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क्या क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल मुश्किल हो जाएगा?
भारतीय रिज़र्व बैंक ने देश के भीतर पेमेंट सेवाएं उपलब्ध करवाने वाली तमाम विदेशी वित्तीय तकनीकी कंपनियों को भारतीयों से जुड़े डेटा भारत में ही रखने के लिए जो अंतिम तारीख दी थी, सोमवार को पूरी हो रही है.
अप्रैल में जारी आरबीआई की अधिसूचना में यह कहा गया था कि भारत में जो भी कंपनियां पेमेंट सेवाएं उपलब्ध करवा रही हैं, उन्हें सभी डेटा भारत में ही रखने होंगे.
इस डेटा में लेन-देन से जुड़ी सभी जानकारियां शामिल होंगी. इसके लिए आरबीआई ने 6 महीने का वक़्त दिया था.
दूसरी तरफ़ पेमेंट सेवाएं देने वाली कंपनियों का कहना है कि डेटा को एक ही देश में सीमित कर देने से जानकारियों के विस्तार में परेशानियां आ सकती हैं.
इकॉनमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट बताती है कि विश्व व्यापार संगठन में अमरीका के प्रतिनिधि डेनिस शेया ने इस बारे में कहा है कि वे डेटा को एक देश में सीमित नहीं करना चाहते यानी वे इसके लोकलाइज़ेशन पर रोक चाहते हैं, जिससे पेमेंट से जुड़ी जानकारियां आसानी से एक देश से दूसरे देश में जा सकें.
ऐसे में सवाल उठता है कि आख़िर ये कंपनियां हैं कौन?
इसी पर पढ़िए वरिष्ठ बिज़नेस पत्रकार आशुतोष सिन्हा का नज़रियाः
हम जो भी क्रेडिट कार्ड इस्तेमाल करते हैं उसमें आमतौर पर अमरीकन एक्सप्रेस, वीजा या मास्टरकार्ड की सेवाएं जुड़ी होती हैं.
अब चाहे वह क्रेडिट कार्ड किसी भी बैंक का हो, भारत में मुख्य तौर पर ये तीन कंपनियां अपनी सेवाएं प्रदान करती हैं. इन्हीं के ज़रिए पेमेंट सिस्टम उपलब्ध करवाया जाता है.
भारतीय कंपनी रूपे (RUPAY) इसी तर्ज पर शुरू हुई है हालांकि यह अभी अपने शुरुआती चरण में ही है, वह धीरे-धीरे वैश्विक बनेगी.
इसके अलावा ई-कॉमर्स या फ़ाइनेंशियल सेवाओं से जुड़ी कंपनियां ग्लोबल फ़ाइनेंशियल टेक्नॉलॉजी कंपनियां होती हैं.
आम ग्राहक को वैसे तो इन कंपनियों के साथ कोई सीधा लेना-देना नहीं होता, उसका सीधा संबंध उस बैंक से होता है जिसका क्रेडिट कार्ड वो इस्तेमाल कर रहा है. लेकिन जब वही ग्राहक किसी दुकान में जाता है ख़रीदारी करने और अपना कार्ड मशीन में स्वाइप करने के बाद अपना पिन डालता है तो उसके कार्ड की वैधानिकता जांची जाती है, फ़िलहाल यही सेवा भारत के पास नहीं है.
इसके लिए जिस भी कंपनी की सेवा हमारे क्रेडिट कार्ड के साथ जुड़ी है, उसका सर्वर दुनिया के किसी भी हिस्से में हो सकता है. हमारा डेटा वैधानिकता जांचने के लिए पहले उस सर्वर के पास पहुंचेगा और तब वह उसे आगे के चरणों में बढ़ाएगा.
यही वजह है कि किसी भी कार्ड में पिन डालने के बाद उसके ऑथेंटिकेशन में 10 से 12 सेकेंड का वक़्त लगता है.
अब आरबीआई के इस आदेश के बाद यह डेटा जो अपनी वैधानिकता जांचने के लिए दूसरे देश तक का सफ़र तय करता है उसे वहां नहीं जाना होगा, वह भारत में ही हो जाएगा.
दूसरे देश में डेटा जाना कितना ख़तरनाक
इस बात के दो पहलू हैं, पहला सुरक्षा और दूसरा उसकी उपलब्धता. आम बात यह हो रही है कि हमारे देश की जांच एजेंसी या पुलिस को जब कभी ज़रूरत हो वह इस डेटा को हासिल कर सके.
इसके लिए अगर हम सभी कंपनियों को यह सुनिश्चित करवा दें कि सारा डेटा सिर्फ़ देश के भीतर ही रखना होगा, उसके बाद भी देश की कोई जांच एजेंसी या पुलिस उस डेटा को सीधे प्राप्त नहीं कर सकती.
उसके लिए उन्हें कोर्ट से आदेश लेना होगा या कोई वॉरन्ट लेना होगा, इसके बाद भी एक प्रक्रिया के तहत ही वह उस डेटा को ले सकेंगे.
उदाहरण के लिए, 90 के दशक में जब मोबाइल सर्विस के लाइसेंस दिए गए थे तो सभी कंपनियों के लिए यह निर्धारित कर दिया गया था कि वे 180 लाइन सुरक्षा एजेंसियों के लिए रखें. जब भी इन एजेंसियों को ज़रूरत हो तो वो कोई भी फ़ोन टैप कर सकें.
अब मौजूदा वक़्त में हमारे देश में 100 करोड़ से ज़्यादा मोबाइल फ़ोन हैं तो ये लाइन भी 180 से ज़्यादा हो गई हैं, लेकिन वो मोबाइल कंपनियों के लिए लाइसेंस के साथ लगाई गई शर्त थी तो उन्हें वो करनी ही थी.
अब आरबीआई ऐसी ही बात इन फ़ाइनेशियल सर्विस कंपनियों के लिए कह रही है.
डेटा के भारत में होने से क्या फ़र्क़ आएगा
हम जैसे लोग जो महानगरों में रहते हैं रोज़ क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करते हैं वहां शायद इतना फ़र्क़ ना पड़े, लेकिन दुर्गम इलाकों में फ़र्क़ दिखेगा.
जैसे, कई क्षेत्रों में कई-कई दिनों तक इंटरनेट सेवा ठप्प रहती है, वहां ऐसे हालात में कोई इन सेवाओं का इस्तेमाल किस तरह कर पाएगा.
भारत में शायद सबसे ज़्यादा इंटरनेट सेवा रोकी जाती है, तो यह सोचना पड़ेगा कि फिर डिजिटल इंडिया का सपना कैसे पूरा होगा, जब लोग ऑनलाइन लेन-देन ही नहीं कर पाएंगे.
क्या डेटा सुरक्षा में सक्षम है सरकार
एक पुरानी कहावत है 'अब पछताए क्या होत, जब चिड़िया चुग गई खेत'. जैसे आधार के मामले में हमारी सरकार बोलती रही कि उसने इतना बड़ा डेटाबेस बनाया है उसकी सुरक्षा के लिए और भी कई दावे होते रहे, लेकिन जो नुकसान पहुंचना था वह तो पहुंच ही गया.
यही वजह है कि श्रीकृष्ण कमेटी ने डेटा प्रोटेक्शन बिल में यह क़ानून बनाने की बात की और पहले से ही बातचीत चल रही थी कि डेटा को लोकलाइज़ किया जाए यानी भारत में रखा जाए.
आरबीआई के रुख़ से ऐसा लगता है कि सरकार इसे लागू करना चाहती है, हालांकि डेटा प्रोटेक्शन के लिए यह चीज़ हमें पहले ही लागू कर देनी चाहिए थी.
आरबीआई ने साथ ही यह भी कहा है कि सभी कंपनियों को हर तय सीमा के भीतर इस डेटा से जुड़ी जानकारी सरकार को मुहैया भी करवानी है और वह इसके ऑडिट की बात कर रही है.
इस तरह से देखा जाए तो फ़ाइनेंशियल सर्विस से जुड़ी कंपनियों को यह सभी डेटा उपलब्ध करवा पाना मुश्किल होगा.
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(बीबीसी संवाददाता नवीन नेगी के साथ बातचीत पर आधारित)
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