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अमृतसर हादसा : ‘लोग रावण जलाते हैं, हमारा घर जल गया’
- Author, सरबजीत सिंह धालीवाल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, अमृतसर से
अमृतसर के जोड़ा फाटक इलाके से कुछ ही दूर भारी आबादी वाला कृष्णा नगर है. दशहरे वाले दिन दर्दनाक हादसे में इसी इलाके के ज़्यादातर लोगों की मौत हुई है. इस इलाके के हर गली-नुक्कड़ पर हादसे की ही बातें चल रही थीं.
तंग गलियों से होते हुए हम एक छोटे से मकान के आगे रुके जो कि हादसे में मारे गए नरेंद्र पाल सिंह का घर है. घर में उनकी पत्नी दर्शना मिलीं.
घर के हालात से पता चल रहा था कि नरेंद्रपाल दिहाड़ी करके अपने परिवार का पेट पालते थे. एक बिस्तर के पास टूटी हुई अलमारी थी जिसमें बर्तन रखे थे. रसोई में गैस चूल्हे की जगह हीटर था जिसे देखकर लगा कि खाना इसी पर बनता था.
इतने में एक अंधेरे कमरे से 45 साल की दर्शना बाहर आईं और पहले से ही हमारे साथ मौजूद अपनी बेटियों के साथ बैठ गईं.
बातचीत में दर्शना बताती हैं कि उनकी तीन बेटियां और एक बेटा है जिनकी शादी हो चुकी है.
दशहरे वाले दिन क्या हुआ उसका जवाब उन्होंने तल्ख़ी से दिया.
'हमारा तो घर ही जल गया'
दर्शना कहती हैं, "हमारा कैसा दशहरा, लोग रावण जलाते हैं, हमारा अपना घर ही जला गया. जब भी दशहरा आएगा, ये हादसा याद आ जाएगा."
दर्शना के मुताबिक़ जब रेल लोगों को कुचलते हुए निकली तो मोहल्ले में हंगामा मच गया जिसके बाद उन्होंने अपने पति की तलाश शुरू की.
दर्शना ने बताया कि रेल फाटक के पास उन्हें अपने पति बेसुध हालत में मिले जिसके बाद उन्हें सिविल अस्पताल ले जाया गया जहां डॉक्टर ने उन्हें मृत घोषित कर दिया.
'बेटे की लाश उठानी पड़ेगी कभी सोचा नहीं था'
कृष्णा नगर की ही एक और गली में जब हम दाखिल हुए तो महिलाओं के रोने की आवाज़ ने हमारा ध्यान खींचा.
जब थोड़ा आगे जाकर देखा तो क़रीब 45 साल के अनिल कुमार नज़र आए जो मूल रूप से इलाहाबाद के रहने वाले हैं और पिछले 20 साल से अमृतसर में एक दुकान में नौकरी कर रहे हैं.
अनिल ने बताया कि वो किराए के मकान में रहते हैं और इकलौते बेटे आकाश के चले जाने के बाद बेटी ही उनका सहारा है. भरी आंखों से अनिल ने बताया कि आकाश की मां को इस घटना के बारे में उन्होंने बताया नहीं है.
उन्होंने कहा, "दशहरे वाले दिन दोपहर का खाना मैंने आकाश के साथ खाया था. शाम को 4 बजे के क़रीब वो अपने दोस्तों के साथ दशहरा देखने चला गया."
इसके बाद अनिल ने बताया कि रात 9 बजे के बाद उन्हें उस हादसे के बारे में पता चला तो वे सिविल अस्पताल पहुंचे जहां मृतक लोगों में आकाश का शव भी था.
"जिस बेटे ने बुढ़ापे में हमारी ज़िम्मेदारी उठानी थी, अब उसकी लाश उठानी पड़ेगी ये मैंने सपने में भी नहीं सोचा था."
'हादसा भुलाना मुश्किल है'
35 साल की सुमन का घर जोड़ा फाटक के बेहद क़रीब है और हादसे के वक्त वह दूसरी औरतों के साथ छत से दशहरे का आयोजन देख रही थीं.
बीबीसी की टीम जब उनके घर पहुंची तो वो छत पर खड़ी हादसे का वीडियो देख रही थीं, जो उनकी बेटी ने अपने मोबाइल में रिकॉर्ड किया था.
सुमन ने कहा कि उस हादसे के बाद जो मंज़र था वो इतना भयानक था कि बयां नहीं किया जा सकता.
सुमन ने बताया कि वो पिछले 20 साल से यहीं रह रही हैं और हर साल वहां ऐसे ही दशहरा मनाया जाता रहा है.
इतनी देर में छत पर दीप नाम की एक और महिला आ गईं. उन्होंने बताया कि सब उनकी आंखों के सामने हुआ. एक पल में खुशियां मातम में बदल गईं. हर तरफ़ चीखें ही सुनाई दे रही थीं.
दीप ने बताया कि उन्होंने अपने घर की चादरें लाशों को ढकने के लिए दी थीं. दीप बताती हैं कि '1947 के बंटवारें के दौरान हुए क़त्लेआम के बारे मे सुना था पर इस हादसे में कुछ वैसा ही मंज़र अपनी आंखों से देख लिया.
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