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दिल्ली की 'ज़हरीली' हवा इन्हें सबसे ज़्यादा मार रही है
- Author, विकास पांडे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"मेरी आंखें दुखती हैं और रिक्शा को चलाते हुए सांस लेने में तकलीफ़ होती है. मेरा शरीर मुझे रोकता है कि दिल्ली की ज़हरीली हवा से दूर भाग जाऊं, लेकिन मुझे अपने परिवार के लिए कमाना है. मैं और कहाँ जाऊँ? ये सड़कें ही हमारा घर हैं."
संजय कुमार पांच साल पहले बिहार से नौकरी की खोज में दिल्ली आए थे, लेकिन सफलता नहीं मिली. उन्होंने खुद का पेट पालने और अपने परिवार को कुछ पैसे भेजने के लिए रिक्शा चलाना शुरू किया.
इस सबके बाद घर किराए पर लेने के लिए तो पैसा बचता नहीं था तो उन्होंने सड़कों पर सोना शुरू कर दिया.
वो कहते हैं, "मैं बस एक बिस्तर चाहता हूं, लेकिन मुझे पता है कि ये भी एक दूर का सपना है. मैं दो वक्त ठीक से खाना चाहता हूं, लेकिन वो भी मिलना मुनासिब नहीं. मैं कम से कम साफ़ हवा में सांस लेने की उम्मीद करता हूं, लेकिन सर्दियों के महीनों में ये भी नामुमकिन हो गया है. आप तो अपने घर जा सकते हैं, लेकिन मुझे तो हर वक्त पर सड़क पर ही होना है."
दिनोंदिन बिगड़ती दिल्ली की हवा
हर साल नवंबर और दिसंबर में शहर में हवा की गुणवत्ता ख़राब होती जा रही है क्योंकि पड़ोसी राज्यों के किसान अपने खेतों को साफ़ करने के लिए फ़सल की पराली जलाते हैं. फिर दिवाली पर त्योहार का जश्न मनाने के लिए पटाखे जलाते हैं और ये ज़हरीली गैसों को और बढ़ाता है.
दिल्ली में हज़ारों रिक्शा चलाने वाले लोग हैं जो लोगों के लिए छोटी दूरियां तय करने में मददगार हैं. लेकिन चूंकि सर्दियों में कुछ क्षेत्रों में प्रदूषण का स्तर सुरक्षित सीमा से 30 गुना ज़्यादा हो जाता है तो रिक्शा चलाने वाले सबसे ज़्यादा प्रभावित होते हैं.
रिक्शा खींचना फेफड़ों पर अतिरिक्त दबाव डालता है और उस पर गंभीर प्रदूषण स्थिति को और ख़राब कर देता है. छोटे ज़हरीले पीएम 2.5 पार्टिकल्स फेफड़ों और रक्त प्रवाह में गहरे तक पहुंच जाते हैं.
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में इनकी दुर्दशा का संज्ञान भी लिया. हाल ही में प्रदूषण से संबंधित याचिका की सुनवाई करते समय अदालत ने सरकार से कहा कि लोगों को घर में रहने की सलाह देना समाधान नहीं है.
अदालत ने कहा, "वे भारी काम कर रहे हैं. आप उन्हें ये नहीं कह सकते कि आप अपना काम रोकिए क्योंकि सुबह में काम करना आपके लिए असुरक्षित है. यह एक बहुत ही गंभीर स्थिति है."
मैं जिस भी रिक्शा खींचने वाले से मिला, या तो खांस रहा था या उसे सांस लेने में तकलीफ़ हो रही थी. उनमें से कुछ तो अपनी बात भी खत्म नहीं कर पा रहे थे. एक मेट्रो स्टेशन पर धुआं इतना ज़्यादा था कि लगभग राख का स्वाद मुंह में आ रहा था और कुछ मीटर के परे देखना भी असंभव था.
लेकिन रिक्शा वालों को अभी भी सड़क पर देखा जा सकता है जो धुएं में रिक्शा खींचने में कड़ी मेहनत कर रहे हैं.
जय चंद जाधव, जो पश्चिम बंगाल से सात साल पहले दिल्ली आए थे, कहते हैं कि ब्रेक लेने का विकल्प नहीं है.
भूख एक बड़ी चुनौती
उन्होंने बताया, "मैं एक दिन में लगभग 300 रुपए कमाता हूं और उससे कुछ खाने के लिए खरीदता हूं और बाकी अपनी पत्नी और दो बच्चों के लिए बचाता हूं. मेरा परिवार मुझ पर निर्भर है, इसलिए मुझे काम करते रहना पड़ता है - भले ही सांस लेने में तकलीफ़ हो रही हो."
जाधव अपना दिन 6 बजे शुरू करते हैं और सुबह की सवारियों के लिए पास के मेट्रो स्टेशन जाते हैं. वह सुबह 11 बजे तक काम करते हैं और फिर मंदिरों और चैरिटी होम्स में मुफ्त खाने की तलाश करते हैं.
वह खाना खरीदने पर पैसा तभी खर्च करते हैं जब उन्हें मुफ्त खाना नहीं मिलता. जाधव आधी रात तक काम करना जारी रखते हैं और केवल तभी आराम करते हैं जब कोई यात्री नहीं होता है. वह अपने शाम का भोजन कुछ रेस्तरां से जुटाते हैं जो बचे हुए भोजन को बेघरों में बांटते हैं.
लेकिन मुफ्त भोजन ढूंढना आसान नहीं होता. दिल्ली में रिक्शा चलाने वालों के लिए भूखे रहना आम हो गया है.
जाधव कहते हैं, "मैं कभी-कभी कुछ भी खाए बिना अपना रिक्शा चलाता हूं और उतना मैं कर सकता हूं, लेकिन धुआं सबसे ख़राब है. इससे मुझे लगता है कि मैं अपनी छाती पर 50 किलो के वज़न के साथ रिक्शा खींच रहा हूं."
पिछले कुछ दिनों से वह अस्वस्थ रह रहे हैं और पिछले सप्ताह दिवाली के बाद से उनकी खांसी बदतर हो गई है.
ज़हरीला धुआं और मेहनत की मजबूरी
उन्होंने कहा, "मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि जब हवा इतनी ख़राब होती है तो लोग पटाखे क्यों जलाते हैं. वे तो ऐसा कर अपने घर चले जाते हैं, लेकिन मेरे जैसे लोगों को उनके किए का नतीजा भुगतना पड़ता है. लोग इस शहर में इतने असंवेदनशील हैं."
वह अपनी बात कर ही रहे थे कि कई रिक्शा खींचने वाले उनके चारों ओर इकट्ठा हो जाते हैं और सब धुएं के बारे में शिकायत करते हैं. उनमें से एक थे आनंद मंडल जो 18 घंटे काम करने के बाद आधी रात को काम बंद करके आए थे.
वह कहते हैं, "इतने लंबे कामकाजी घंटे बहुत मुश्किल हैं. मेरी छाती जल रही है और मैं ठीक से सांस भी नहीं ले पा रहा हूं, ख़ासकर रिक्शा चलाते हुए. पिछले साल, मेरे एक दोस्त के भी यही लक्षण थे और उसे अस्पताल जाना पड़ा. वह महीनों तक काम नहीं कर सका. मैं डरता हूं और प्रार्थना करता हूं कि यह मेरे साथ ना हो."
शहर भर में अधिकांश रिक्शा खींचने वालों की यही कहानी है.
दो दशक पहले पुरानी दिल्ली में काम करना शुरू करने वाले हिमासुद्दीन ने कहा कि पहले हवा दिल्ली में इतनी ख़राब नहीं थी.
"एक रिक्शा खींचने वाले के तौर पर मैं प्रदूषण में शायद ही योगदान देता हूं. हमारा परिवहन का एक साफ़ तरीका है. लेकिन ये विडंबना है कि हम ही ज़हरीले धुएं से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं."
वह चाहते हैं कि सरकार रिक्शा खींचने वालों की मदद करे.
उन्होंने कहा, "कम से कम वो हमें अस्थायी रहने की जगह दे सकती है. हम धीमी मौत मर रहे हैं और हमारी कोई ग़लती भी नहीं है. कोई भी हमारे बारे में परवाह नहीं करता है जैसे कि हमारा कोई अस्तित्व ही नहीं.
उनकी निराशा समझ आती है. राज्य और केंद्र सरकारें नियमित रूप से एक ही सलाह देती हैं कि स्मॉग के मौसम में घर के अंदर रहिए.
लेकिन दुर्भाग्य से यह दिल्ली के रिक्शा खींचने वालों के लिए कोई विकल्प नहीं है.
"मुझे लगता है कि भूख हमारे लिए प्रदूषण की तुलना में ज़्यादा बड़ी समस्या है और यही कारण है कि कोई भी परवाह नहीं करता है लेकिन हमें हर हाल में काम तो जारी रखना होगा."
ये कहने के बाद हिमासुद्दीन उस गहरे धुएं में ग़ायब हो जाते हैं.
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