उत्तर प्रदेश : 'उजाड़ प्रयागराज' में कैसे दिखेगी कुंभ की रौनक

- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, प्रयागराज से, बीबीसी हिंदी के लिए
प्रयागराज शहर के भीतर प्रवेश करते ही चाहे जिस दिशा में जाइए, आपका सामना टूटी-फूटी सड़कों, सड़कों के किनारे टूटे-फूटे मकान और दुकान, आस-पास बेतरतीब बिखरे पड़े मलबे और ऊपर उड़ते धूल के ग़ुबार से ही होगा.
तमाम इलाक़ों को देखकर तो ऐसा लगता है जैसे यहां हाल-फ़िलहाल में भूकंप जैसी कोई बड़ी आपदा आई हो.
सड़कों के किनारे 'सब कुछ उजड़ जाने' का ग़म मनाते और उस पर चर्चा करते लोग भी मिलेंगे.

शहर के लोग ये दृश्य पिछले एक साल से देख रहे हैं.
इस दौरान शहर का इतिहास तक बदल गया यानी, इलाहाबाद प्रयागराज हो गया. छह साल के अंतराल पर आने वाला अर्धकुंभ, कुंभ हो गया और बारह साल बाद आने वाला कुंभ बदलकर महाकुंभ हो गया. लेकिन शहर को सुंदर बनाने के लिए तोड़-फोड़ का जो सिलसिला शुरू हुआ, वो तीस नवंबर की डेडलाइन ख़त्म होने के बावजूद अंजाम तक नहीं पहुंच पाया है.
कुंभ मेला शुरू होने में अब महज़ एक महीना बचा है.
गंगा किनारे 'तंबुओं का शहर' बसना शुरू हो गया है लेकिन रेतीली धरती पर बने उस अस्थायी शहर को प्राणवायु देने वाले इस स्थाई शहर की सांस जैसे धूल के ग़ुबार में अटकी हुई है. शहर के लोगों का ही नहीं, अब तो हाईकोर्ट का भी धैर्य जवाब देने लगा है.

धूल के ग़ुबार के ढका हुआ है शहर
एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान चार दिन पहले हाईकोर्ट ने सख़्त टिप्पणी की. कहा, "क्या राज्य सरकार कार्यों की मॉनिटरिंग नहीं कर रही है? जिस तरह से काम हो रहा है, कुंभ मेले तक इसके पूरा होने की उम्मीद नहीं दिखती. पूरा शहर धूल के ग़ुबार से भरा हुआ है."
यही सवाल शहर का हर बाशिंदा पूछ रहा है.
रेलवे स्टेशन से मुख्य शहर को जाने वाली सड़क लीडर रोड पर जॉनसेनगंज चौराहा शहर के सबसे पुराने, व्यस्ततम और प्रमुख चौराहों के रूप में जाना जाता है. सड़क चौड़ी करने के लिए इस चौराहे के चारों कोनों की इमारतें गिरा दी गई हैं और किनारे के मकान और दुकान के जो हिस्से इसमें अवरोध पैदा कर रहे थे, उन्हें भी ढहा दिया गया है.
'सड़क चौड़ी होने से लोगों को आराम मिलेगा, ट्रैफ़िक जाम की समस्या से राहत मिलेगी और शहर सुंदर लगेगा.'
इस बात से कोई इनक़ार नहीं कर रहा है लेकिन तीन महीने पहले ढहाई गई इमारतों का मलबा तक अभी नहीं हटाया गया है, इससे लोग ख़ासे परेशान हैं.

जॉनसेनगंज चौराहे से चौक की ओर जाने वाली सड़क के बाएं कोने पर एक छोटा लेकिन काफी पुराना मंदिर है. मंदिर के ठीक बगल में विद्यानंद दुबे की छोटी सी पान की दुकान है.
वो बताते हैं, "किसी समय में ये इलाहाबाद का सबसे मुख्य चौराहा था लेकिन आज इसकी दुर्गति देख लीजिए. लगभग एक साल से यहां कुछ न कुछ काम चल रहा है जिसकी वजह से नालियां जाम हो गई हैं और मंदिर के चारों ओर नाली का पानी भर गया है. लोगों का दर्शन करना मुश्किल हो रहा है."
बिना योजना के हो रहा है काम
विद्यानंद दुबे के साथ ही दुकान पर खड़े कई लोग एक जैसी बातें करते मिले.
इन लोगों का कहना था कि सब कुछ बिना किसी योजना के हो रहा है. रमेश जायसवाल कहने लगे, "कभी कोई सड़क दो फीट चौड़ी की गई तो कुछ दिन बाद उसे तोड़कर और चौड़ा किया गया. एक ही सड़क को दो-दो तीन-तीन बार तोड़ा जा रहा है और बनाया जा रहा है. इन सबकी वजह से इलाक़े के लोग तो धूल-गर्दा खा ही रहे हैं, घरों में गंदा पानी आ रहा है और ट्रैफ़िक जाम लग रहा है... वो अलग."
लोगों को ये उम्मीद न के बराबर है कि ये सब काम कुंभ तक पूरा हो पाएगा. लेकिन दिनेश अग्रहरि को पूरा विश्वास है कि ये होकर रहेगा. वो कहते हैं "शहर का सुंदरीकरण हो रहा है तो ये सब सहना ही पड़ेगा. सरकार इतना बढ़िया काम कर रही है और पूरी यक़ीन है कि काम भी समय से पूरा होगा."

शहर का कोई इलाक़ा, कोई मोहल्ला, कोई मुख्य सड़क ऐसी नहीं है जहां तोड़-फोड़ न हुई हो. बैरहना, रामबाग, लीडर रोड, हिम्मतगंज, करैली, ख़ुल्दाबाद, तेलियरगंज जैसे कई इलाक़ों में तोड़-फोड़ का आलम ये है कि इसे देखकर ऐसा लगता है जैसे यहां भूकंप आया हो और उसकी वजह से तबाही मची हो.
"जबरन खाली कराए गए और तोड़े गए घर"
सरकार का दावा है कि सड़क के किनारे आने वाले मकानों के उन हिस्सों को तोड़ा गया है जो अवैध थे लेकिन बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी हैं जिनके वैध मकान और मकान के हिस्से भी तोड़े गए हैं.
कुंभ मेला क्षेत्र के बेहद क़रीब दारागंज मोहल्ले के कुछ लोग तो न सिर्फ़ बेघर हो गए हैं बल्कि बेरोज़गार भी हो गए हैं. सड़क किनारे की इनकी दुकानें टूट गई हैं और मजबूरन सड़क पर ये अस्थाई दुकान से जीवन-यापन कर रहे हैं और टूटे घर में ही रह रहे हैं.

लोगों का कहना है कि उनके घर ज़बरन खाली कराए गए और गिराए गए और किसी तरह का कोई मुआवज़ा भी नहीं दिया गया.
लेकिन इलाहाबाद विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष भानुचंद्र गोस्वामी इस बात से इनक़ार करते हैं.
गोस्वामी कहते हैं, "इस काम में पूरी तरह से विधायी प्रक्रिया का पालन किया गया है. ज़्यादातर अवैध निर्माण को ही तोड़ा गया है और जिनके निर्माण वैध थे उन्हें मुआवज़ा दिया जाएगा. जिन लोगों के पास वैध निर्माण के कागज हैं, वो हमारे पास ला सकते हैं. नियम के मुताबिक़ उन्हें उसका मुआवज़ा मिलेगा."
गोस्वामी ये भी दावा करते हैं कि सारा काम लोगों से आपसी सहमति के आधार पर किया गया है और किसी तरह की कोई दिक़्क़त नहीं आई लेकिन जिनके मकान गिरे हैं, वो विरोध का स्वर बुलंद किए हुए हैं और उनका आरोप है कि प्रशासन उन्हें हर स्तर पर डराने और धमकाने का काम कर रहा है.

सुंदरीकरण के इस कार्य में विकास प्राधिकरण, नगर निगम समेत कई विभाग लगे हुए हैं और बताया ये भी जा रहा है कि इनके बीच तालमेल न होने के कारण भी काम में देरी हो रही है. वहीं इलाहाबाद के बीजेपी सांसद श्यामाचरण गुप्त कहते हैं कि इस पूरी प्रक्रिया में जनप्रतिनिधियों की घोर उपेक्षा की गई है..
बीबीसी से बातचीत में श्यामा चरण गुप्त कहते हैं, "शहर के सुंदरीकरण और कुंभ की सारी योजना सिर्फ़ मंत्रियों और अधिकारियों के साथ बनाई गई, जन प्रतिनिधियों से न तो कोई राय ली गई, न ही उन्हें किसी योजना में शामिल किया गया है, और न ही उनके पास कोई अधिकार है. किसी की कोई शिकायत है तो हम उसे सुनकर उसका निवारण तक नहीं करा सकते."
क्या कुंभ तक हो पाएगा सारा काम?
शहर में सड़कों, सीवर, बिजली इत्यादि के अधूरे कार्यों को देखकर ये आशंका बढ़ती जा रही है कि ये सब कुंभ तक हो पाएगा भी या नहीं. आशंका इस बात को लेकर भी है कि जल्दबाज़ी में काम की गुणवत्ता तो प्रभावित नहीं होगी, लेकिन एडीए के उपाध्यक्ष भानुचंद्र गोस्वामी काम को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त हैं.
शहर में कई काम स्मार्ट सिटी योजना के तहत भी हो रहे हैं और इसके तहत 18 प्रमुख चौराहों सहित पांच दर्जन प्रमुख स्थलों पर आधुनिकतम सीसीटीवी कैमरे लगाए जाने हैं. लेकिन अभी आधे से ज़्यादा काम बचा हुआ है. बताया जा रहा है कि ये कैमरे देश के आधुनिकतम कंट्रोल कमांड सेंटर के ज़रिए संचालित होंगे.
स्मार्ट सिटी योजना के तहत एडीए 32 चौराहों का चौड़ीकरण और सुंदरीकरण कर रहा है. यहां न सिर्फ़ सड़कों का काम अभी आधे से कम वाली स्थिति में है बल्कि चौराहों पर लगने वाले सिग्नल का कहीं अता-पता नहीं है. हालांकि कुछेक चौराहों पर सिग्नल की टेस्टिंग की गई है लेकिन जितना भी काम हुआ है, वो बहुत कम है.

शहर में सड़कों के अलावा दस फ़्लाईओवर भी बनाए जा रहे हैं लेकिन हाईकोर्ट के पास बने क़रीब डेढ़ किमी. लंबे फ़्लाईओवर को छोड़कर अभी सबका निर्माण कार्य अधूरा ही है और पूरा होने में समय लगेगा.
सांसद श्यामा चरण गुप्त कहते हैं, "कुंभ तक ये सारे काम पूरे हो जाएं, ये तो असंभव दिख रहा है, हां, प्राथमिकता तय करके कुछ काम पूरे कर लिए जाएं तो बेहतर होगा."
बहरहाल, शहर के लोग इन सारी वजहों से हुई अव्यवस्था से परेशान हैं लेकिन उन्हें उस समय का इंतज़ार है जब ये सारे काम पूरे हो जाएंगे और शहर ख़ूबसूरत बन जाएगा. लेकिन सबके सामने सवाल यही है कि इंतज़ार तो ठीक लेकिन कब तक...?
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