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ग्राउंड रिपोर्टः महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त गांवों में कैसे हैं हालात?
- Author, राहुल रणसुबे और श्रीकांत बंगाले
- पदनाम, बीबीसी मराठी संवाददाता
''मुझे किसी दूसरी जगह जाना होगा... शायद नारायणगांव या कोई और जगह. लेकिन अब जीवन चलाने के लिए यह अपना गांव तो छोड़ना ही होगा.''
सूखे से परेशान बहिनाबई ताप्से अपने गांव को छोड़ने के बारे में सोचने लगी हैं.
65 साल की बहिनाबई हिंगोली ज़िले के सातम्बा गांव की निवासी हैं. सातम्बा गांव में अधिकतर परिवार किसान हैं और ये एक मौसम में दो बार बीज बोने की प्रक्रिया पूरी करते हैं.
अगर आप अक्तूबर महीने में किसी गांव में जाएंगे तो शायद ही कोई आदमी घर पर मिले. दरअसल, इस मौसम में अधिकतर लोग अपने खेतों में होते हैं. लेकिन सातम्बा गांव का नज़ारा इसके उलट है.
यहां के ज़्यादातर लोग अपने-अपने घरों पर ही मौजूद थे. अपने घर के दालान पर बैठे ये ग्रामीण सूखे के बिगड़ते हालात से परेशान थे.
गांव के मुख्य चौक पर पहुंचकर हमने वहां कुछ लोगों से बात की.
बहिनाबई ने हमसे कहा, ''अगर आप सूखे की असली तस्वीर देखना चाहते हैं तो मेरे खेत में चलकर देखिए. मैं दिखाऊंगी असली सूखा क्या होता है.''
हम बहिनाबई के साथ उनके खेत की तरफ जाने लगे. रास्ते में हम खेतीबाड़ी के बारे में बातें करते रहे.
'क्या अब तीसरी बार बुआई करें?'
"हमारे पास पांच एकड़ ज़मीन है. हम यहां सोयाबीन और तूर की दाल उगाते हैं. पहले हमने सोचा की बारिश होगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इसके बाद हमने दोबारा बुआई के बारे में सोचा. इसके लिए हमने बैंक से लोन लिया. फिर हमने 15 दिन तक बारिश होने का इंतज़ार किया लेकिन ये इंतज़ार भी बेकार गया. अब हमारे पास कुछ भी नहीं है. हमारी फसल बर्बाद हो चुकी है.''
जब बहिनाबाई हमें यह सब बता रही थीं, उस दौरान मेरी नज़रें उनके खेतों को भी निहार रही थीं. मैंने देखा कि उनकी सोयाबीन की फ़सल पूरी तरह सूख चुकी है.
बहिनाबाई के पति विट्ठल ताप्से ने बैंक से 80 हज़ार रुपए का कर्ज़ लिया है. सूखे के चलते बहिनाबाई और विट्ठल ताप्से को बैंक का कर्ज़ चुकाने की चिंता सता रही है.
बहिनाबाई अपने आने वाले दिनों की योजनाओं के बारे में सोचने लगीं हैं. वो कहती हैं, ''यहां तो सूखा पड़ा है. हमें पेट भरने के लिए कुछ तो चाहिए. हमें किसी दूसरी जगह जाना पड़ेगा.''
बहिनाबाई की ख़रीफ़ फ़सल बर्बाद हुई थी. हमने उनसे पूछा कि वो रबी की फ़सलों के बारे में क्या सोच रही हैं.
इसके जवाब में उन्होंने कहा, ''हम रबी फ़सलों के बारे में कैसे सोच सकते हैं. हम पहले ही एक मौसम में दो बार बुआई कर चुके हैं और एक बार भी फसल काट नहीं पाए, अब तीसरी बार फसल बोने के बारे में कैसे सोचें.''
बहिनाबाई के परिवार में 6 सदस्य हैं और सभी खेती पर ही निर्भर हैं. उनके खेत में कोई कुआं नहीं है और फसल को पानी देने का कोई दूसरा ज़रिया भी नहीं है. उनकी खेती पूरी तरह से बारिश के पानी पर ही निर्भर है.
'काम खोजने मुंबई या पुणे जाना होगा'
जिस वक़्त हम बहिनाबाई के खेत देख रहे थे. उस समय हमारे साथ गांव के एक और किसान धनजी घ्यार भी मौजूद थे.
धनजी अपनी व्यथा सुनाते हैं, ''हमारे पास पांच एकड़ ज़मीन है. इस बार बारिश ना होने की वजह से हम कुछ भी नहीं बो सके. हमने कर्ज़ लेकर दो बार बीज और खाद खरीदा और बोया लेकिन कुछ भी हासिल नहीं हुआ.''
धनजी बुज़ुर्ग हैं और इसलिए गांव छोड़कर नहीं जाना चाहते उनके पास एक ही विकल्प है, बारिश का इंतज़ार.
लेकिन कुछ जवान किसान जैसे कि विट्ठल घ्यार अब गांव छोड़ने के बारे में सोचने लगे हैं.
सूखे का विट्ठल पर कैसा असर पड़ा, इस बारे में वे बताते हैं, ''हमने दो बार बीज बोया लेकिन कुछ नहीं मिला. हमें लगा कि रबी के मौसम में शायद बारिश होगी लेकिन बारिश नहीं हुई. अब हम क्या कर सकते हैं. हमें गांव छोड़कर काम की तलाश में पुणे या मुंबई जाना ही होगा. हम पहले से ही क़र्ज़ के बोझ से जूझ रहे हैं और अब ज़्यादा क़र्ज़ नहीं ले सकते. हम कैसे जिएंगे और अपने बच्चों को कैसे पढ़ाएंगे. यही सवाल दिन-रात दिमाग में चलते रहते हैं.''
सातम्बा गांव हिंगोली से 12 किलोमीटर दूर है और इसकी आबादी 1200 है. गांव से लगी सड़क पर एक बोरवेल है. हमने उसके नल को खोला तो उसमें से पानी आने लगा.
हमने वहां आसपास खेल रहे बच्चों से पूछा कि क्या इस बोरवेल से अक्सर पानी आता है. उन्होंने हां में जवाब दिया और कहा कि उनके पास पीने के लिए पानी है.
सूखाग्रस्त तहसीलें
12 अक्तूबर को राज्य सरकार ने एक अधिसूचना जारी की थी जिसका शीर्षक था, 'वो ज़िले और तहसील जहां दूसरी बार सूखे की मार पड़ी है.'
इस अधिसूचना में उन तहसीलों के नाम थे जहां गंभीर और मध्यम दर्जे का सूखा पड़ने की संभावना है. इस सूची में 32 ज़िलों के 172 तहसीलों के नाम शामिल हैं. इनमें से 112 तहसीलों में सूखे के हालात गंभीर स्थिति में हैं और 60 तहसीलों में मध्यम दर्जे का सूखा है.
इस अधिसूचना में साफ़ है कि जिन ज़िलों में सूखे के हालात गंभीर हैं वहां के ज़िलाधिकारियों को प्रभावित इलाकों में पहुंचकर खेतों का तुरंत मुआएना करना होगा.
इस सूची में हिंगोली ज़िले के भी कुछ तहसीलों को गंभीर सूखे की चपेट में शामिल किया गया है.
हिंगोली के ज़िलाधिकारी अनिल भंडारी इस विषय में कहते हैं, ''हिंगोली ज़िले से हिंगोली, कालमनुरी और सेनगांव तहसील को इस सूची में शामिल किया गया है. हमने इन तहसीलों का दौरा किया है और वहां से रिपोर्ट बनाकर राज्य सरकार को भी भेज दी है. अब राज्य सरकार इस रिपोर्ट को केंद्र के पास भेजेगी और इसके बाद सूखाग्रस्त तहसीलों की अंतिम सूची निकाली जाएगी."
बिना रिपोर्ट के कैसे फ़ैसला लें?
आख़िर कौन से ज़िले या इलाक़े सूखाग्रस्त हैं, इसका फ़ैसला कब तक होगा. इस बारे में हमने महाराष्ट्र के कृषि मंत्री सदाभाऊ खोत से बात की.
उन्होंने कहा,''कुछ ही दिनों में सभी ज़िलाधिकारियों से हमें रिपोर्ट मिल जाएगी उसके बाद ही अंतिम सूची बनेगी. एक बार यह अंतिम सूची बन जाए तब हम उन तहसीलों को अतिरिक्त फ़ंड मुहैया करवा देंगे.''
सूखे से लड़ने के लिए सरकार की तैयारियों के बारे में सदाभाऊ ने कहा, ''जिन गांवों में पानी की कमी हो रही है वहां पानी के टैंकर भिजवाने के आदेश दिए जा चुके हैं. इन गांवों में रहने वाले लोगों को रोज़गार गारंटी योजना के तहत काम दिया जा रहा है, छात्रों को स्कूल फ़ीस में छूट दी जा रही है.''
इन तमाम तैयारियों के बीच सवाल यह भी उठ रहा है कि आख़िर सरकार पानी बचाने के लिए कोई सटीक योजना क्यों नहीं अपनाती और हर बार जब महाराष्ट्र सूखे की चपेट में आ जाता है उसके बाद ही सरकार की आंख क्यों खुलती है.
इसके जवाब में सदाभाऊ कहते हैं, ''बारिश कम हुई है. कुछ तहसीलों में तो औसत से 25 प्रतिशत तक कम बारिश हुई और कुछ में तो 50 प्रतिशत तक कम बारिश दर्ज हुई. इसलिए तैयारियां पहले ना करने के आरोप बिलकुल ग़लत हैं.''
सदाभाऊ का कहना है कि राज्य के लगभग आधी तहसीलें सूखे की चपेट में हैं.
'जलयुक्त शिवार'
सातम्बा गांव के लोग अपना गांव छोड़कर दूसरी जगह जाने की बात कह रहे हैं. बीबीसी ने पलायन और कृषि मामलों के विशेषज्ञ एच.एम. देसर्दा से संपर्क किया पूछा कि खेती और पलायन में कितना संबंध है.
उन्होंने कहा, ''किसानों को खरीफ़ की फ़सल में नुकसान हुआ है. लोग गांव छोड़ने के बारे में सोच रहे हैं क्योंकि गांव में पानी नहीं है. गन्ना कटाई से जुड़े मज़दूरों का पलायन तो हमेशा से ही मुद्दा रहा है. लेकिन अब पानी की कमी की वजह से किसान भी गांव से बाहर जा रहे हैं. इस वजह से शहरों में लोगों का भार और बढ़ेगा जिससे उनके बीच संघर्ष भी बढ़ जाएगा.''
देसर्दा सरकार की जलयुक्त शिवार योजना पर भी सवाल उठाते हैं,
देसर्दा कहते हैं, ''मराठवाड़ा में पानी की कमी आने वाले आठ महीनों तक रहेगी. अगर सरकार उपलब्ध पानी को सही तरीके से इस्तेमाल करती तो शायद हालात ऐसे ना होते. सरकार 1600 गांवों में जलयुक्त शिवार योजना (खेती के लिए पानी बचाने की योजना) चलाने वाली थी. सरकार का दावा है कि इसमें से 90 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है. सवाल यही है कि अगर यह काम पूरा हो चुका है तो पानी की इतनी कमी क्यों है."
फ़िलहाल इन हालात को संभालने के लिए क्या तुरंत कदम उठाए जाएं. इस बारे में देसर्दा कहते हैं, ''सबसे पहले जानवरों के चारे का इंतज़ाम करना चाहिए, साथ में गांव के लोगों को रोज़गार गारंटी योजना के तहत काम देना चाहिए और उस फ़सल को उगाने से बचना चाहिए जिसमें ज़्यादा पानी इस्तेमाल होता है.''
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