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दिल्ली में किसानों की हुंकार से सरकार पर क्या असर
- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
जब लाल-लाल, जब लाल-लाल, जब लाल-लाल लहकाएगा
तब होश ठिकाने, होश ठिकाने, होश ठिकाने आएगा
कम्युनिस्ट क्रांति से प्रेरित इस गीत के स्वर एक बार भले ही वहां तेज़ सुनाई दिए हों लेकिन शुक्रवार को दिल्ली में लाल के साथ-साथ पीला, हरा और नीला सब रंग लहराता दिखा.
रामलीला मैदान से जंतर-मंतर जाने वाली लगभग तीन किलोमीटर लंबी सड़क एक समय कन्याकुमारी से कश्मीर तक के किसानों और खेतिहर मज़दूरों से पट सी गई.
उनके आगे-पीछे थी ख़ाक़ी लिबास में पैदल और गाड़ियों पर चल रही पुलिस और रैपिड एक्शन फ़ोर्स के जवान.
किसान मुक्ति मार्च के ख़ात्मे पर पटेल चौक से जंतर मंतर तक एक हुजूम सा नज़र आ रहा था, सड़क पर बिछी कार्पेट पर बैठी किसानों की ये भीड़ स्टेज से और भी विशाल दिख रही थी.
दोपहर बाद शरद पवार, फ़ारूक़ अब्दुल्ला, सीताराम येचुरी स्वराज इंडिया के योगेंद्र यादव के साथ स्टेज पर पहुंचे.
इसी मंच से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और आम आदमी पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भ्रष्टाचार पर घेरने की कोशिश की और 2019 के लिए चेतावनी दे डाली.
राहुल गांधी ने कहा कि किसानों के क़र्ज़ माफ़ी के लिए जिस भी तरह के क़ानून की ज़रूरत पड़ेगी वो उसे लाने का वादा करते हैं.
उन्होंने कहा, "हिंदुस्तान का किसान ये कह रहा है कि अगर आप वायु सेना के 30 हज़ार करोड़ रुपए अनिल अंबानी को दे सकते हो, अगर आप अपने पंद्रह मित्रों को तीन लाख पचास हज़ार करोड़ रुपये दे सकते हो तो किसानों की मेहनत के लिए, पसीने के लिए आपको क़र्ज़ माफ़ करना ही पड़ेगा."
अरविंद केजरीवाल ने दावा किया कि मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा देकर कहा है कि वो स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू नहीं कर सकती.
उन्होंने कहा, "प्रधानमंत्री सरकार के बच गए पांच महीने के भीतर वो हलफ़नामा वापस लें, नहीं तो जो किसान आए हैं वो 2019 में पूरे देश भर में क़यामत ढा देंगे." केजरीवाल 2019 के आम चुनाव की तरफ़ संकेत कर रहे थे.
मनमोहन सिंह सरकार में कृषि मंत्री के तौर पर किसानों को फ़सल के लिए बेहतर दाम दिलवाने में असफल रहे शरद पवार ने अपनी बात किसान-संबंधी दो बिलों को समर्थन देने तक सीमित रखी.
देश के 208 किसान और मज़दूर संगठनों ने मिलकर इन्हीं दोनों बिलों की मांग को लेकर शुक्रवार की किसान रैली आयोजित की थी.
सदन में पेश हो चुके इन दोनों प्राइवेट मेम्बर बिल्स को- जो क़र्ज़ माफ़ी और लागत पर डेढ़ गुना क़ीमत से संबंधित हैं, विशेष सत्र बुलाकर बहस करने की मांग भी किसान नेताओं ने उठाई.
एनडीए गठबंधन की शिव सेना और नीतीश कुमार की जनता दल यू समेत 21 राजनीतिक दलों ने इस बिल को अपना समर्थन दिया है.
लेकिन वो सिर्फ़ राजनीतिज्ञ नहीं थे जो मोदी सरकार को चेतावनी देते दिखे, किसानों का स्वर भी ख़फ़ा-ख़फ़ा सा था.
पिछले 15 सालों से बीजेपी शासित मध्य प्रदेश से ताल्लुक रखनवाले और पार्टी समर्थक रह चुके मंदसौर के विनोद शर्मा तीसरी बार किसान प्रदर्शन में शामिल होने दिल्ली आए हैं और दावा करते हैं कि इस सरकार के दौर में डीज़ल, खाद, बीज वग़ैरह की बढ़ी क़ीमतों के कारण खेतिहरों को बहुत मुश्किल के दौर से गुज़रना पड़ रहा है.
शर्मा ने 2017 में किसानों पर पुलिस की गोलीबारी की बात को भी दुहराया. उन्होंने कहा, "इस बार शिवराज भैया का सूपड़ा साफ़ हो जाएगा!"
उत्तर प्रदेश के पीलीभीत से इस प्रदर्शन में पहुंचे विक़ारूल हसन ख़ान ने कहा, "आज इन्हें याद दिलाने आए हैं, दरवाज़े पर दस्तक दे रहे हैं, आवाज़ दे रहे हैं कि जागो. अगर ये नहीं जागे तो इन्हें सोता छोड़कर हम कोई अगला चुन लेंगे."
जिस समय ये बातें हो रही थीं, तमिलनाडु से आए किसानों के जत्थे मुर्दों की खोपड़ियों और हड्डियां को लिए चल रहे थे और तेंलगना से आई कुछ औरतों के हाथों में उनके उन रिश्तेदारों- बाप-भाई की तस्वीरें थीं, जिन्होंने क़र्ज़ से तंग आकर ख़ुदकुशी कर ली थी.
सड़क के किनारे कुछ लोग इस क़िस्म के पोस्टर और बिल बोर्ड लेकर खड़े थे, जिस पर लिखा था,"किसान की आह जो दिल से निकल जाएगी, क्या समझते हो कि ख़ाली जाएगी."
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