जर्मनी जाने की चाहत में 10 महीने तक यूक्रेन में फंसे तीन दोस्त

    • Author, पॉल सिंह नॉली
    • पदनाम, जालंधर से, बीबीसी पंजाबी सेवा के लिए

जालंधर शहर के नजदीक गांव बाजड़ा के रहने वाले हरदीप अपने परिवार और बच्चों के सुनहरे भविष्य का सपना लिए अपने घर से जर्मनी के लिए निकले थे.

उनके साथ दो और साथी, रवि कुमार और गुरप्रीत राम 19 फरवरी, 2018 को दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचे.

हरदीप और उनके दोस्त इस बात से ख़ुश थे कि शायद अब उनके दिन बदल जाएंगे. हालांकि उन्हें पहला झटका तब लगा जब उन्हें उनके ट्रैवल एजेंट ने यूक्रेन का वीसा लगा हुआ पासपोर्ट थमाया.

जब हरदीप ने ट्रैवल एजेंट से इस बारे में पूछा तो उस ट्रैवल एजेंट ने उन्हें भरोसा दिलाते हुए कहा था, ''आपको यूक्रेन में सिर्फ़ 15 दिन रहना होगा, जहां जर्मनी के लिए कागज़ तैयार किए जाएंगे और उसके बाद गाड़ी से जर्मनी के लिए रवाना हो जाएंगे.''

हरदीप ने बताया कि उन्होंने एजेंट पर भरोसा कर लिया और वे इस बात को लेकर भी ख़ुश थे कि एजेंट ने हवाई जहाज़ में चढ़ने से पहले उन लोगों से पैसे की फ़रमाइश तक नहीं की.

वो बताते हैं कि उन तीनों के पास 1500 यूरो थे और एक पैसा न ख़र्च होने की उन्हें खुशी थी. लेकिन वो नहीं जानते थे कि यूक्रेन पहुंचने के बाद उनकी खुशी कैसे ग़म में बदल जाएगी.

खाना पीना बंद कर कमरे में क़ैद कर दिया

हरदीप बताते हैं कि यूक्रेन के एयरपोर्ट पर उतरे तो उन्हें एजेंट के दो लोग लेने आए. उन्होंने उनके पास से पहले पासपोर्ट लिया और फिर सारे यूरो अपने पास रख लिए.

हरदीप बताते हैं, "हमें एक कमरे में ठहराया गया. पहले तीन दिन तो हमें अच्छा खाना दिया गया. थाली दी जाती थी, उसमें चिकन, गोभी की सब्ज़ी और मैदे वाली रोटी होती थी. हमें ये भी कहा गया कि आप 15 दिन तक यहां है, तो आप लोग फ़िलहाल यूक्रेन में घूम सकते हैं."

वो बताते हैं , "शुरुआती दिनों में हम अपने परिवार के साथ व्हाट्सएप के ज़रिए संपर्क में थे. तीन दिन बाद उन्होंने हमें पका खाना देना बंद कर दिया. वो हमें कच्चा चिकन, गोभी, चने की दाल और मैदे का आटा देने लगे."

"और जैसे ही 15 दिन ख़त्म हुए उन्होंने हमें कमरे में बंद कर दिया. हमारे आने-जाने पर रोक लगा दी गई और हमारे खाने का सामान भी बंद कर दिया. इसके बाद हम पर रुपए देने का दबाव डाला जाने लगा."

16 लाख रुपए दिए फिर...

हरदीप ने कहा, "अब हमें ये समझ में आने लगा था कि हम फंस गए चुके हैं. पहले मैंने अपने परिवार से रुपए मंगवाए. मेरे परिवार ने साढ़े पांच लाख रुपए दिल्ली में एजेंट संदीप को दिए. इसके बाद मेरे दो साथियों ने भी अपने-अपने परिवारों से रुपए मंगवाए.

उन्होंने बताया कि दो महीने बाद हमें दूसरे कमरे में शिफ्ट किया गया. वो कमरा बहुत ही गंदा था, वहां गंदे बर्तन रखे हुए थे साथ ही वहां के बाथरुम की हालत भी बहुत ज़्यादा गंदी थी. हमें पकाने के लिए केवल चने की दाल दी गई.

"हम तीनों ने एजेंट को करीब 16 लाख पचास हज़ार रुपए की रकम दी. ये रकम देने के बावजूद वे हमें ये आश्वासन देते रहे कि तुम्हें जर्मनी ले जाया जाएगा. लेकिन इस बीच हमसे दोबारा दस लाख रुपयों की मांग की गई और कहा गया कि हमें जर्मनी, सर्बिया के ज़रिए भेजा जाएगा."

''साथ ही एजेंट ने बताया कि हमें सर्बिया तेल टैंकर के जहाज़ में भेजा जाएगा. अब हमें ये समझ में आ चुका था कि हम बुरी तरह से फंस चुके हैं. घरवालों से मदद मांगना बेकार था क्योंकि वो वैसे ही कर्ज़ पर रुपया लेकर एजेंट को दे चुके थे. हमारे परिवार में कोई इतना पढ़ा लिखा नहीं था कि हमारी सहायता कर सके.''

वापसी का रास्ता तलाशने लगे

हरदीप बताते हैं, "हमने उन्हें और रुपए देने से इंकार कर दिया, जिसके बाद 25 नवंबर को उन्होंने हमें कमरे से बाहर निकाल दिया. हम तीनों हैरान-परेशान थे. वहां कड़कड़ाती ठंड में घंटों तक रहने का ठिकाना ढूंढ़ते रहे और वापसी का रास्ता तलाशने लगे."

वो बताते हैं कि उनके साथी गुरप्रीत राम इटली में रह रहे भाई को फोन कर रुपए की मदद मांगी. गुरप्रीत के भाई ने 300 यूरो भिजवाए, जिसमें से 20 यूरो उसने रख लिए जो पैसे लेकर आया थे.

हरदीप बताते हैं कि वापसी तक उन्हें 280 यूरो में ही काम चलाना था, इसलिए उन्होंने खाना भी कम कर दिया.

हरदीप कहते हैं, ''हमारा जर्मनी जाने का सपना तो चकनाचूर हो चुका था लेकिन घर वापस जा पाएंगे या नहीं, यही डर सता रहा था, लेकिन हमने हिम्मत नहीं हारी और हमने फ़ेसबुक के ज़रिए पंजाब पुलिस से संपर्क किया. हमने उन्हें अपने हालात के बारे में बताया और कहा हम यूक्रेन में फंसे हुए है.

"मैंने जालंधर के एसएसपी नवजोत सिंह माहल का नंबर लिया और उन्हें सारी जानकारी दी और बताया कि एजेंट तरनतारन से है."

हरदीप बताते हैं कि एसएसपी नवजोत ने उन्हें तरनतारन के एसएसपी दर्शन सिंह मान का नंबर दिया.

इसके बाद 8 दिसंबर को हरदीप ने दर्शन सिंह मान को फ़ोन किया और बताया कि उनकी पासपोर्ट की मियाद ख़त्म हो चुकी है और वे यूक्रेन में फंसे हुए है.

एसएसपी दर्शन सिंह ने तरनतारन के एसएचओ से संपर्क कर हरदीप के घर जाकर मामले की छानबीन की. इसके बाद एजेंट संदीप को पूछताछ के लिए थाने बुलाया गया, जिसमें उन्होंने क़बूल किया कि उसने धोखे से लोगों को भेजा था.

दर्शन सिंह ने हरदीप को भारतीय दूतावास से संपर्क करने को कहा जिसके बाद सिंगल पासपोर्ट के ज़रिए उनकी वापसी हो पाई.

हरदीप के बाकी दोनों साथियों का पासपोर्ट था इसलिए वे दो दिन पहले यानि 13 दिसंबर को ही भारत वापस लौट आए.

हरदीप के परिवार में उनकी मां, पत्नी और दो बेटियां हैं. इससे पहले वो दुबई भी जा चुके हैं. लेकिन तब सेहत ख़राब होने की वजह से उन्हें तीन महीने में ही वापस लौटना पड़ा था.

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