पाँचवीं पास धोलकिया बोनस में देते हैं कार और फ्लैट

सावजी ढोलकिया

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    • Author, रवि परमार
    • पदनाम, संवाददाता, बीबीसी गुजराती

आठ हज़ार करोड़ रुपए से अधिक के हीरों का कारोबार संभालने वाले सवजी धोलकिया अपने कर्मचारियों में काफ़ी लोकप्रिय हैं.

गुजरात के कारोबारी धोलकिया हर दिवाली अपने कर्मचारियों को बोनस के रूप में कार, घर, गहने या अन्य क़ीमती सामान तोहफ़े के रूप में देते हैं.

सवजी धोलकिया हरिकृष्णा एक्सपोर्ट प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के चेयरमैन हैं और इस साल भी वे दिवाली पर अपने 600 कर्मचारियों को कार बोनस में गिफ्ट कर रहे हैं.

नरेंद्र मोदी

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इसके लिए गुरुवार को सूरत में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया जहां नरेंद्र मोदी भी कार्यक्रम में शामिल हुए और उन्होंने कुछ कर्मचारियों को गाड़ियों की चाभी सौंपी.

धोलकिया ने पहली बार अपने कर्मचारी को कार दिवाली बोनस के रूप में दी थी. तभी से ये सिलसिला हर साल चलता आ रहा है.

पिछले महीने ही धोलकिया ने हरिकृष्णा एक्सपोर्ट कंपनी में काम करते हुए 25 साल पूरा करने वाले तीन कर्मचारियों को मर्सिडिज कार गिफ्ट की थी.

कार

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इमेज कैप्शन, कर्मचारियों को 25 साल होने पर मर्सिडीज गिफ्ट की गईं थीं

इतने महंगे गिफ्ट देते क्यों हैं?

इस सवाल का जवाब देते हुए सवजी धोलकिया ने बीबीसी को बताया कि ये एक तरह की मोटिवेशनल स्कीम है यानी ऐसा करके वे अपने कर्मचारियों को प्रोत्साहित करते हैं ताकि उनका मन कंपनी में लगा रहे.

लेकिन सवाल ये उठता है कि ये गिफ्ट दिए किन्हें जाते हैं और कर्मचारियों की छंटनी किस आधार पर होती है.

इस पर धोलकिया कहते हैं, ''ये बहुत आसान है, जिन कर्मचारियों के पास घर नहीं होता उन्हें घर, जिनके पास घर होता है उन्हें गाड़ी और जिनके पास दोनों होते हैं उन्हें गहने या दूसरे कीमती सामान दिए जाते हैं. लेकिन ये हर एक कर्मचारी की परफॉर्मेंस पर आधारित होता है.''

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धोलकिया ने बताया कि प्रत्येक कर्मचारी को एक टारगेट दिया जाता है, जो कर्मचारी टारगेट पूरा करता है उसे हम प्रोत्साहित करते हैं. इसके अलावा हम कर्मचारियों को फिक्स डिपॉज़िट से लेकर लाइफ़ इंश्योरेंस जैसी सुविधाएं भी देते हैं. ताकि भविष्य में उनके परिवार को भी लाभ मिल सके.

कर्मचारियों को इतनी महंगी गाडियां देने से कंपनी को क्या फ़ायदा, इसका जवाब वडोदरा (गुजरात) की महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय के सोशल वर्क की प्रोफेसर सुनिता नांबियार बताती हैं कि कर्मचारियों को ऐसे गिफ्ट देने से वे कंपनी के प्रति वफ़ादार रहते हैं. और ऐसा करने से नये कर्मचारियों की भर्ती के पीछे होने वाला खर्च और उनके प्रशिक्षण का ख़र्च भी नहीं आता क्योंकि पुराने कर्मचारी जुड़े रहते हैं.

इसका साथ ही वे ये भी बताती हैं कि यदि एक कर्मचारी को गिफ्ट मिलता है तो ये देखकर अन्य कर्मचारियों को भी कड़ी मेहनत करने की प्रेरणा मिलती है और इसमें कंपनी का ही मुनाफ़ा है.

कार्यक्रम की तस्वीर

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इसी विश्वविद्यालय के एक अन्य प्रोफेसर जगदीश सोलंकी ने बताया कि किसी भी व्यक्ति का पहला उद्देश्य पैसा कमाने का होता है. सफल होने के बाद उसे प्रसिद्धि चाहिए होती है और कई बार इसीलिए भी वे अपनी छवि सुधारने के लिए इस तरह की कोशिश करते हैं.

गिफ्ट के लिए पैसा कहां से आता है इस के जवाब में धोलकिया कहते हैं कि ये पैसा कहीं और से नहीं बल्कि खुद कर्मचारियों का ही होता है.

सवजी धोलकिया कहते हैं, ''जो कर्मचारी कंपनी को जितना फ़ायदा करवाता है उसकी 10 प्रतिशत रकम हम अलग रखते हैं. इस बारे में उनको भी पता नहीं होता लेकिन हमारे पास सभी का डाटा होता है. इसके बाद इसी रकम में से गिफ्ट ख़रीद कर उन्हें ही दे दिया जाता है. ये एक कंपनी की स्कीम जैसा है, जिसमें कर्मचारी और कंपनी दोनों को मुनाफ़ा होता है.''

हरि कृष्णा डायमंड में सात हजार कर्मचारी हैं. इस कंपनी का वार्षिक टर्नओवर आठ हजार करोड़ है और कंपनी 80 देशों में हीरे एक्सपोर्ट करती है.

2014 में दी गई कारें

अमरीका, कनाडा, पेरू, मेक्सिको, बेल्जियम, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), हांगकांग, चीन जैसे देशों में उनकी सहायक कंपनियां हैं.

2015 में उनकी कंपनी ने अपने कर्मचारियों को दिवाली बोनस के तौर पर 491 कारें और 200 फ्लैट बांटे थे. 2014 में भी कंपनी ने कर्मचारियों के बीच इन्सेंटिव के तौर पर 50 करोड़ रुपये बांटे थे.

और उससे पहले साल 2013 में भी अपने 1200 से ज़्यादा कर्मचारियों को 207 फ़्लैट, 424 कारें और गहने दीपावली के उपहार के तौर पर बांटे थे.

पांचवीं पास हैं सवजी

धोलकिया गुजरात के अमरेली ज़िले के दूधाला गांव से हैं. उनका जन्म 12 अप्रैल 1962 में एक किसान परिवार में हुआ था.

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संघर्ष से लेकर सफलता की बात करते हुए वे बताते हैं कि उनका शुरू से पढ़ाई में मन नहीं लगता था. धोलकिया बताते हैं, "पांचवीं कक्षा तक पढ़ने के बाद मैंने पढ़ाई छोड़ दी. साढ़े बारह साल की आयु में ही मैं सूरत आ गया था. मैंने सूरत की एक कंपनी में काम करना शुरू किया. मेहनत और काम के प्रति निष्ठा के कारण आज मैं इस स्तर पर हूं कि हजारों लोग मेरे साथ जुड़ चुके हैं."

वे कहते हैं कि हम चार भाई हैं और सबने मिलकर 1992 में इस कंपनी को खरीदा, जो आज दुनियाभर में नाम कमा रही है.

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