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कंप्यूटर निगरानी: मोदी सरकार जांच एजेंसियों से कराएगी जासूसी, क्या है सच?
- Author, टीम बीबीसी हिंदी
- पदनाम, नई दिल्ली
आपके और हमारे कंप्यूटर पर अब क्या वाकई सरकार की नज़र होगी? हम उसमें क्या डेटा रखते हैं, हमारी ऑनलाइन गतिविधियां क्या हैं, हमारे संपर्क किनसे हैं, इन सब पर निगरानी रहेगी?
ये सवाल आम लोगों के मन में सरकार के उस आदेश के बाद उठ रहे हैं, जिसमें उसने देश की सुरक्षा और ख़ुफिया एजेंसियों को सभी के कंप्यूटर में मौजूद डेटा पर नज़र रखने, उसे सिंक्रोनाइज (प्राप्त) और उसकी जांच करने के अधिकार दिए हैं.
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने शुक्रवार को एक अधिसूचना जारी कर दस एजेंसियों को ये अधिकार दिए हैं. पहले बड़े आपराधिक मामलों में ही कंप्यूटर या ऑनलाइन गतिविधियों पर नज़र रखी जाती थी, जांच की जाती थी और इन्हें जब्त किया जाता था.
लेकिन क्या नए आदेश के बाद आम लोग भी इसकी जद में होंगे?
सोशल मीडिया पर सरकार के इस फ़ैसले का विरोध हो रहा है. लोगों का कहना है यह उनकी निजता के अधिकार में हस्तक्षेप है.
अघोषित आपातकाल लागू हो गया?
विपक्षी दल भी इस पर सवाल उठा रहे हैं. राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष गुलाम नबी आज़ाद ने कहा कि सरकार के इस फ़ैसले के साथ देश में अघोषित आपातकाल लागू हो गया है.
वहीं सरकार का कहना है कि ये अधिकार एजेंसियों को पहले से प्राप्त थे. उसने सिर्फ़ इसे दोबारा जारी किया है.
राज्यसभा में इन आरोपों पर वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सरकार की तरफ से पक्ष रखा. उन्होंने कहा कि विपक्ष आम लोगों को भ्रम में डाल रहा है.
उन्होंने कहा कि आईटी एक्ट के सेक्शन 69 के तहत अगर कोई भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ग़लत इस्तेमाल करता है और वो राष्ट्र की सुरक्षा के लिए चुनौती है तो अधिकार प्राप्त एजेंसियां कार्रवाई कर सकती है.
जेटली ने अपने जवाब में कहा, "साल 2009 में यूपीए की सरकार ने यह तय किया था कि कौन सी एजेंसियों को कंप्यूटर पर निगरानी के अधिकार होंगे. समय-समय पर इन एजेंसियों की सूची प्रकाशित की जाती है और हर बार करीब-करीब वही एजेंसियां होती हैं."
"उन्हीं के कंप्यूटर पर निगरानी रखी जाती है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा, अखंडता के लिए चुनौती होते हैं और आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होते हैं. आम लोगों के कंप्यूटर या डेटा पर नज़र नहीं रखी जाती है."
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नया आदेश जारी करने की ज़रूरत क्या?
वहीं, कांग्रेस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस मुद्दे पर मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा किया.
कांग्रेस प्रवक्ता जयवीर शेरगिल ने आरोप लगाया है कि तीन राज्यों में कांग्रेस की जीत के बाद अब भाजपा राजनैतिक हताशा में घर-घर की निजी बातचीत सुनना चाहती है.
उन्होंने कहा, "आईटी एक्ट के सेक्शन 69 के तहत कौन सी एजेंसियां जांच करेंगी, इसके आदेश कब दिए जा सकते हैं, ये अधिकार केस के आधार पर दिए जाते हैं. सरकार ये अधिकार सामान्य तौर पर नहीं दे सकती है."
जयवीर शेरगिल ने सवाल किया कि अगर यूपीए की सरकार में इस तरह के आदेश 2009 में दिए गए थे तो वर्तमान सरकार को नया आदेश जारी करने की ज़रूरत क्या है.
सोशल मीडिया पर विवाद के बाद भाजपा ने अपने ऑफिशियल ट्विटर हैंडल से इस बारे में स्पष्टीकरण दिया और आम लोगों को इससे बाहर रखने की बात कही है.
पार्टी ने लिखा है कि जांच के आदेश विशेष परिस्थितियों में दिए जाते हैं और किसी के कंप्यूटर पर निगरानी रखने से पहले गृह मंत्रालय से इसकी अनुमति लेनी होती है.
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क्या है आईटी एक्ट 2000
भारत सरकार ने आईटी एक्ट कानून से संबंधित अधिसूचना 09 जून, 2000 को प्रकाशित की थी. इस कानून के सेक्शन 69 में इस बात का जिक्र है कि अगर कोई राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चुनौती पेश कर रहा है और देश की अखंडता के ख़िलाफ़ काम कर रहा है तो सक्षम एजेंसियां उनके कंप्यूटर और डेटा की निगरानी कर सकती हैं.
कानून के सब-सेक्शन एक में निगरानी के अधिकार किन एजेंसियों को दिए जाएंगे, यह सरकार तय करेगी.
वहीं सब-सेक्शन दो में अगर कोई अधिकार प्राप्त एजेंसी किसी को सुरक्षा से जुड़े मामलों में बुलाता है तो उसे एजेंसियों को सहयोग करना होगा और सारी जानकारियां देनी होंगी.
सब-सेक्शन तीन में यह स्पष्ट किया गया है कि अगर बुलाया गया व्यक्ति एजेंसियों की मदद नहीं करता है तो वो सजा का अधिकारी होगा. इसमें सात साल तक के जेल का भी प्रावधान है.
किन-किन एजेंसियों को अधिकार दिए गए हैं
शुक्रवार को जारी अधिसूचना में कुल 10 सुरक्षा और ख़ुफिया एजेंसियों को कंप्यूटर और आईटी सामानों पर निगरानी के अधिकार दिए गए हैं.
ये एजेंसियां हैं-
- इंटेलिजेंस ब्यूरो
- नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो
- इन्फोर्समेंट डायरेक्टरेट
- सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज
- डायरेक्टरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस
- सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन
- नेशनल इंवेस्टिगेशन एजेंसी
- कैबिनेट सेक्रेटेरिएट (रॉ)
- डायरेक्टरेट ऑफ सिग्नल इंटेलिजेंस
- कमिश्नर ऑफ़ पुलिस, दिल्ली
निगरानी का इतिहास
तकनीक के जरिए आपराधिक गतिविधियों को अंजाम नहीं दिया जा सके, इसके लिए करीब सौ साल पहले इंडियन टेलिग्राफ एक्ट बनाया गया था.
इस एक्ट के तहत सुरक्षा एजेंसियां उस समय टेलिफोन पर की गई बातचीत को टैप करती थी.
संदिग्ध लोगों की बातचीत ही सुरक्षा एजेंसियों कि निगरानी में होती थी.
उसके बाद जब तकनीक ने प्रगति की, कंप्यूटर का चलन बढ़ा और इसके जरिए आपराध को अंजाम दिया जाने लगा, तो साल 2000 में भारतीय संसद ने आईटी कानून बनाया.
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