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ब्लॉग: क्या तेलंगाना के लिए जान देने वालों के सपने सच हो गए?
- Author, बाला सतीश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, तेलुगु सेवा
"नीलु, निधलु, नियमाकालु..." तेलंगाना को अलग राज्य बनाने के लिए अपनी जान देने के लिए तैयार रहने का दावा करने वाले आंदोलनकारी युवाओं का ये नारा कभी यहां की हवाओं में गूंजता था.
आर्थिक मदद, पानी और रोज़गार की मांगों को लेकर आंदोलन करने वाले कुछ युवाओं ने तो खुद को मौत के मुंह में भी धकेल दिया.
आंदोलनकारियों को लगता था कि तेलंगाना एक अलग राज्य बन जाएगा तो उन्हें रोजगार के बेहतर अवसर मिलेंगे और प्रदेश का विकास होगा.
आंदोलन के उस दौर लोग मानने लगे थे कि अलग राज्य ही 'हर समस्या का समाधान' है और ऐसा होते ही एक चुटकी में उनकी सभी मुश्किलें हल हो जाएंगी.
शायद इसी कारण आंदोलन से अपेक्षाएं भी अधिक थीं. लेकिन तेलंगाना को अलग राज्य बने चार साल से ज़्यादा वक्त हो चुका है.
बीबीसी ने इस मौके पर ये जानने की कोशिश की कि आंदोलन से जो उम्मीदें लगाई गई थीं, उनमें से कितनी पूरी हुईं और कितनी रह गईं.
आज क्या हैं नारों के मायने
बीबीसी ने तेलंगाना आंदोलन में अपने पारिवार के सदस्यों को गंवानेवालों से मुलाक़ात की और ये समझने की कोशिश की कि उनके लिए क्या अब इन नारों के कुछ मायने बचे हैं.
इन मुलाक़ातों के दौरान हमें मिली-जुली प्रतिक्रियाएं मिलीं लेकिन जहां तक रोज़गार के मुद्दे की बात है, हमें लोगों में काफ़ी निराशा दिखाई दी.
तेलंगाना के नए नवेले ज़िले यदाद्री के मोटकुर मंडल के पोडिछेडी गांव में हमने मुलाक़ात की शंकरम्मा से. आंदोलन के दौरान शंकरम्मा के बेटे श्रीकांतचारी ने आत्मदाह कर लिया था.
शंकरम्मा को लगता है कि सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध होने की मांग एक हद तक पूरी हो गई है लेकिन रोज़गार की समस्या अभी भी जस की तस है.
लेकिन वो ये भी मानती हैं कि आंदोलन में खुद का बलिदान करने वालों को अब तक पहचान नहीं मिली है.
वह बताती हैं, "बीते चार सालों में वंचित समुदाय की कुछ मांगें पूरी हुई हैं. सिंचाई व्यवस्था में भी कुछ सुधार हुआ है. लेकिन बेरोजगारी की समस्या पर अब तक ध्यान नहीं दिया गया है. बेरोजगार युवा अपनी नौकरियों का इंतज़ार कर रहे हैं."
"शहीदों के बलिदान का सम्मान किया गया है लेकिन उन्हें असली सम्मान तब मिलेगा जब युवकों को नौकरी मिल जाएगी."
फ्री होनी चाहिए शिक्षा
शंकरम्मा मानती हैं कि समाज के सभी वर्गों के लिए मुफ्त शिक्षा व्यवस्था होनी चाहिए.
वो कहती हैं, हायर एजुकेशन तक मुफ़्त में शिक्षा देने की व्यवस्था सरकार को करनी चाहिए, तभी आंदोलन में शहीद होने वालों को असली सम्मान मिलेगा.
शंकरम्मा कहती हैं, "तेलंगाना के मुद्दे के लिए लगभग एक हज़ार लोगों ने अपना बलिदान दिया. इनमें से 450 परिवारों को सरकारी नौकरियां और दस लाख रुपये का मुआवज़ा मिला. सरकार ने आश्वासन दिया था कि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और एफ़आईआर की कॉपी लाने पर बाकी लोगों को भी मुआवज़ा मिल जाएगा."
"ऐसे परिवार आज भी इंतज़ार कर रहे हैं. आंदोलन के नेताओं ने आश्वासन दिया था कि अगर हम आंध्रप्रदेश से अलग हो गए तो तेलंगाना के लोगों को ज़्यादा अवसर मिलेंगे. इसके साथ ही सभी लोगों को एक घर और नौकरी देने का आश्वासन दिया गया था. अब कम से कम पढ़े लिखे लोगों को ही नौकरी पर रख लें."
"तेलंगाना के लिए शहीद होने वाले आंदोलनकारियों के परिवारों को भी स्वतंत्रता सेनानी पेंशन योजना की तरह पेंशन मिलनी चाहिए. स्वतंत्रता सेनानियों की तरह ज़मीन भी मिलनी चाहिए. ऐसे ज़्यादातर परिवारों में उन लोगों ने अपनी जान दी जो परिवार के भरण-पोषण का ज़िम्मेदारी उठा रहे थे."
'मेरा बेटा वापिस नहीं ला सकते'
शंकरम्मा को शिकायत है कि मुख्यमंत्री केसीआर को उनके बेटे श्रीकांतचारी याद भी नहीं है.
वो कहती हैं, "बीते चार सालों में, हम शहीदों को भूल गए हैं. तेलंगाना में सभी लोग खुश हैं. लेकिन शहीदों के परिवार खुश नहीं हैं. जिन्होंने अपनी जान दी उनके परिवार तबाह हो गए."
"केसीआर जब भी तुनगाटतुर्थी आए, जहां उनका गांव भी है, तो उन्होंने श्रीकांतचारी को श्रद्धांजलि देना भी ज़रूरी नहीं समझा. ऐसे में क्या बचा है? करोड़ों रुपये दिए जा सकते हैं लेकिन कोई भी मेरे बेटे को वापिस नहीं ला सकता है. सरकार ने शहीदों के परिवारों को जो भी दिया है, वो उनके बलिदान के मुक़ाबले कुछ भी नहीं है. कम से कम कुछ फोरम्स को उनके नाम पर समर्पित किया जाए."
श्रीकांतचारी की मौत के बाद उनके भाई को सरकार के रेवेन्यू विभाग में नौकरी मिली है.
शंकरम्मा ने 2014 में टीआरएस के टिकट पर चुनाव भी लड़ा लेकिन उत्तम कुमार रेड्डी से हार गईं.
इस बार टीआरएस ने उन्हें टिकट देने की पेशकश भी नहीं की.
'आंदोलन को मज़बूती देगा मेरा बलिदान…'
बीबीसी की टीम करीमनगर पहुंची जहां मुलाक़ात हुई सिपाही किश्तैया की पत्नी पद्मावती से. सिपाही किश्तैया भी आंदोलन में अपनी जान देने वालों में से एक हैं.
पद्मावती को लगता है कि तेलंगाना सरकार ने शहीदों के परिवारों के साथ न्याय किया है.
अपनी पति को याद करतही हुए वो कहती हैं, "वो कहा करते थे, तेलंगाना राज्य बनना मेरी ज़िंदगी से भी बढ़कर है. मैं खुद का बलिदान दे कर खुश हूं और मेरा पूरा परिवार भी न्योछावर हो जाए तो भी मैं परवाह नहीं करूंगा. अगर मैं ज़िंदा रहा तो मेरा परिवार खुश होगा. उन्हें लाभ भी होगा. लेकिन तेलंगाना के अलग राज्य बनने से तेलंगाना के सभी लोगों का फायदा होगा."
"उन्होंने एक रोज़ टॉवर पर चढ़कर रात 2 बजे खुद को गोली मार ली. उन्होंने किसी की सलाह नहीं मानी. बच्चे भी उस वक्त छोटे ही थे. वो कहते थे कि आंदोलन कमज़ोर हो रहा है और तेलंगाना मेरे बलिदान के बाद ही बनना चाहिए."
"वह एक इमानदार पुलिस वाले थे. उन्होंने अपनी नौकरी के दौरान ज़्यादातर समय नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में काम किया. वह उनकी ज़िंदगियों के बारे में बात किया करते थे. आम लोगों की ज़िंदगियों से जुड़े गाने गाया करते थे."
"उन्होंने जहां भी काम किया वो नक्सलवादियों का मन बदलने की कोशिश करते थे. वह तेलंगाना के अलग राज्य बनने के आंदोलन को देखकर काफ़ी परेशान थे."
केसीआर से खुश हैं कुछ लोग
किश्तैया बागी़ी संगीतकार गद्दार को पसंद करते थे और उनकी आख़िरी इच्छा केसीआर और गद्दार से बात करना थी.
पद्मावती कहती हैं, "मुख्यमंत्री केसीआर हमें अपने परिवार और बच्चों की तरह मानते हैं. मेरे पति अपने बच्चों को शिक्षित होते हुए नहीं देख सके. कोई भी मुआवज़ा उनकी कमी नहीं पूरी कर सकता. लेकिन हम लोगों को अब किसी तरह की कमी नहीं है."
"बीते चार सालों के दौरान, टीआरएस सरकार ने शहीदों के परिवारों की हरसंभव मदद की है. उनका बलिदान बेकार नहीं गया. वो हमेशा हमारे साथ हैं और सरकार भी हमारे साथ है."
पद्मावती ने पानी, आर्थिक मदद और रोज़गार के मुद्दे पर अपनी राय नहीं दी.
वो कहती हैं कि उनके पति की आख़िरी इच्छा अपनी बेटी को डॉक्टर बनते देखना था. टीआरएस सरकार हर साल उसकी पढ़ाई पर पांच साल खर्च कर रही है.
वो कहती हैं, "हम शहीदों के सपनों को पूरा कर सकते हैं. लेकिन वो अब हमारे साथ नहीं हैं. फिर भी हम खुश हैं. मैं और मेरा बेटा काम कर रहे हैं. मेरे पति की आख़िरी इच्छा का सम्मान करते हुए टीआरएस ने मेरी बेटी की मेडिकल की पढ़ाई के लिए खर्चा दिया."
पद्मावती और उनके बेटे को सरकारी नौकरियां मिल गई हैं.
ओस्मानिया में छाई है अशांति
तेलंगाना मुद्दे का आग़ाज करने वाले ओस्मानिया यूनिवर्सिटी के छात्र रोज़गार के मुद्दे पर निराश नज़र आते हैं.
ओस्मानिया यूनिवर्सिटी में हमारी मुलाक़ात तेलुगु विभाग में शोध छात्र जे शंकर से हुई जिन्हें तेलंगाना आंदोलन के दौरान ने कई मामलों का सामना करना पड़ा था.
धर्मापुरी में रहने वाले जे शंकर कहते हैं, "जल, धन और रोज़गार के मुद्दों में से जल और धन शायद तत्काल हल नहीं किए जा सकते हैं. लेकिन हम अपने लोगों को नौकरियां तो दे ही सकते हैं."
"हम समझ सकते हैं कि तेलंगाना को किस तरह मुल्की कानून और गिरग्लानी रिपोर्ट के नाम पर छला गया है. सरकार जीओ 610 और जीओ 36 को अमल में नहीं ला पाई. आंदोलन के दौरान 1.07 लाख नौकरियों को भरने की मांग उठाई गई थी. लेकिन इन साढ़े चार सालों में सरकार ये नहीं कर सकी है."
वह दावा करते हैं, "तेलंगाना के अलग राज्य बनने के बाद आंदोलन से जुड़ी उम्मीदें और लक्ष्य सब किनारे हो गए. छात्रों और किसानों के साथ अन्याय किया गया. शिक्षा दूर की कौड़ी बन गया. अस्पताल के खर्चे उठाना मुश्किल हो गया. सरकार ने लोकतंत्र को भी किनारे रख दिया."
"सरकारी स्कूलों को एक तरफ खस्ताहाल कर दिया गया है, और वहीं दूसरी ओर निजी विश्वविद्यालय कानून पास कर दिया गया है. सरकार ऐसे असंवैधानिक तरीकों को अपना रही है."
'ओस्मानिया को क्यों नकार रहे हैं केसीएआर'
वहीं, बोधान की रहने वाली और तेलंगाना आंदोलन में भाग लेने वाली एक अन्य शोधार्थी रेशमा सुल्ताना कहती हैं कि केसीआर की दूसरी योजनाएं ठीक हैं लेकिन ओस्मानिया विश्वविद्यालय को नजॉरअंदाज़ करना ठीक नहीं है.
14 फरवरी 2014 को आंदोलनकारियों पर आंसू गैस का प्रयोग किए जाने के दौरान वह घायल हो गई थीं. उस दौरान वह एमएससी प्रथम वर्ष की छात्रा थीं. और अब वह अपनी पीएचडी की पढ़ाई कर रही हैं.
रेशमा केसीआर की आलोचना करते हुए कहती हैं, "केसीआर से प्रेरित होकर मैंने अपने घरवालों की बात को अनसुना किया और आंदोलन में कूद पड़ी. मेरे जैसे तमाम लोगों ने तेलंगाना को अलग राज्य बनाने के लिए संघर्ष किया."
"लेकिन अब हम वो सब कुछ नहीं देख पा रहे हैं जिसकी वजह से तेलंगाना आंदोलन किया गया था."
"एक हद तक सिंचाई से जुड़ी समस्या का सुलझाई गई है. सरकार के पास धन भी आ गया है. लेकिन नौकरियां कहां हैं? अब तक एक भी प्लेसमेंट नहीं दिखाई दिया है."
"केसीआर को समझना चाहिए कि उनकी ताकत और कमजोरी ओस्मानिया यूनिवर्सिटी के छात्र ही हैं. लेकिन उन्होंने आंदोलनकारियों को किनारे रख दिया है."
"मैं अभी भी केसीआर को पसंद करती हूं और उनका सम्मान करती हूं. उनकी योजनाएं अच्छी हैं लेकिन उन्हें छात्रों की भी परवाह होनी चाहिए. एक बार में कई योजनाएं शुरू करने की जगह आपको सोचना चाहिए कि हर परिवार को एक नौकरी मिल जाए तो पूरे परिवार का भला होगा."
"मेरा निवेदन यही है कि केसीआर रोज़गार पैदा करने पर ध्यान दें ताकि नौकरी के लिए तरस रहे शिक्षित युवाओं को राहत मिले."
"मुझे नौकरियों के बारे में जानकारी नहीं है. लेकिन अल्पसंख्यक छात्रों को पीजीटी, जेएल और डीएल में एक भी नौकरी नहीं है. उन्होंने वादा किया था कि मुस्लिमों के लिए चार प्रतिशत का आरक्षण काफ़ी नहीं है और 12 प्रतिशत आरक्षण मिलना चाहिए. लेकिन हमें न चार फीसदी आरक्षण मिला और न ही 12 फीसदी. अपनी दूसरी योजनाओं में बेहतरीन प्रदर्शन के बावजूद उन्होंने ओस्मानिया यूनिवर्सिटी पर ध्यान क्यों नहीं दिया, ये बात समझ नहीं आती है."
कितने लोगों को मिला मुआवज़ा
प्रदेश सरकार ने आधिकारिक रूप से आंदोलन में अपनी जान देने वालों के परिवारों को दस लाख रुपये का मुआवज़ा देने की घोषणा की थी.
तेलंगाना शहीद एसोशिएसन के अध्यक्ष कडिवेंदी तिरुपति बताते हैं कि साल 2009 दिसंबर से 2013 अक्टूबर तक 1003 लोगों ने इस आंदोलन के लिए अपनी जान दी.
आंदोलन के दौरान केसीआर प्रभावित परिवारों से मिलने जाते थे और इसी आधार पर ये जानकारी हासिल की गई है.
लेकिन सरकार ने सिर्फ 698 परिवारों को मुआवज़ा दिया है.
कडिवेंदी कहते हैं, "सरकार का कहना है कि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट नहीं होने की वजह से शहीदों की पहचान करना मुश्किल है. लेकिन किसी को ये याद नहीं है कि छात्रों और कर्मचारियों के बलिदान की वजह से तेलंगाना राज्य अस्तित्व में आया है."
"जिन लोगों ने अपनों को खोया है उनका दर्द वही समझ सकता है जिनके अपनों ने भी इस आंदोलन में अपनी जान दी है.
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