अंडमान और निकोबारः आख़िर क्यों प्रधानमंत्री मोदी के इस फ़ैसले से नाख़ुश हैं यहां के लोग?

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- Author, कीर्ति दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
मीडिया और ख़बरों से अक्सर दूर रहने वाला अंडमान और निकोबार इन दिनों चर्चा में है और इसकी वजह है यहां के तीन मशहूर टापुओं का नाम बदलना.
रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यहां नेताजी सुभाष चंद्र बोस के तिरंगा फहराने की 75वीं वर्षगांठ के मौक़े पर रॉस आईलैंड का नाम बदल कर नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वीप, नील आईलैंड का नाम बदलकर शहीद द्वीप और हैवलॉक आईलैंड का नाम बदल कर स्वराज द्वीप रखने का ऐलान किया है. प्रधानमंत्री मोदी ने यहां 75 साल के मौक़े पर 75 रूपये का सिक्का और एक डाक टिकट भी जारी किया है.
लेकिन स्थानीय लोग मोदी सरकार की ओर से इन टापुओं को दिए गए नए नाम से ख़ुश नहीं हैं. यहां स्थानीय लोगों का एक समूह ' लोकल बॉर्न एसोसिएशन' ऐसे लोगों का समूह है जिसे आज़ादी के पहले साल 1858 से 1942 के दौरान अंडमान और निकोबार में बसाया गया. इस एसोसिएशन का हिस्सा 50 से 60 हज़ार लोग हैं.

इस एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉक्टर प्रेम किशन ने बीबीसी हिंदी से बात करते हुए कहा, ''रॉस आईलैंड अंग्रेज़ों के वक़्त की राजधानी हुआ करती थी. इन जगहों से हमारी यादें जुड़ी हैं. हमारी राय लिए बिना जगह का नाम बदल देना सही नहीं है. यहां कई बेनाम टापू हैं जिनका नाम रखा जा सकता था. लेकिन जो द्वीप अब ब्रांड बन चुके हैं उनका नाम बदलने का क्या औचित्य है.''
''ख़ासकर रॉस आईलैंड में कई ऐसी जगहें हैं जिसे सरकार को संरक्षित करने की ज़रूरत है. यहां कई ब्रितानी इमारतें हैं जिन्हें बेहतर करके पर्यटन को बढ़ाया जा सकता है. नेताजी इस देश के महान स्वतंत्रता सेनानी हैं लेकिन उनके नाम पर द्वीप का नाम रखना तो सूरज को दीया दिखाने के जैसा है. हमें कोई नोटिफ़िकेशन नहीं दी गई है लेकिन अख़बारों के माध्यम से हमें इस फ़ैसले की जानकारी मिली है.''
''बात अंग्रेजी नाम की नहीं है. नील और हैवलॉक जैसे नाम किसके नाम पर पड़ा ये ज़रूरी नहीं है, ज़रूरी ये है कि लोगों की ज़ुबान पर ये नाम चढ़ चुके हैं लोग इन नामों से जुड़ा हुआ महसूस करते हैं. 1858 में रॉस आइलैंड राजधानी थी. इतिहास को संभाल कर रखना चाहिए, आपको पसंद हो या ना हो आप इतिहास तो नहीं बदलना चाहेंगे ना. यहां रहने वालों को ये फ़ैसला पसंद नहीं आया है.''
होटल व्यापारी भी नाखुश
अंडमान और निकोबार के होटल एसोशिएशन ने भी इस फ़ैसले पर नाराज़गी ज़ाहिर की है. उन्होंने प्रधानमंत्री दफ़्तर को इस बाबत एक चिट्ठी भी लिखी है. जिसमें कहा गया है कि पिछले कई दशकों से रॉस, नील और हैवलॉक आईलैंड अंडमान और निकोबार में सैलानियों के लिए एक ब्रांड हैं. ऐसे में केंद्र सरकार का ये फ़ैसला व्यापार के लिए बड़े नुकसान का कारण बन सकता है. दिगलीपुर समूह में कई ऐसे टापू हैं जिन्हें सरकार नाम दे सकती है. ''

होटल एसोसिएशन ने सरकार से इस फ़ैसले पर दोबारा गौर करने की बात कही है.
रॉस, नील और हैवलॉक आईलैंड की कहानी
दक्षिणी अंडमान में बसा रॉस आईलैंड का नाम कैप्टन डेनियल रॉस के नाम पर रखा गया था. रॉस जल सरंक्षक और कोलकाता में मरीन सर्वेयर जनरल थे. वे जियोग्राफ़िकल सोसायटी ऑफ़ बॉम्बे के अध्यक्ष भी रहे. 29 अक्तूबर 1849 को उनकी मौत हुई.
नील आईलैंड और हैवलॉक आईलैंड का नाम जेम्स नील और हेनरी हैवलॉक के नाम पर रखा गया. ये दोनों ही ब्रितानी सेना के अधिकारी थे. इन दोनों ही अधिकारियों ने 1857 की लड़ाई में ख़ास भूमिका निभाई थी.

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पोर्ट ब्लेयर से 37 किलोमीटर पूर्वोत्तर में बसा दक्षिणी अंडमान का नील आईलैंड. ये बेहद ख़ूबसूरत टापू है और कोरल रीफ़, बीच और बेहतरीन जैव-विविधता के लिए जाना जाता है.
यहां पाई जाने वाली ख़ास वनस्पतियों के कारण नील आईलैंड को अंडमान का 'वेजिटेबल बॉल' भी कहा जाता है. इस टापू के बीचों के नाम रामायण के पात्रों के नाम पर मसलन भरतपुर, लक्ष्मणपुर, सीतापुर है. इस आईलैंड को महज़ दो घंटे में पूरा घूमा जा सकता है.

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सफ़ेद रेत, हर-घने जंगल और कॉरल रीफ़ के लिए मशहूर हैवलॉक आईलैंड का सैलानियों का पसंदीदा आईलैंड है.
टापुओं का ये समूह ये तीनों ही आईलैंड यहां के पर्यटन के लिहाज़ से काफ़ी महत्वपूर्ण हैं.
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