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बिहार: सीट बंटवारे पर अमित शाह की मुश्किल क्या है
- Author, मनीष शांडिल्य
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी के लिए
26 अक्तूबर को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने दिल्ली में कहा था कि दो-तीन दिनों में बिहार में एनडीए के घटक दलों के बीच सीटों का बंटवारा हो जाएगा.
लेकिन दो दिन क्या, दो हफ्ते बीतने के बाद भी सीट बंटवारे का ऐलान नहीं हो पाया है.
इतना ही नहीं, केंद्रीय मंत्री और राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी (रालोसपा) के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने अमित शाह का सीट-बंटवारे का फॉर्मूला ठुकरा दिया है.
इससे पहले, 26 अक्टूबर को अमित शाह ने ऐलान किया था कि अगले साल होने वाले आम चुनाव में बिहार में जदयू और भाजपा बराबर सीटों पर चुनाव लड़ेंगी.
लेकिन इसी के साथ अमित शाह ने यह भी कहा था कि जब कुछ नए साथी (जदयू) जुड़े हैं तो निश्चित तौर पर गठबंधन के सभी पुराने दलों की सीटों में कुछ कमी आएगी.
लेकिन शुक्रवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उपेंद्र कुशवाहा ने साफ-साफ अमित शाह के फार्मूला को ठुकराते हुए कहा, "हमारी पार्टी का ग्रोथ 2014 के मुक़ाबले में आज ज़्यादा है. उस समय की तुलना में हमारी पार्टी की ताकत बढ़ी है. कितनी ताक़त बढ़ी है यह बहस का विषय हो सकता है लेकिन ताक़त बढ़ने से कोई इनकार नहीं कर सकता. बढ़ी ताक़त का आकलन करते हुए तीन से ज्यादा सीटें हमें मिलनी चाहिए."
दबाव बना रहे कुशवाहा?
2014 में भाजपा ने बिहार में उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी रालोसपा और केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा था.
तब गठबंधन में रालोसपा को तीन सीटें मिली थीं और उसने तीनों सीटों पर जीत दर्ज की थी.
वहीं जदयू राजद के साथ गठबंधन तोड़कर बीते साल जुलाई में एनडीए में शामिल हुआ था.
26 अक्तूबर के बाद से कुशवाहा तेजस्वी यादव से मुलाक़ात करके और मीडिया से बातचीत करते हुए और अपनी पार्टी की रैलियों में कई बार अमित शाह के फॉर्मूले पर अपनी नाराजगी सीधे या दबे तौर पर ज़ाहिर कर चुके हैं.
क्या इससे वे भाजपा पर दवाब बना रहे हैं?
इस सवाल पर बिहार भाजपा के प्रवक्ता प्रेमरंजन पटेल कहते हैं, "उपेन्द्र कुशवाहा को राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह जी से बात करनी चाहिए न कि उन्हें मीडिया में ऐसी बातें करनी चाहिए. ऐसी बातों से एनडीए को नुकसान हो सकता है. मीडिया में ऐसी बातें करने से महागठबंधन को एनडीए पर सवाल उठाने का एक मुद्दा मिल रहा है."
लोजपा भी तैयार नहीं
इधर शुक्रवार को ही केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने पटना में कहा कि एनडीए में सीट-बंटवारे पर बातचीत के लिए उनकी पार्टी ने संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष चिराग पासवान और लोजपा के प्रदेश अध्यक्ष पशुपति कुमार पारस को अधिकृत किया है.
वहीं बिहार सरकार में मंत्री पशुपति कुमार पारस भी हाल के दिनों में कई बार सीटों की कुर्बानी से इनकार करते हुए अमित शाह फॉर्मूले को नकार चुके हैं.
पारस यह मांग करते रहे हैं कि 2014 में पार्टी ने जितनी सीटों पर चुनाव लड़ा था, उतनी सीटें इस बार भी उन्हें मिलें.
2014 में लोजपा ने सात सीटों पर चुनाव लड़ा था और छह पर जीत दर्ज की थी.
नीतीश से दुखी कुशवाहा
सीट-बंटवारे के फॉर्मूले के बाद अब उपेन्द्र कुशवाहा नीतीश कुमार के एक कथित बयान से भी ख़ुद को आहत बता रहे हैं.
बीते शुक्रवार को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 'इंडिया टुडे' को दिए इंटरव्यू में उपेन्द्र कुशवाहा से जुड़े सवालों को नज़रअंदाज़ किया था.
इस दौरान उन्होंने यहां तक कह दिया कि ऐसे सवाल पूछकर इंटरव्यू का स्तर न गिराएं.
उपेन्द्र कुशवाहा इस पर सार्वजनिक रूप से नाराज़गी जता चुके हैं.
इतना ही नहीं इसके बहाने वह नीतीश सरकार के काम-काज पर भी सवाल खड़े कर चुके हैं.
शुक्रवार को फिर नीतीश के इंटरव्यू का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, "बिहार के मुख्यमंत्री ने जिस शब्द से मुझे संबोधित किया वह दुख का विषय है. मेरे लिए सवाल हुआ तो उन्होंने कहा कि निचले स्तर की बात हो गई. नीच शब्द का मेरे लिए इस्तेमाल किया गया. मुख्यमंत्री को अपना स्टेटमेंट वापस लेना चाहिए और अमित शाह को इस दिशा में पहल करनी चाहिए."
कुशवाहा की इस मांग पर जदयू प्रवक्ता सुहेली मेहता कहती हैं, "नीतीश कुमार जी ने इंटरव्यू में जो कहा उसका अर्थ न निकाल कर अनर्थ निकाला जा रहा है और इसका दुष्प्रचार करके भ्रम फैलाया जा रहा है. इसलिए दुख जताना ही निराधार है. जिस नीच शब्द का ज़िक्र किया जा रहा है उन्होंने इसका उपयोग नहीं किया था. कहीं का असंतोष कहीं से निकालना ग़लत बात है."
'उपेन्द्र मान जाने के लिए रूठे हैं'
लेकिन क्या उपेन्द्र कुशवाहा सिर्फ दबाव बना रहे हैं या मनचाही सीटें न मिलने पर वह एनडीए से अलग भी हो सकते हैं?
इन सवालों पर वरिष्ठ पत्रकार अरुण अशेष इसके आसार कम मानते हैं.
वह कहते हैं, "2005 में जब एनडीए ने लालू यादव को हराकर चुनाव जीता था तो कुशवाहा बिहार में नेता प्रतिपक्ष थे लेकिन मुख्यमंत्री बने नीतीश कुमार. जबकि बिहार में जगन्नाथ मिश्र, कर्पूरी ठाकुर से लालू यादव तक ऐसे नेताओं के उदहारण हैं जो नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद मुख्यमंत्री बने. ऐसे में उपेन्द्र कुशवाहा की मुख्यमंत्री बनने की ख्वाहिश भी है और उन्हें अब तक इस पद पर न पहुँच पाने की टीस भी है. कुशवाहा की यही ख्वाहिश और टीस रह-रह कर उनके बयानों के जरिये प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से सामने आती रहती है."
"वो सीट बंटवारे के साथ-साथ इस ख़्वाहिश को पूरा करने के मौके भी तलाशते रहते हैं. लेकिन उनके सामने पास एक मात्र दूसरा विकल्प राजद की अगुवाई वाले महागठबंधन का है. एक तरफ उनके पास महागठबंधन के रूप में नया तो दूसरी तरफ एनडीए का जांचा परखा पुराना गठबंधन है. अगर उन्हें महागठबंधन पर ज़्यादा भरोसा होता तो वो एनडीए से बाहर निकल चुके होते. उपेन्द्र कुशवाहा रूठे ज़रूर हैं लेकिन वो मान जाने के लिए रूठे हैं.
हालांकि यह पुख़्ता तौर पर नहीं कहा जा सकता कि एनडीए में सीट बंटवारे में हो रही देरी का एकमात्र कारण कुशवाहा ही हैं.
जानकार इस आसार से भी इनकार नहीं करते कि हो सकता है कि जदयू-भाजपा के बीच भी सीटों पर सहमति नहीं बन पाई हो.
लेकिन भाजपा और कुशवाहा की पार्टी रालोसपा को पांच साल बाद एक-दूसरे की कितनी ज़रूरत रह गई है?
बिहार की राजनीति के हालिया इतिहास के आईने में अरुण अशेष बताते हैं, "कांग्रेस के सुनहरे दौर को छोड़ कोई भी दल बिहार में अकेले दम पर अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाया है और सबने अलग-अलग चुनाव लड़कर भी देख लिया है. दल जब अकेले चुनाव लड़ते हैं तो उन्हें सभी सीटों पर मज़बूत उम्मीदवार खोजने में भी कठिनाई पेश आती है. इसलिए एनडीए ही नहीं महागठबंधन में भी शामिल सभी दलों को एक-दूसरे के सहारे की जरुरत है."
अरुण के मुताबिक, "भाजपा के सामने यह चुनौती ज़रूर है कि वह 2014 का प्रदर्शन दोहराने के लिए अपने सभी नए-पुराने सहयोगियों को साथ लेकर चले. लेकिन सीट बंटवारे को लेकर एनडीए किसी जल्दबाज़ी में नहीं है और इसके सभी दल मुनासिब समझौते का इंतज़ार कर रहे हैं. जदयू-भाजपा की टीम अपनी-अपनी सीटों की पहचान करने में जुटी है और इसमें कोई परेशानी नहीं आएगी."
अरुण कहते हैं कि एनडीए के पास समय भी है क्योंकि बिहार में महागठबंधन ने भी अब तक सीट बंटवारे की घोषणा नहीं की है.
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