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विज्ञापन देने के मामले में नंबर वन है बीजेपी
भारत में मीडिया की पहुंच के संबंध में आंकड़े जुटाने वाली संस्था ब्रॉडकास्ट ऑडिएंस रिसर्च काउंसिल (बार्क) के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार भाजपा सबसे अधिक विज्ञापन देने वाली ब्रांड बन गई है.
बार्क के आँकड़े बताते हैं कि 10 नवंबर से 16 नवंबर के बीच भारतीय जनता पार्टी ने मीडिया में सबसे अधिक विज्ञापन दिए हैं. इस सप्ताह भाजपा ने कुल 22,099 विज्ञापन दिए हैं.
इसके बाद दूसरे नंबर पर नेटफ्लिक्स है और तीसरे नंबर पर है ट्रिवागो. भाजपा और नेटफ्लिक्स में अंतर करीब 10,000 विज्ञापनों का है.
हाल में छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में मतदान संपन्न हुए हैं. भारत के चार और राज्यों- मध्य प्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना और मिज़ोरम में फिलहाल चुनाव प्रचार का माहौल है. और ऐसे में माना जा रहा है कि लोगों तक पहुंचने के लिए भाजपा विज्ञापनों पर अधिक खर्च कर रही है.
इससे पहले इसी साल मई में आई मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़ मई 2014 में सत्ता में आने के बाद से मोदी सरकार ने विज्ञापनों पर 4,343.26 करोड़ रुपये खर्च किए हैं.
सूचना और प्रसारण मंत्रालय के तहत ब्यूरो ऑफ़ आउटरीच कम्यूनिकेशन ने एक आरटीआई के जवाब में जानकारी दी थी कि ये खर्च प्रिंट और टेलीविज़न पर दिए गए विज्ञापनों पर किया गया था.
इस रिपोर्ट के बारे में बीजेपी के प्रवक्ता गोपाल कृष्ण अग्रवाल ने बीबीसी संवाददाता मीना कोटवाल को बताया, "चुनावी माहौल में विज्ञापन बहुत जरूरी है. लेकिन ऐसे में सिर्फ सोशल मीडिया पर भरोसा नहीं किया जा सकता."
वो कहते हैं, "सोशल मीडिया ने अपनी विश्वसनीयता खो दी है. बीजेपी देश की सबसे बड़ी पार्टी है और इसलिए लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए विज्ञापन की मदद ली जाती है."
"और अगर हम विज्ञापन देने वाली सबसे बड़ी पार्टी बने हैं तो इसका मतलब है इसके भुगतान में पूरी तरह से पारदर्शिता है क्योंकि पूरा पैसा चेक के ज़रिये दिया जाता है."
किसी और राजनीतिक दल का नाम नहीं
बार्क की टॉप 10 ब्रांड की इस सूची में किसी और राजनीतिक पार्टी का नाम नहीं है.
इधर इस बीच इस तरह की बातें भी सामने आ रही थीं कि भाजपा के मुक़ाबले खड़ी कांग्रेस के सामने पैसों की कमी की समस्या है.
इस मुद्दे पर बीबीसी संवाददाता नीलेश धोत्रे से बात करते हुए पार्टी के युवा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा, "चुनाव सिर्फ़ पैसों के आधार पर नहीं लड़ा जाता है. चुनाव बोलियों (वायदों) और सिद्धांतों के आधार पर लड़ा जाता है."
"हां, पैसों की ज़रूरत होती है. लेकिन चुनाव जीतने का एकमात्र ज़रिया पैसा नहीं है. वर्तमान में कांग्रेस के पास जितना फंड है, हम उसी के आधार पर चुनाव लड़ रहे हैं."
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