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'बिहार के लाला' का दिल्ली बीजेपी में बोलबाला
मनोज तिवारी को दिल्ली प्रदेश भाजपा का प्रमुख बनाया जाना काफ़ी दिलचस्प है.
वे पैदा बिहार में हुए और उनकी पढ़ाई-लिखाई उत्तर प्रदेश में हुई, पूर्वोत्तर दिल्ली से सांसद ज़रूर हैं.
तिवारी दिल्ली प्रदेश भाजपा के पहले अध्यक्ष हैं जिनकी जड़ें दिल्ली में नहीं हैं, उनसे पहले सतीश उपाध्याय तक सब प्रांतीय अध्यक्षों का दिल्ली की स्थानीय राजनीति से लंबा जुड़ाव रहा था.
दिल्ली की राजनीति में परंपरागत तौर पर भारत विभाजन के बाद आए पंजाबियों, बाहरी दिल्ली में जाटों और स्थानीय व्यापारी तबक़े का दबदबा रहा है.
लंबे समय तक केदारनाथ साहनी, ओपी कोहली, मदनलाल खुराना, विजय मल्होत्रा, विजय गोयल और साहिब सिंह वर्मा जैसे नेताओं का सिक्का चलता था जो इन्हीं तबकों से आते थे.
1990 के दशक के बाद से राजधानी के कई इलाक़े ऐसे हो गए जहाँ बिहार और उत्तर प्रदेश से आए लोगों की तादाद इतनी अधिक हो गई कि सभी पार्टियों को ऐसे लोगों को आगे करना पड़ा जिन्हें आम बोलचाल की भाषा में पूरबिया कहा जाता है.
यमुना किनारे हर साल बढ़ती छठ मनाने वालों की भीड़ राजनीतिक दलों को ये दिखाने लगी कि पूर्वी और पूर्वोत्तर दिल्ली में अगर जीतना है तो पंजाबी उम्मीदवार से बात नहीं बनेगी.
ये किसी एक पार्टी की बात नहीं थी, कांग्रेस ने उत्तरप्रदेश के प्रतापगढ़ में पले-बढ़े लालबिहारी तिवारी को मंत्री बनाकर ये संकेत 90 के दशक में ही दे दिया था कि दिल्ली की सियासत में पूरबियों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.
फ़िल्म स्टार होने और करिश्माई नेता होने की वजह से शायद उनका काम कुछ आसान हो जाए, उन्हें पूरबिया मतदाताओं का समर्थन भी मिल जाएगा लेकिन पार्टी के ख़ालिस दिल्लीवाले कार्यकर्ताओं और छोटे नेताओं को एकजुट रखना उनके लिए बड़ी चुनौती होगी.
इससे पहले मनोज तिवारी समाजवादी पार्टी के टिकट पर गोरखपुर से चुनाव लड़कर हार चुके हैं, उन्हें योगी आदित्यनाथ के ख़िलाफ़ लड़ाया गया था.
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