You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
11 दिसंबर के बाद सिद्धू को मिल सकती है बड़ी भूमिका: नज़रिया
- Author, रशीद क़िदवई
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
कैप्टन अमरिंदर सिंह और उनके वफ़ादारों को नवजोत सिंह सिद्धू के उभार को भविष्य में होने वाले बदलाव के स्पष्ट संकेत के रूप में लेना चाहिए.
सिद्धू को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का विश्वास हासिल है और चुनावों के दौरान कांग्रेस के स्टार प्रचारक के रूप में राहुल और सोनिया गांधी के बाद सबसे ज़्यादा उन्हीं की मांग रहती है.
प्रचार के लिए सिद्धू की डिमांड कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सदस्यों, ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के महासचिवों और कांग्रेस के शासन वाले राज्यों के मुख्यमंत्रियों से भी ज़्यादा है. इनमें अमरिंदर भी शामिल हैं, जिनका पंजाब से बाहर बहुत कम प्रभाव है.
दूसरे शब्दों में कहें तो पटियाला के इस दिलकश बल्लेबाज़ का समय अच्छा चल रहा है और उम्मीद है कि 2022 के आसपास या उससे पहले ही उन्हें पंजाब में बड़ी भूमिका मिल सकती है. पंजाब में 2022 में विधानसभा चुनाव होंगे.
भले ही कभी पार्टी अनुशासन, शालीनता और राजनीतिक मर्यादाओं की महीन लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन हो जाए लेकिन सिद्धू शब्दों से खेलना बख़ूबी जानते हैं.
इसलिए उनका अमरिंदर सिंह को अभिभावक, मार्गदर्शक और नेता बताना अपने शब्द वापस लेने या माफ़ी मांगने के बजाय आत्मीय संबंध जोड़ने वाला नज़र आया.
करतारपुर के हीरो साबित हुए सिद्धू
करतारपुर साहिब कॉरिडोर खुलने के घटनाक्रम से पहले अमरिंदर जहां उदासीन से नज़र आए वहीं सिद्धू काफ़ी सक्रिय रहे.
सिद्धू में राहुल और कांग्रेस को ऐसा नेता मिला है जो अकालियों और अमरिंदर दोनों से बढ़कर साबित हुआ है.
सिखों के बीच सिद्धू करतारपुर के असली हीरो हैं. हाल ही में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान सिद्धू ने जोशीला अभियान चलाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य विरोधियों पर निशाना साधा.
11 दिसंबर तय करेगा सिद्धू का भविष्य
सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने सिद्धू को कैप्टन अमरिंदर सिंह की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ उस समय पार्टी में जगह दी थी, जब उनका बीजेपी और आम आदमी पार्टी के साथ मोलभाव सिरे नहीं चढ़ पाया था.
अगर आगामी 11 दिसंबर को पार्टी राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, मिज़ोरम और तेलंगाना में बेहतर प्रदर्शन करती है तो पंजाब की राजनीति में थोड़ी हलचल हो सकती है.
कांग्रेस में जब भी किसी क्षेत्रीय नेता की छवि बड़ी होने लगती है और वह स्वतंत्र रूप से काम करना शुरू करता है, पार्टी हाईकमान दूसरी पंक्ति के नेतृत्व को उभारना शुरू कर देता है.
सोनिया और राहुल भले ही इंदिरा और राजीव की तरह मनमर्ज़ी से कम ही काम करते हैं लेकिन 11 दिसंबर के बाद अगर कांग्रेस दो-तीन राज्यों में जीत जाती है तो इससे राहुल गांधी का क़द और प्रभाव बढ़ेगा.
राहुल के उदय से चंडीगढ़ में भी उनके विश्वस्त लोग उभरेंगे, जहां पार्टी और सरकार 76 साल के ऐसे कैप्टन के नेतृत्व में काम कर रही है जिसकी छवि 'जी हुज़ूरी' न करने वाले मुख्यमंत्रियों की है.
साल 2014 में हुए लोकसभा चुनावों के बाद कांग्रेस में राहुल के नेतृत्व में बदलाव का दौर चल रहा है. राहुल राज्यों में युवा और अपनी पसंद का नेतृत्व देखना चाहते हैं. राजस्थान में सचिन पायलट, मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया और तेलंगाना में मोहम्मद अज़हरुद्दीन इसके उदाहरण हैं.
कमलनाथ, अशोक गहलोत, अहमद पटेल और अमरिंदर सिंह जैसे पार्टी के दिग्गज अब पार्टी के लिए ताक़त के बजाय ज़रूरत ज़्यादा बन गए हैं.
अगर प्रदर्शन ठीक नहीं रहा तो...
लेकिन अगर 11 तारीख़ को प्रदर्शन ठीक नहीं रहा (अगर मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में कांग्रेस सरकार नहीं बना पाई या केवल राजस्थान ही जीत पाई) तो अमरिंदर सिंह को सिद्धू की रफ़्तार रोकने का मौक़ा मिल जाएगा.
राहुल को भी मजबूरी में मदद और सलाह वग़ैरह के लिए 2019 तक या इसके बाद भी अमरिंदर सिंह या उनके जैसे दिग्गजों पर आश्रित रहना पड़ेगा.
अमरिंदर सिंह के समर्थक अगर गांधियों की नेतृत्व शैली पर नज़र डालेंगे तो समझ जाएंगे कि जब-जब नेतृत्व परिवर्तन हुआ है, कई मुख्य किरदारों ने ख़ुद को हाशिए पर पाया है.
इंदिरा गांधी ने उन सभी को किनारे कर दिया था जिन्हें जवाहरलाल नेहरू के आंख-कान कहा जाता था. इंदिरा को यह पसंद नहीं था कि कोई उन्हें यह कहता रहे कि ऐसा करो, वैसा करो.
ऐसे ही जब राजीव गांधी ने 1981-82 में संजय गांधी की जगह ली, उन्होंने अपने बड़े भाई की टीम के कई लोगों को अपने लिए 'बेमेल' पाकर किनारे कर दिया.
जैसे ही राजीव महासचिव नियुक्त हुए थे, युवा कांग्रेस के शक्तिशाली प्रमुख राम चंद्र रथ का प्रभाव तेज़ी से कम हो गया था.
राजीव गांधी की हत्या के बाद उनके उत्तराधिकारी पी.वी. नरसिम्हा ने एम.एल. फ़ोतेदार जैसे राजीव के कई सहयोगियों को हटा दिया था.
उसी तरह जब सीताराम केसरी कांग्रेस के अध्यक्ष बने तो तुरंत ही जनार्दन पुजारी, भुवनेश चतुर्वेदी और राव के अन्य क़रीबियों को जाना पड़ा.
जब सोनिया ने अध्यक्ष पद संभाला तो राजीव, नरसिम्हा या केसरी के क़रीबी समझे जाने वाले कई नेता बाहर हो गए.
कांग्रेस प्रमुख के तौर पर सोनिया को अनुशासन लागू करने के मामले में थोड़ा नरम माना जाता है मगर उनके अंदर मुश्किल हालात को पार पाने और गठबंधन के नेताओं को जोड़ने की अच्छी क्षमता थी.
नीतियों के मामले में उनका झुकाव सेंटर से थोड़ा लेफ़्ट की ओर रहा है. वहीं राहुल को राजीव और संजय की शैली वाले नेता के रूप में देखा जाता है जो स्पष्टवादी हैं और फ़ैसले लेने से भी नहीं हिचकते.
राहुल के सुधारों, शहरी मतदाताओं, तकनीक और युवाओं को ज़्यादा प्राथमिकता देने से पार्टी के कई नेता और क्षत्रप या तो ख़ुद को बदलने के लिए मजबूर हों जाएंगे या फिर उन्हें पार्टी छोड़कर जाना होगा. इसमें 11 दिसंबर को आने वाले चुनावों के नतीजों की अहम भूमिका रहेगी.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)