस्सा नहीं.
जबकि शाह ने अधिवेशन के अपने भाषण में राम मंदिर निर्माण को पार्टी के कमिटमेंट का हिस्सा क़रार दिया है.
शाह ने पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा कि आनेवाले दिनों में उन्हें 'मेरा बूथ सबसे मज़बूत' के सिद्धांत पर काम करना है और इसके तहत 22 करोड़ ग़रीब परिवारों से संपर्क करना है और मोदी की तस्वीर वाली पर्ची उन तक पहुंचानी है.
इसके लिए शाह ने कार्यकर्ताओं को आनेवाले दिनों में मोटरसाइकिल रैली निकालने, मेरा घर भाजपा का घर और कमल दिवाली जैसे कार्यक्रम आयोजित करने को लेकर निर्देश देने की बात कही है.
जेटली ने अपने भाषण में कहा कि कार्यकर्ताओं को चाहिए कि वो मोदी सरकार के कामों का जमकर प्रचार करे और कोशिश करे कि जिन मुद्दों पर बहस हो रही है वो उनके द्वारा तय हो.
रफ़ाल मामले ने अभी बोफोर्स जैसा रुख़ भले ही अख़्तियार नहीं किया हो लेकिन हाल के दिनों में सरकार को बार-बार इस मामले पर संसद में और बाहर सफाई देनी पड़ रही है.
सीबीआई में जिस तरह आधी रात को बदलाव किए गए और अब उसके पूर्व प्रमुख आलोक वर्मा का इस्तीफ़ा भी आनेवाले दिनों में चर्चा में बना रहेगा.
गर्ज़ के हालात ये बने हैं कि पहले जो कांग्रेस और राहुल गांधी बीजेपी के तैयार नरेटिव पर प्रतिक्रिया देते रहते थे, अब मुद्दे कांग्रेस उठा रही है और जवाब देती नज़र आती है बीजेपी.
जेटली के चर्चा को अपने हिसाब से मोड़ने की कार्यकर्ताओं को नसीहत को इससे अलग रखकर नहीं देखा जा सकता है.
साथ ही हर बात के लिए विपक्ष को दोष देने की पुरानी रणनीति पांच राज्यों में हुए चुनावों में पूरी तरह काम नहीं कर पाई ये भी साफ हो गया है.
इसकी कोशिश शनिवार को दिए गए भाषण में मोदी ने फिर से किया.
मोदी ने कहा कि ये जनता को तय करना है कि उसे कैसा प्रधान सेवक चुनना है, वैसा जो थोड़ा काम और महीनों की छुट्टी पर चला जाए या वैसा जो बिना छुट्टी के 14-16 घंटे काम करे.
मोदी ने ढ़ेढ़ घंटे लंबे भाषण में गांधी परिवार पर हमला जारी रखा, हालांकि भारत के पहले प्रधानमंत्री का नाम उन्होंने नहीं लिया लेकिन उनके समापन शब्द ने - मिलकर नया भारत बनाना है, बहुत आगे जाना है, कईयों को नेहरू की याद दिला दी होगी.
नेहरू को अमरीकी कवि रॉबर्ट फ्रास्ट की वो कविता बहुत पसंद थी - द वुड्स आर लवली डार्क एंड डीप, बट आई हैव प्रौमिसेज़ टू कीप एंड माइल्स टू गो बिफोर आई स्लीप.
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