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ऑनलाइन शॉपिंग करने वालों के 'अच्छे दिन' ख़त्म?
- Author, टीम बीबीसी हिन्दी
- पदनाम, नई दिल्ली
- अमेज़ॉन और फ़्लिपकार्ट पर उन कंपनियों के उत्पाद बेचने पर पाबंदी लगेगी, जिनमें उनकी हिस्सेदारी है.
- भारतीय रिटेलरों और कारोबारियों की शिकायत है कि ई-कॉमर्स कंपनियां उनका धंधा ख़त्म कर रही हैं.
- भारतीय रिटेल बाज़ार में छोटी दुकानों का वर्चस्व हुआ करता था, लेकिन ऑनलाइन शॉपिंग ने खेल बदल दिया है.
- नए नियमों से कंपनियों के अलावा ख़रीदारों पर भी असर होगा.
भारत सरकार ने अमेज़ॉन डॉट कॉम और वॉलमार्ट के फ़्लिपकार्ट समूह जैसी ई-कॉमर्स कंपनियों पर कड़े नियम लगाते हुए फ़ैसला सुनाया है कि अब वो उन कंपनियों के उत्पाद नहीं बेच सकतीं, जिनमें उनकी अपनी हिस्सेदारी हैं.
एक बयान में सरकार ने कहा है कि ये कंपनियां अब सामान बेचने वाली कंपनियों के साथ 'विशेष समझौते' नहीं कर सकतीं और नए नियम एक फ़रवरी से लागू होंगे.
वाणिज्य मंत्रालय ने एक बयान में कहा है, ''कोई भी ऐसी इकाई (या कंपनी) जिसमें ई-कॉमर्स कंपनी या उस समूह की दूसरी कंपनी की इक्विटी (हिस्सेदारी) है या फिर इनवेंटरी (सामान) पर नियंत्रण है, उसे ई-कॉमर्स कंपनी के प्लेटफ़ॉर्म (.com) पर सामान बेचने की इजाज़त नहीं होगी.''
लेकिन ये खेल है क्या? दरअसल, ई-कॉमर्स कंपनियां अपनी होलसेल इकाइयों या समूह की दूसरी कंपनियों के ज़रिए बड़े पैमाने पर ख़रीदारी करती हैं, जो चुनिंदा कंपनियों को अपना माल बेचते हैं. ये वो कंपनियां होती हैं, जिनके साथ उनकी साझेदारी है या फिर समझौते हैं.
ये कंपनियां आगे चलकर दूसरी कंपनियों या फिर ग्राहकों को सीधे ये उत्पाद बेच सकती हैं और क्योंकि उत्पादों के दाम बाज़ार रेट से कम पर होते हैं, इसलिए वो डिस्काउंट काफ़ी दे पाते हैं. मसलन, किसी ख़ास वेबसाइट पर कोई ख़ास मोबाइल फ़ोन मॉडल पर लगने वाली सेल.
नए नियमों के पीछे भारतीय रिटेलरों और कारोबारियों की वो शिकायतें हैं जिनमें कहा गया था कि दिग्गज ई-कॉमर्स कंपनियां अपनी सहयोगी कंपनियों की इनवेंटरी पर कंट्रोल रखती हैं या फिर सेल्स को लेकर ख़ास एग्रीमेंट कर लेती हैं.
ऐसे में बाज़ार में उन्हें नाजायज़ फ़ायदा मिलता है और वो ग्राहकों को काफ़ी कम दामों पर उत्पाद बेच सकती हैं.
बुधवार को जारी अधिसूचना में ये भी कहा गया है कि ग्राहकों को ऑनलाइन शॉपिंग करते वक़्त कैशबैक का जो अतिरिक्त फ़ायदा मिलता है, वो इस बात पर निर्भर नहीं होना चाहिए कि उत्पाद ऑनलाइन साइट की सहयोगी कंपनी का है या नहीं.
नए नियम देश के छोटे कारोबारियों के लिए राहत की ख़बर है, जिन्हें डर सता रहा था कि अमरीका की दिग्गज कंपनियां ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिए भारत के रिटेल बाज़ार में पीछे के दरवाज़े से दाख़िल हो रही हैं.
कंफ़ेडरेशन ऑफ़ ऑल इंडिया ट्रेडर्स का कहना है कि अगर ये आदेश जस का तस लागू होता है तो ई-कॉमर्स कंपनियों की कम प्राइसिंग वाली नीति और भारी डिस्काउंट के दिन हवा हो सकते हैं.
इस साल मई में वॉलमार्ट ने 16 अरब डॉलर में फ़्लिपकार्ट ख़रीदी थी, तब कंफ़ेडरेशन ने इस सौदे का विरोध करते हुए कहा था कि इससे एकतरफ़ा माहौल बनेगा और प्राइसिंग के मोर्चे पर ई-कॉमर्स कंपनियों को छोटे कारोबारियों की तुलना में गलत फ़ायदा होगा.
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