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अयोध्या में राम मंदिर पर संघ और बीजेपी भरोसे लायक़ नहीं- नज़रिया
- Author, प्रदीप सिंह
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का मुद्दा क़रीब 26 साल बाद संघ परिवार के एजेंडे में फिर से सबसे ऊपर आ गया है.
उसे लग रहा है कि राम मंदिर निर्माण का विरोध ढाई दशक पहले जैसा नहीं रह गया है पर मंदिर बनने की राह बनती दिख नहीं रही.
संघ परिवार के पास समय नहीं है क्योंकि यह मुद्दा धर्म और आस्था के दायरे से निकलकर चुनावी राजनीति के पाले में आ गया है.
संघ को लगता है कि 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जीत का मार्ग प्रशस्त करने के लिए राम मंदिर निर्माण के लिए कोई ठोस क़दम उठाना ज़रूरी है.
संघ और भाजपा के रुख़ में फ़र्क़ क्यों
पिछले ढाई दशक में इस मुद्दे पर भाजपा और संघ के कई रंग दिखे. 1992 में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के कई परिणाम हुए.
संघ परिवार को उस समय समझ में नहीं आया कि ख़ुश हों या दुखी. यही कारण था कि पार्टी से अलग-अलग तरह के स्वर सुनाई दिए.
विहिप (विश्व हिन्दू परिषद) के उस समय अध्यक्ष रहे अशोक सिंघल से लेकर भाजपा के सबसे क़द्दावर नेता अटल बिहारी तक कभी एक सुर में नहीं बोले.
सात दिसंबर 1992 की सुबह जिन लोगों ने लालकृष्ण आडवाणी को कांपती हुई आवाज़ में बोलते सुना या देखा वे लोग इस बात को अच्छी तरह समझ सकते हैं.
इसके बाद शुरू हुआ भाजपा की राजनीतिक अस्पृश्यता का दौर.
यही कारण था कि 1996 में लोकसभा की 161 सीटें जीतने के बावजूद अटल बिहारी को 13 दिन के बाद प्रधानमंत्री के रूप में इस्तीफ़ा देना पड़ा.
संविद (संयुक्त विधायक दल) के दौर से 1989 में वीपी सिंह की जनता दल सरकार के गठन तक मध्यमार्गी दलों ही नहीं वामदलों को भी भाजपा के साथ खड़े होने में कभी एतराज़ नहीं हुआ. पर छह दिसंबर 1992 ने सब बदल दिया.
भाजपा ने हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में हुई पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में पहली बार अयोध्या में राम मंदिर के आंदोलन को समर्थन देने का फ़ैसला किया था.
राम मंदिर आंदोलन से भाजपा को राजनीतिक फ़ायदा हुआ इस पर कोई विवाद नहीं हो सकता पर मस्जिद गिरने का उसे राजनीतिक फ़ायदा हुआ, यह विश्वास के साथ नहीं कहा जा सकता.
भाजपा से राजनीतिक छुआ-छूत ख़त्म हुई 1998 में, जब उसने अपने चुनाव घोषणापत्र से राम मंदिर, समान नागरिक संहिता और अनुच्छेद 370 जैसे मुद्दे हटा दिए.
केंद्र में छह साल उसकी सरकार रही पर पार्टी को राम और अयोध्या की याद आना तो दूर, उसने कुछ ऐसा किया कि विहिप और अशोक सिंघल की इस मुद्दे पर विश्वसनीयता ही ख़त्म हो गई.
भाजपा पर संघ का भरोसा नहीं
जिस राम मंदिर मुद्दे ने भाजपा को दो लोकसभा सीटों से केंद्र की सत्ता तक पहुंचाया उस पर पार्टी ही नहीं पूरे संघ परिवार की विश्वसनीयता ख़त्म हो चुकी है.
जिन अशोक सिंघल के नाम पर देश भर से लाखों लोग जुटते थे, उनके जीवित रहते ही उनकी अपील का असर ख़त्म हो गया था.
मंदिर समर्थकों को यक़ीन हो गया कि भाजपा के लिए राम मंदिर आस्था का नहीं महज़ वोट बटोरने का साधन है.
यही कारण है कि 2002 में उत्तर प्रदेश में भाजपा पहले नंबर से तीसरे नंबर की पार्टी बन गई. 2004 के लोकसभा चुनाव में कभी 62 लोकसभा सीट तक जीतने वाली पार्टी नौ सीट पर सिमट गई.
उसके बाद केंद्र में 10 और राज्य में पंद्रह साल बाद मोदी लहर पर सवार होकर ही भाजपा सत्ता में लौट पाई.
साल 2014 में मोदी के प्रधानमंत्री और 2017 में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद लोगों में उम्मीद बंधी कि मंदिर के मुद्दे पर सरकार कुछ करेगी. अब भी मामला आश्वासन से आगे नहीं बढ़ा.
केंद्र सरकार को सर्वोच्च अदालत से उम्मीद थी. उसे लग रहा था कि चुनाव से पहले अदालत का फ़ैसला आ जाएगा. अदालत ने मामले की जल्दी सुनवाई से इनकार कर दिया तो उसकी मुश्किल बढ़ गई.
दबाव बनता 'दिखाने की' कोशिश
भाजपा को लोकसभा चुनाव से पहले एक भावनात्मक मुद्दे की तलाश है. मंदिर के मसले पर अब किसी वादे से काम नहीं चलने वाला.
ऐसे में सरकार चाहती है कि राम मंदिर पर सरकार की किसी पहल के लिए ऐसा माहौल बने कि उस पर भारी जनदबाव है.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद यही करने का प्रयास कर रहे हैं. अयोध्या में बुलाई गई धर्मसभा का कार्यक्रम फ्लॉप रहा.
अब रविवार को दिल्ली के रामलीला मैदान में धर्म संसद बुलाई गई. दोनों कार्यक्रमों को देखकर संघ परिवार को अशोक सिंघल की अहमियत का एक बार फिर अहसास हुआ होगा.
इस पूरे आयोजन को संघ सीधे देख रहा है. दोनों कार्यक्रमों न तो पहले जैसा समर्थन दिखा और न ही उत्साह.
रामलीला मैदान में संघ के सरकार्यवाह भैय्या जी जोशी ने कहा कि सरकार मंदिर निर्माण का रास्ता निकाले.
इन सारे आयोजनों का एक मक़सद सुप्रीम कोर्ट पर भी दबाव बनाने का प्रयास है. जनवरी में मुख्य न्यायाधीश इस मामले की सुनवाई के लिए बेंच बनाने वाले हैं.
जनवरी में भी जल्दी सुनवाई नहीं होती है तो सरकार के पास एक आधार होगा कि अदालत जनभावना का भले ही ख़याल न करे पर सरकार ऐसा नहीं कर सकती.
जैसे-जैसे समय बीत रहा है संघ परिवार का धैर्य ख़त्म होता जा रहा है. ये धार्मिक आयोजन ही नहीं संसद के शीतकालीन सत्र में राज्यसभा सदस्य राकेश सिन्हा का अयोध्या पर निजी विधेयक भी इसी रणनीति का हिस्सा है.
भाजपा इस निजी विधेयक के ज़रिए बाक़ी दलों ख़ासतौर से कांग्रेस पार्टी को घेरना चाहती है. वह कांग्रेस को इस मुद्दे पर स्पष्ट रुख़ लेने के लिए मजबूर करना चाहती है.
एक फ़रवरी 2019 को पेश होने वाले अंतरिम बजट से पहले सरकार राम मंदिर पर कोई पहलक़दमी कर सकती है.
फिर वह सुप्रीम कोर्ट में जल्दी सुनवाई के लिए अनुरोध हो या संसद में विधेयक लाकर.
भाजपा को लोकसभा चुनाव से पहले मंदिर के मुद्दे पर कुछ ऐसा करना है जिससे लोगों को लगे कि सरकार और पार्टी मंदिर निर्माण के मुद्दे पर गंभीर है.
वह राम मंदिर मुद्दे पर अपनी खोई हुई विश्वसनीयता की बहाली चाहती है.
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