मदन लाल खुराना: जिनके एक इशारे पर थम जाया करती थी दिल्ली

    • Author, विवेक शुक्ला
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

मदन लाल खुराना की मौत से भाजपा ने एक स्ट्रीट फ़ाइटर खो दिया है. वे सच में ज़मीनी कार्यकर्ता थे.

उन्होंने राजधानी में अटल बिहारी वाजपेयी और बलराज मधोक जैसे नेताओं की बाराटूटी चौक, पहाड़गंज, करोल बाग वगैरह में होने वाली चुनावी सभाओं में दरियां बिछाकर अपने सियासी सफ़र का आगाज़ किया था.

वे पहाड़गंज के लड्डूघाटी इलाके के नगर निगम स्कूल में अध्यापक भी थे. वे स्कूल के बाद संघ और जनसंघ के कामों में लग जाते थे.

मदन लाल खुराना की संगठन की क्षमताओं का पहली बार बड़े स्तर पर पता चला 1977 में जब देश से 19 महीनों के बाद इमरजेंसी हटा ली गई थी.

जेलों में बंद विपक्ष के नेता छूट गए थे और लोकसभा चुनाव की घोषणा हो चुकी थी. खुराना भी जेल से रिहा होकर आए थे.

वो जनता पार्टी का दौर था. खुराना सदर बाज़ार से चुनाव लड़े और जीते.

वे ही उन दिनों जनता पार्टी के नेताओं की रामलीला मैदान से लेकर बोट क्लब में होने वाली बड़ी सभाओं की व्यवस्था करते. हर सभा में ग़ज़ब की जन भागेदारी रहती. वे घर-घर जाकर लोगों को बड़ी सभाओं में शामिल होने का आह्वान करते.

दिल्ली की पंजाबी और वैश्य बिरादरी में उनकी कमाल की पकड़ थी. ये ही दोनों वर्ग जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी के सबसे बड़े समर्थक थे.

दर्जनों बार करवाया दिल्ली बंद

मदन लाल खुराना को दर्जनों बार दिल्ली बंद करवाने का भी श्रेय जाता है.

पंजाब में चरमपंथ के दौर में जब भी कोई बड़ी घटना होती तो वे दिल्ली बंद का आह्वान कर देते. मजाल है कि उनका बंद कभी असफल रहा हो.

वो उनके संगठन पर पकड़ का ही कमाल था. उनके बंद के आह्वान के चलते दिल्ली में ज़िंदगी थम जाती थी, बाज़ार बंद हो जाते.

दिल्ली के कारोबारी समाज में पंजाबी और बनिये ही मुख्य रूप से रहे हैं और ये मदन लाल खुराना की मुट्ठी में रहते थे.

खुराना की एक आवाज़ पर वे अपनी दूकानें-बाज़ार बंद कर देते थे.

आप कह सकते हैं कि पंजाब के उस ख़ूनी दौर ने खुराना को अखिल भारतीय स्तर पर पहचान दिलवाई थी.

निर्विवाद रूप से दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी को स्थापित करने में विजय कुमार मल्होत्रा, केदार नाथ साहनी और मदन लाल खुराना की निर्णायक भूमिका रही.

वे मल्होत्रा और साहनी की अपेक्षा अधिक जुझारू नेता थे. वे दिन-रात दिवारों पर पोस्टर लगाने वाले कार्यकर्ता थे.

जब किया सिखों का बचाव

जहां मदन लाल खुराना पंजाब में हिन्दुओं के मारे जाने के विरोध में बंद का आयोजित करते थे, वहीं उन्होंने दिल्ली में 1984 में इंदिरा गांधी की नृशंस हत्या के बाद भड़के सिख विरोधी दंगों के दौरान अपने गढ़ को दंगाइयों से दूर रखा.

करोल बाग से लेकर राजोरी गार्डन तक कहीं कोई दंगे नहीं हुए. जब दंगे भड़के हुए थे तो वे एक नवंबर, 1984 को सुबह अटल बिहारी वाजपेयी से मिलने उनके 6, रायसीना रोड के आवास पर गए.

वे और अटल बिहारी वाजपेयी बंगले के बाहर खड़े होकर किसी मुद्दे पर बात कर रहे थे.

तब दोनों ने देखा कि प्रेस क्लब से सटे टैक्सी स्टैंड के सिख ड्राइवरों को मारने के लिए कुछ गुंडे खड़े हैं. वे उन ड्राइवरों से लड़ रहे हैं.

बस, तब ही दोनों टैक्सी स्टैंड पर पहुंच गए. उनके वहां पर पहुंचते ही मौत के सौदागर चलते बने. उस भीड़ ने अटल जी को तुरंत पहचान लिया था.

दोनों ने भीड़ को खरी-खरी सुनाई भी. खुराना जी उसी शाम को अटल बिहारी वापपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, विजय कुमार मल्होत्रा वगैरह के साथ गृह मंत्री पी.वी. नरसिंह राव से मिले.

उनसे आग्रह किया कि वे दिल्ली को बर्बाद होने से बचा लें. उस भयानक दौर में वे दिन-रात दिल्ली के चप्पे-चप्पे में जाकर दंगों में तबाह हुए सिखों के पुनर्वास की व्यवस्था कर रहे थे.

दिल्ली को दी मेट्रो की सौगात

मदन लाल खुराना दिल्ली की बढ़ती आबादी और चरमराती यातायात व्यवस्था के कारण बेहद चिंतित रहते थे.

वे मानते थे कि इन दोनों मसलों का हल जरूरी है अगर इस शहर को बचाना है. वे यातायात समस्या के हल के लिए दिल्ली में मेट्रो रेल को ही विकल्प के रूप में देखते थे.

निश्चित रूप से मदन लाल खुराना और कांग्रेस के दिग्गज नेता और मुख्य कार्यकारी पार्षद रहे जग प्रवेश चंद्रा सबसे पहले यहां मेट्रो रेल चलाने की मांग करने वालों में थे.

वे कनॉट प्लेस के वोल्गा रेस्तरां में पत्रकारों के साथ बातचीत के दौरान यहां मेट्रो रेल लाने की बात जरूर छेड़ देते थे.

दिल्ली का 1993 में मुख्यमंत्री बनते ही मदन लाल खुराना ने विशेषज्ञों की एक कमेटी बनाई जिसे दिल्ली में मेट्रो रेल चलाने की संभावनाओं को पता लगाना था.

हालांकि तब मीडिया और विपक्ष ने उनकी खिंचाई भी की थी कि वे विशेषज्ञों की कमेटी बनाकर जनता के पैसे को बर्बाद कर रहे हैं.

बहरहाल, हवाला केस में नाम आने के बाद मदन लाल खुराना को 1996 में अपना पद छोड़ना पड़ा.

उसके बाद वे ख़ासे निराश हो गए थे. वे दावा करते रहे थे कि उन पर लगे आरोप ग़लत हैं. पर नैतिकता के आधार पर उन्हें पद छोड़ना पड़ा. ये बात माननी होगी कि फिर राजधानी में भाजपा सरकार नहीं बना सकी.

(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है)

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