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यूपी में कौन दहशत में है- अपराधी या पुलिस?
- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, लखनऊ से, बीबीसी हिंदी के लिए
उत्तर प्रदेश में एक महीने के भीतर भीड़ के हाथों दो पुलिसकर्मियों की हत्या के बाद ये सवाल फिर उठने लगा है कि ऐसी स्थिति में आम लोगों पर पुलिस का भरोसा कितना क़ायम रह सकेगा?
जानकारों का कहना है कि ये स्थिति न आम जनता के लिए ठीक है और न ही पुलिसकर्मियों के मनोबल के लिहाज़ से, क्योंकि पुलिस पर लगातार हो रहे हमलों से पुलिसवालों और उनके परिवारों में भी कहीं न कहीं दहशत और डर की स्थिति है.
तीन दिन पहले ग़ाज़ीपुर में भीड़ के हाथों मारे गए कांस्टेबल सुरेश वत्स के 24 वर्षीय बेटे विनीत वत्स मीडिया से बातचीत में रो-रोकर सवाल करते रहे हैं कि जब पुलिस वालों पर ही इस तरह हमले होते रहेंगे तो आम लोगों का पुलिस पर भरोसा कैसे क़ायम हो सकेगा?
विनीत का ये भी सवाल है कि आख़िर ऐसा क्या है कि पुलिस वाले बार-बार भीड़ के हमले के शिकार हो रहे हैं.
विनीत जिस समय ये सवाल कर रहे थे, लगभग उसी समय राजधानी लखनऊ में एक लड़की की अपहरण के बाद हुई हत्या से ग़ुस्साए लोग पुलिस पर पथराव कर रहे थे.
जवाब में पुलिस वालों ने भी पत्थर फेंके और बाद में लाठीचार्ज किया लेकिन पुलिस पर पथराव और हमले की घटनाएं आए दिन की हक़ीक़त बन गई हैं.
ऐसे में ये सवाल उठना लाज़िमी है कि आम लोग उस व्यवस्था पर कैसे भरोसा करें, जिसमें उनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी सँभालने वाली पुलिस ही सुरक्षित नहीं है.
वो भी तब, जब ख़ुद मुख्यमंत्री बार-बार अपराधियों को चेतावनी देते हैं और दावा करते हैं कि अपराधी डर के मारे राज्य छोड़कर भाग रहे हैं.
पुलिस पर जनता का विश्वास टूट रहा हैं
उत्तर प्रदेश में कई अहम पदों पर रहे अवकाश प्राप्त आईपीएस अधिकारी डॉक्टर वीएन राय कहते हैं, ''असली दिक़्क़त यही है, क़ानून-व्यवस्था सही करने और सही रखने का दावा हर सरकार करती है लेकिन इस सरकार में सबसे बड़ी दिक़्क़त ये है कि यहां पुलिस को हत्यारों का एक गिरोह बनाने का प्रयास किया जा रहा है."
"ये जो तथाकथित एनकाउंटर हैं, ये ग़ैर-क़ानूनी हत्याएं हैं, इन्हें कभी भी प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए. पुलिस को क़ानून का सम्मान करने वाली और जनता की दोस्त जैसी संस्था के रूप में विकसित करने की ज़रूरत है न कि मार दो-ठोंक दो जैसी कार्रवाई करने वाली संस्था के तौर पर."
"जब आप ऐसा कहते हैं तो इससे यही पता चलता है कि आप ख़ुद ही क़ानून में विश्वास ख़त्म कर रहे हैं, फिर जनता का विश्वास उसमें कैसे बढ़ेगा?"
दहशत में पुलिसकर्मी
जानकारों का कहना है कि बुलंदशहर में इंस्पेक्टर सुबोध कुमार और फिर ग़ाज़ीपुर में कांस्टेबल सुरेश वत्स की भीड़ के हाथों हुई हत्या ने पुलिसकर्मियों के भीतर भी जैसे डर पैदा कर दिया है. पुलिस के मौजूदा अधिकारी और कर्मचारी इस मुद्दे पर खुलकर तो कुछ नहीं कहते लेकिन उनसे बातचीत के बाद ये साफ़ पता चलता है कि वो ख़ौफ़ में हैं.
पुलिस पर हमले की ये घटनाएं सिर्फ़ यही नहीं हैं बल्कि इनकी फेहरिस्त काफी लंबी है.
2017 में सहारनपुर में एसएसपी के घर पर ही सत्ताधारी पार्टी के लोगों ने इस क़दर घेराव कर दिया था कि एसएसपी के पूरे परिवार ने ख़ुद को घर में क़ैद कर लिया था. बाद में ख़ुद एसएसपी ने बताया था कि इस दौरान उनके बच्चे और परिवार के अन्य सदस्य काफ़ी दहशत में थे.
पुलिस वालों के मनोबल पर असर
राजधानी लखनऊ के एक थाने में तैनात एक इंस्पेक्टर कहते हैं, "भीड़ हिंसा का शिकार होना या फिर नेताओं का पुलिस वालों को बेइज़्ज़त करना, थाने पर या चौकी पर हमला बोल देना और फिर ऐसे लोगों पर कोई कार्रवाई भी न होना पुलिस वालों में दहशत ही नहीं पैदा कर रहा है, उनका मनोबल भी तोड़ रहा है."
"घर-परिवार से दूर रहने वाले निचले पदों पर तैनात पुलिसकर्मियों के परिवार वाले तो इस समय बहुत ही डरे हुए हैं."
जानकारों का भी कहना है कि ऐसी स्थितियों की पुनरावृत्ति निश्चित तौर पर पुलिस के मनोबल को नीचा कर देंगी.
लेकिन यूपी के डीजीपी रहे और फ़िलहाल राज्य एससी-एसटी आयोग के अध्यक्ष डॉक्टर ब्रजलाल कहते हैं कि पुलिस का मनोबल इन घटनाओं से नहीं बल्कि पिछली सरकारों में जो कुछ हुआ, उससे प्रभावित होता है.
क्या सरकारें हैं ज़िम्मेदार?
डॉक्टर बृजलाल पिछली सरकारों में हुई कुछ घटनाओं का उदाहरण भी देते हैं. ख़ासकर वो कथित तौर पर अपराधियों के ख़िलाफ़ मुक़दमे वापस लेने की सरकारों की प्रवृत्ति को भी पुलिस के मनोबल को प्रभावित करने के लिए ज़िम्मेदार मानते हैं.
उनके मुताबिक़, "ये दोनों घटनाएं दुर्भाग्यपूर्ण ज़रूर हैं लेकिन इनसे पुलिस का मनोबल गिरेगा या टूटेगा, ऐसा नहीं है. मनोबल तो तब प्रभावित होता है जब आतंकी घटनाओं तक में शामिल लोगों के केस सरकारें वापस लेती हैं. ऐसा पिछली सपा और बसपा की सरकारों में होता आया है."
वहीं वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र कहते हैं कि ये सारी प्रवृत्तियां इस सरकार में भी नहीं बदली हैं, जिनकी वजह से पुलिस वाले और उनके परिजन भी दहशत में हैं.
योगेश मिश्र कहते हैं, "मॉब लिंचिंग जैसी घटनाओं से लोगों का विश्वास सिस्टम से उठता जा रहा है. वो भी तब, जबकि पुलिस वालों की भी लिंचिंग हो रही है तो ये मामला और भी ज़्यादा भयावह हो जाता है."
"पुलिस पर हमले पिछली सरकारों में भी हुए हैं लेकिन इस सरकार में अन्य लोगों की तरह पुलिस वालों को भी कई बदलाव की उम्मीद थी लेकिन उन्हें कोई बदलाव दिख नहीं रहा."
तीन साल पहले, मथुरा के जवाहर बाग़ में भी कुछ इसी तरह की घटना में एक डीएसपी की मौत हो गई थी. योगेश मिश्र कहते हैं कि इन बड़ी घटनाओं के अलावा पुलिस को कई जगह अपमानित करने की घटनाएँ भी पुलिस के मनोबल को तोड़ने में सहायक होती हैं.
वो कहते हैं, "इन दोनों घटनाओं के बाद पुलिस दहशत में है, वो बदलाव चाहती थी लेकिन उसे बदलाव कहीं दिख नहीं रहा."
योगेश मिश्र के मुताबिक़, "लखनऊ में विवेक तिवारी हत्याकांड में पुलिस जिस तरह से बग़ावत पर उतारू हो गई थी, वैसी स्थितियों के पीछे भी यही परिस्थितियां ज़िम्मेदार होती हैं. हाल ही में पुलिस वीक में डिप्टी एसपी स्तर के अधिकारियों के एसोसिएशन ने बहिष्कार करने की बात कह दी."
"ये स्थितियां साफ़ दिखाती हैं कि पुलिस बल के भीतर भी कई स्तरों पर तालमेल नहीं है, गुटबाज़ी है और ये सब व्यवस्था के लिए क़त्तई ठीक नहीं हैं."
जानकारों का कहना है कि दूसरी ओर, अपराधियों पर लगाम लगाने के सरकारी दावों की हवा तब निकल जाती है जब आए दिन तमाम तरह के अपराध होते रहते हैं.
यही नहीं, ग़ाज़ीपुर और लखनऊ में जब पुलिस वालों पर हमले हो रहे थे, उसी समय देवरिया जेल में बंद इलाहाबाद के पूर्व विधायक अतीक़ अहमद के बारे में ये जानकारी भी अख़बारों में छपी कि उनके सहयोगी कुछ लोगों से रंगदारी वसूलने की कोशिश कर रहे थे.
योगेश मिश्र कहते हैं कि ऐसी घटनाओं में सरकार को जितनी कठोरता से कार्रवाई करनी चाहिए, वो नहीं कर रही है.
वहीं कुछ अन्य लोगों का ये भी कहना है कि इन सबके लिए कहीं न कहीं पुलिस का राजनीतिकरण और ख़ुद पुलिसवालों का राजनीतिक ख़ेमेबाज़ी में बँटना भी कम ज़िम्मेदार नहीं है.
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