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सिद्धू को 'गद्दार' कहे जाने के बावजूद वो पंजाब के हीरो क्यों हैं?: नज़रिया
- Author, अतुल संगर
- पदनाम, संपादक, बीबीसी पंजाबी
क्रिकेटर से राजनेता बने नवजोत सिंह सिद्धू इन दिनों चर्चा के केंद्र में हैं. सिद्धू पंजाब के लिए, ख़ासकर सिखों के लिए तब हीरो बन गए जब वो 'पाकिस्तानी जनरल के दूत' बन कर लौटे और दोनों देशों की अंतरराष्ट्रीय सीमा पर करतारपुर कॉरिडोर बनाने की बात कही.
सोशल मीडिया पर उन्हें कई पंजाबी 'शांति पसंद व्यक्ति और पवित्र सिख' बता रहे हैं.
पाकिस्तानी जनरल को गले लगाने और प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की तारीफ के बाद सिद्धू के लिए पंजाब के बाहर, ख़ासकर हिंदीभाषी क्षेत्र में 'गद्दार' शब्द का इस्तेमाल किया गया था.
उनकी खूब आलोचना भी हुई थी लेकिन आम सिख इस आलोचना से सहमत नहीं नज़र आए.
टीवी और क्रिकेट की दुनिया के स्टार रहे सिद्धू जब भी 22 गज की पिच पर खेलने उतरते थे, उन्हें राष्ट्रीय गौरव से जोड़कर देखा जाता था.
लेकिन रातोंरात वो कइयों के लिए खलनायक कैसे बन गए? जब उन्होंने कैप्टन अमरिंदर सिंह को केवल सेना का एक कैप्टन बताया था, पंजाब के कई मंत्रियों ने उनके इस्तीफे की मांग की थी. बावजूद इसके वो पंजाबियों के दिलों में बने रहे. ऐसा क्यों हुआ?
हिंदीभाषी और पंजाबियों की राय के बीच में इतना बड़ा अंतर क्यों है?
कई दशकों से हो रही मांग
करतारपुर भारतीय सीमा से करीब पांच किलोमीटर दूर पाकिस्तान की तरफ है. यहां सिखों के पहले गुरु गुरु नानक देव ने अपने जीवन के अंतिम 18 साल बिताए थे.
करतारपुर सिखों के पवित्र स्थलों में से एक है, जहां केवल सिख ही नहीं, बल्कि ग़ैर-सिख श्रद्धालु भी प्रार्थना करने पहुंचते हैं.
पहले श्रद्धालुओं को करतारपुर जाने के लिए भारत सरकार से विशेष इजाज़त लेनी होती थी. वो यहां लाहौर होते हुए करीब 100 किलोमीटर की यात्रा कर पहुंचते थे.
करतारपुर कॉरिडोर की मांग सिख कई दशकों से कर रहे थे.
गुरु नानक देव की 550वीं जयंती दोनों तरफ के सिख श्रद्धालु धूमधाम से मनाएंगे. इसका आयोजन दोनों देशों की सरकारें अपने-अपने क्षेत्र में करेंगी.
सीमा खोलने की मांग कई दशकों से हो रही थी लेकिन जब पाकिस्तान के सेना प्रमुख क़मर बाजवा ने पाकिस्तान सरकार की इस चाहत को ज़ाहिर करन के लिए सिद्धू को चुना तो यह तय था कि वो सिखों के हीरो बन जाएंगे.
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नकारात्मक बहस के बीच पंजाबियों की सकारात्मक चाहत
सिद्धू के पाकिस्तानी सेना प्रमुख क़मर बाजवा को गले लगाने की आलोचना मीडिया और पंजाब के बाहर खूब हुई. सोशल मीडिया पर इस पर खूब बहस भी हुई.
सिखों की पारंपरिक पार्टी कहे जाने वाले अकाली दल ने घटना की निंदा की. वहीं मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भी कहा था कि यह नहीं होता तो बेहतर होता.
हालांकि इस दौरान आम सिखों ने गुरुदासपुर सीमा से करतारपुर जाने की संभावना और उम्मीदों पर अपना ध्यान केंद्रित रखा.
राजनीति के जानकार प्रो. हरीश पुरी कहते हैं, "अकालियों की निंदा ने असल में सिद्धू की मदद की. उनके लिए केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल और उनके पति और पूर्व उप मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल ने 'गद्दार' जैसे शब्दों का प्रयोग किया."
"बाद में सिद्धू का उपहास उड़ाने वाली हरसिमरत कौर बादल खुद करतारपुर कॉरिडोर के शिलान्यास कार्यक्रम में पाकिस्तान पहुंचीं. उस कार्यक्रम में सिद्धू और पाकिस्तान सेना के प्रमुख क़मर बाजवा भी थे."
वरिष्ठ समीक्षक और लेखक जगतार सिंह कहते हैं, "राष्ट्रीय ज़रूरतों और देशभक्ति को हर कोई समझता है पर पंजाब के बाहर करतारपुर पर जिस स्तर की नकारात्मक बहस हुई थी, वो चकित करने वाली थी."
"इतिहास में पंजाब और कश्मीर प्रॉक्सी वॉर और युद्ध की पहली चोट खाने वाले राज्य रहे हैं. अगर पंजाबी शांति की कामना कर रहे हैं तो इसमें बुरा क्या है. सिख धर्म के कई महत्वपूर्ण स्थल पाकिस्तान में हैं और वो इस बात से आहत हैं कि करतारपुर कॉरिडोर की उनकी चाहत कई देशवासियों की नज़र में उन्हें संदिग्ध बना रही है."
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पाकिस्तान की सफलता और भारत की चूक
यह साफ़ है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने संदेशवाहक के रूप में सिद्धू को चुनकर रणनीति चली है.
पहले यह सूचना आई कि भारत के राष्ट्रपति शिलान्यास करेंगे लेकिन बाद में उपराष्ट्रपति के नाम की घोषणा की गई.
पाकिस्तान के आमंत्रण को भारतीय विदेश मंत्री सुषम स्वराज ने यह कह कर ठुकरा दिया कि वो पहले के तय कार्यक्रमों में व्यस्त रहेंगी.
उन्होंने दो सिख मंत्रियों के भेजने की बात कही, उनमें से एक हरसिमरत कौर थीं, जिन्होंने इस मामले में सिद्धू की आलोचना की थी.
इस पूरे क्रम में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान सिखों के दिलों में जगह बनाते हुए देखे गए. वहीं भारत सरकार पूरे घटनाक्रम का इस्तेमाल रिश्तों को बेहतर करने की पहल के तौर पर नहीं कर सकी.
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भारत-पाक तनाव के बीच पंजाब का दर्द
करतारपुर के शिलान्यास कार्यक्रम दोनों देशों के बीच एक नए रिश्ते की शुरुआत करने का एक मौका था. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने मीडिया से कहा था, "पिछले 20 सालों से भारत करतारपुर कॉरिडोर के खोले जाने की मांग कर रहा था लेकिन यह पहली दफ़ा है जब पाकिस्तान ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है. लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय वार्ता शुरू होगी. संवाद और आतंकवाद एक साथ नहीं हो सकते हैं."
उनका यह बयान उस वक़्त आया था जब करतारपुर कॉरिडोर का शिलान्यास कार्यक्रम चल रहे थे. पंजाब के सोशल मीडिया यूज़र इस बात पर आपत्ति जता रहे थे कि जिस पल का इंतज़ार पंजाबी कई दशकों से कर रहे थे, उस पर कूटनीतिक फुटबॉल क्यों खेला जा रहा है.
संवाद और आतंकवाद एक साथ नहीं हो सकते हैं, भारत का यह स्टैंड कई वर्षों पुराना है. हालिया बयान निरंकारी भवन पर ग्रेनेड हमले और भारत-पाकिस्तान सीमा पर हो रही हिंसा के बीच आया था.
निरंकारी भवन के मामले में सुरक्षा बलों ने दो सिख युवकों को गिरफ्तार किया है. यह आरोप है कि इनके तार तथाकथित ख़ालिस्तान लिबरेशन फोर्स से जुड़े हैं, जिसका संचालन कथित रूप से पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई की शह पर हो रहा है.
सिख भावनाओं के विरुद्ध पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने भारत-पाक सीमा पर भारतीय सैनिकों पर हो रहे हमले और पंजाब में आईएसआई की कथित गतिविधियों के ख़िलाफ़ पाकिस्तानी सेना प्रमुख क़मर बाजवा को कड़ी चेतावनी दी थी. हालांकि उन्होंने करतारपुर कॉरिडोर के पाकिस्तान की पहल का स्वागत किया था.
1984 में सिख विरोधी दंगों के बाद अमरिंदर सिंह ने कांग्रेस पार्टी और संसद की सदस्यता त्याग दी थी. सिखों का उन पर विश्वास है और वो इस विश्वास के चलते ही उनकी भावनओं के ख़िलाफ़ जाने का जोखिम उठाते हैं.
प्रोफेसर हरीश पुरी कहते हैं, "ग़ैर पंजाबियों के लिए यह समझना बहुत मुश्किल है कि भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव पंजाब को किस तरह प्रभावित करता है. वो दोनों देशों के बीच सामान्य स्थिति चाहते हैं. इसलिए दूसरे राज्यों के लिए पंजाब की नब्ज़ समझना मुश्किल होता है."
भारत की तरफ़ करतारपुर कॉरिडोर के शिलान्यास के दौरान पंजाब में खूब सियासी ड्रामा हुआ. पंजाब सरकार में मंत्री एसएस रंधावा ने शिलान्यास के पत्थर पर पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और उनके पुत्र सुखबीर सिंह बादल के नाम पर काला टेप लगा दिया.
उनकी आपत्ति थी कि शिलान्यास के पत्थर पर प्रकाश सिंह बादल और सुखबीर सिंह बादल के नाम थे. उनका कहना था कि ये अकाली और भाजपा का कार्यक्रम नहीं था.
साल 2015 में पंजाब में ईशनिंदा की जो घटनाएं हुई थी, उसमें प्रकाश सिंह बादल और सुखबीर सिंह बादल के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग हो रही है.
मामले की जांच के लिए बनाई गई एसआईटी ने भी उनसे इस पर पूछताछ की थी.
धर्म से प्रेरित उत्तेजना पूर्ण माहौल साल 2015 से कायम है. ऐसे में जो भी धर्म के पक्ष में खड़ा नजर आया है, उसे लोगों का समर्थन प्राप्त हुआ है.
सिद्धू अकालियों के विरोधी रहे हैं. करतारपुर मामले में अकालियों ने जितना सिद्धू का विरोध किया, उन्हें लोगों का समर्थन उतना ज़्यादा मिला.
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