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बंगाल में दुर्गा पूजा का थीम, बदनाम सोनागाछी और चीन
- Author, प्रभाकर एम.
- पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए
"ओरे बाबा! सिनेमा आर टीवी सीरियले जेरकम देखे छिलाम ठीक सेरकम-ई लागछे..."
(अरे बाप रे! सिनेमा और टेलीविजन पर आने वाले धारावाहिकों में जैसा देखा था, हुबहू वैसा ही है)
ये कहने वाली महिला पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के एक ऐसे पूजा पंडाल तक जाने वाली सड़क के पास खड़ी थी, जिसे एशिया के सबसे बड़े रेडलाइट इलाक़े सोनागाछी की थीम पर बनाया गया है.
राज्य के सबसे बड़े त्योहार दुर्गा पूजा में बीते कुछ वर्षों से थीम-आधारित पूजा का प्रचलन तेज़ी से बढ़ा है.
इस बार भी कोई अपवाद नहीं है. साथ ही इन आयोजनों की भव्यता महंगाई की मार से भी बेअसर है.
कोलकाता और आसपास लगभग चार हज़ार पूजा पंडाल बने हैं. लेकिन इनमें से लगभग 75 पंडालों में रोज़ाना औसतन लाखों की भीड़ उमड़ रही है.
महानगर की आयोजन समितियों ने अबकी औसतन पांच लाख से लेकर 20 करोड़ तक का बजट रखा है.
साल दर साल महंगाई बढ़ने के बावजूद पूजा की चमक कम होने की बजाय बढ़ती ही जा रही है.
एक आयोजन समिति के सदस्य देवेश साहा बताते हैं, "ये बंगाल और बंगालियों का सबसे बड़ा त्योहार है. लोग पूरे साल बेसब्री से इसका इंतजार करते हैं."
"हर जाति और धर्म के लोग पूजा का समान रूप से आनंद लेते हैं. ऐसे में इसकी चमक और भव्यता तो बढ़नी ही है."
बंगाल में वेश्यालय की मिट्टी से दुर्गा प्रतिमा बनाने की परंपरा तो सदियों पुरानी है. लेकिन महानगर की एक आयोजन समिति अहिरिटोली युवक वृंद ने इस बार एशिया के सबसे बड़े रेडलाइट इलाके सोनागाछी और वहां रहने वाली यौनकर्मियों के जीवन और संघर्ष को अपनी थीम बनाया है.
पंडाल के पास पहुंचते ही लगता है कि सचमुच सोनागाछी की गलियों में पहुंच गए हों.
वैसे, सोनागाछी उस पंडाल से महज एक किलोमीटर की दूरी पर ही है.
कुछ तस्वीरों में समाज के प्रति इन यौनकर्मियों के योगदान को भी दर्शाया गया है.
इस आयोजन में अहिरिटोला युवकवृंद दुर्गापूजा समिति ने यौनकर्मियों के हितों के लिए काम करने वाले सबसे बड़े संगठन दुर्बार महिला समन्वय समिति की भी सहायता ली है.
पूजा समिति के कार्यकारी अध्यक्ष उत्तम साहा कहते हैं, "यौन कर्मी भी हमारे समाज के ही हिस्सा हैं. लेकिन हम कभी उनके जीवन या संघर्ष के बारे में जानने का प्रयास नहीं करते हैं."
"हमारे त्योहारों में भी उनको शामिल नहीं किया जाता. सामाजिक अवसरों पर भी उनको न तो इज़्ज़त बख्शी जाती है और न ही कोई जगह."
साहा कहते हैं, "हमारे प्रयास का मकसद सोनागाछी की इन यौनकर्मियों के संघर्ष को पहचान दिलाना है. हम यह संदेश देना चाहते हैं कि यह महिलाएं भी इसी समाज का हिस्सा हैं."
यौन कर्मियों के हितों में काम करने वाले संगठन दुर्बार महिला समन्वय समिति की सचिव काजल बोस कहती हैं, "पूजा समिति की ओर से चुनी गई इस थीम से हम बेहद खुश हैं."
"ये पहला मौका है जब किसी दुर्गा पूजा समिति यौनकर्मियों के संघर्ष और जीवन की कहानी आम लोगों के सामने रख रही है. इससे शायद यौनकर्मियों के प्रति समाज का नज़रिया बदलने में सहायता मिले."
इस परियोजना में हिस्सा लेने वाले एक कलाकार सोमेन सरकार बताते हैं कि भित्ति चित्रों को बनाने में चटख और उदास दोनों किस्म के रंगों का इस्तेमाल किया गया है.
"इन चित्रों के जरिए एक यौनकर्मी के जीवन के विभिन्न पहलुओं को दर्शाया गया है."
एक अन्य कलाकार मानस राय कहते हैं, "कोई भी महिला अपनी मर्जी से यौनकर्मी नहीं बनती. वह या तो मानव तस्करों के चंगुल में फंस कर इस पेशे में आती है या फिर घर-परिवार चलाने की मजबूरी में."
"वह एक मां की भूमिका भी निभाती है. ऐसे में उनकी अहमियत को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता."
बंगाल में दुर्गापूजा के दौरान पूरे साल के दौरान देश-विदेश में होने वाली प्रमुख घटनाओं को पंडालों की साज-सज्जा और बिजली की सजावट के जरिए चित्रण किया जाता है.
इस साल भी कोलकाता में कहीं पद्मावती और चित्तौड़ का क़िला सजीव हो उठा है तो कहीं शक्तिमान समेत दूसरे काल्पनिक चरित्र साकार हो गए हैं.
महानगर के पूर्वी छोर पर स्थित साल्टलेक के एक पूजा पंडाल में अबकी दर्शकों को चीन की झलक देखने को मिल रही है.
आयोजकों ने वहां अबकी यूनान की थीम पर पंडाल तैयार किया है.
कोलकाता में चीन के काउंसल जनरल मा झान्वू कहते हैं, "कोलकाता में चीन की झलक देखना एक खुशगवार अनुभव है."
अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए तमाम राजनीतिक दलों ने भी इस मौके को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है.
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तो इस मामले में सबको पीछे छोड़ दिया है. वह नवरात्र के पहले दिन से ही रोज़ाना औसतन दर्ज़न भर पंडालों का उद्घाटन करती रही हैं.
उनकी पार्टी ने लगभग तामम पंडालों के पास अपने स्टॉल लगाए हैं. वहां से राज्य सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों का प्रचार किया जा रहा है.
राज्य की सबसे प्रमुख विपक्षी पार्टी होने का दावा करने वाली बीजेपी ने भी अबकी विभिन्न इलाकों में कम से कम तीन हज़ार स्टॉल लगाए हैं.
इनके मुक़ाबले कांग्रेस और सीपीएम के स्टॉल कम हैं. जहां तक भीड़ की बात है उसने तो अभी से पिछले साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया है.
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