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कौन है हैदराबाद यूनिवर्सिटी में एबीवीपी का परचम लहराने वाली आरती नागपाल ?
- Author, कमलेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
स्कूल से ही काफी बढ़-चढ़कर बोलने वालीं आरती नागपाल हमेशा से कुछ अलग करना चाहती थीं. इसी चाह ने उन्हें हैदराबाद विश्वविद्यालय में अध्यक्ष पद पर पहुंचा दिया.
आठ साल बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनावों में जीत हासिल की और आरती नागपाल अध्यक्ष बनीं.
आज से डेढ़ साल पहले तक राजनीति से दूर रहने वालीं एक पीएचडी स्कॉलर आरती कुछ ही समय में छात्रसंघ के सबसे बड़े पद पर पहुंच गईं. आखिर ये बदलाव कैसे हुआ?
पढ़ाई से चलते-चलते वो राजनीति तक कैसे पहुंची?
इस पर आरती बताती हैं, ''मेरे लिए ये राजनीति में आने से ज्यादा कुछ अलग करने के मौके की तरह था. मेरे दोस्त और फैकल्टी सभी मेरे बारे में जानते थे कि मैं अच्छा बोलती हूं, किसी भी मुद्दे पर बेझिझक अपनी राय रखती हूं. मेरी इसी क्षमता को देखते हुए दोस्तों के जरिए मेरे पास एबीवीपी से जुड़ने की पेशकश आई.''
लेकिन जैसे ही उनसे रोहित वेमुला पर सवाल पूछा, वो आज भी चुप्पी साध लेती हैं.
वह कहती हैं, ''जब रोहित वेमुला का मामला सामने आया था तब वो विश्वविद्यालय की गतिविधियों में ज्यादा सक्रिय नहीं थी. अधिकतर हॉस्टल में काम करती थीं और विश्वविद्यालय जाना बहुत कम होता था. ''
वह इस मामले को बेहद संवेदनशील बताते हुए कुछ भी कहने से इनकार करती हैं.
रोहित वेमुला इसी विश्वविद्यालय में पढ़ते थे. उन्होंने जनवरी 2016 में आत्महत्या कर ली थी. उनकी मौत के बाद उनकी जाति पर सवाल उठे और उसकी जांच की गई. ये मसला राष्ट्रीय राजनीति में भी छाया रहा था.
जिस विश्वविद्यालय में रोहित वेमुला की जाति को लेकर इतनी राजनीति हुई हो, सत्तारूढ़ पार्टी को सवालों के घेरे में खड़ा किया जाता रहा हो, उस विश्वविद्यालय में आरती नागपाल ने एबीवीपी को जानना क्यों चुना?
आरती नागपाल के मुताबिक, ''मेरा रुझान हमेशा से ही सेंटर-राइट विचारधारा का रहा है इसलिए मेरे लिए एबीवीपी में जाने का फैसला मुश्किल नहीं रहा. मुझे ये एकेडमिक्स से अलग क्षेत्र लगा जिसमें मैं अपनी दूसरी क्षमताओं का भी विकास कर सकती थी.''
5 अक्टूबर को हैदराबाद विश्वविद्यालय में छात्रसंघ के चुनाव हुए थे और 6 अक्टूबर की रात को नतीजे आए. ये नतीजे एक बड़े बदलाव के साथ थे जिसमें आठ साल बाद एबीवीपी फिर से चुन कर आई थी.
एबीवीपी ने ये चुनाव अदर बैकवर्ड क्लासिस फेडरेशन (ओबीसीएफ) और सेवालाल विद्यार्थी दल (एसएलवीडी) के साथ गठबंधन में लड़ा था. इस गठबंधन ने छात्रसंघ चुनाव के सभी छह पदों अध्यक्ष, उपाध्यक्षक, जनरल सेकेट्री, ज्वाइंट सेकेट्री और कल्चरल सेकेट्री पर चुनाव जीता है.
इस चुनावों में एबीवीपी, स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) और यूनाईटेड डेमोक्रेटिक एलाइंस के बीच कड़ा मुकाबला था.
एसएफआई के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहे. आरती नागपाल ने 1663 वोटों से ये चुनाव जीता.
दोनों के बीच कांटे की टक्कर रही लेकिन आरती को 350 वोट ज्यादा मिले. चुनावों में करीब 3900 छात्रों ने हिस्सा लिया था.
उपाध्यक्ष अमित कुमार और कल्चरल सेकेट्री अरविंद एस कुमार एबीवीपी से हैं. वहीं, धीरज संजोगी ओबीसीएफ और ज्वाइंट सेकेट्री प्रवीण कुमार एसएलवीडी से हैं.
अध्यक्ष पद तक कैसे पहुंची
साल 2017 की बात है जब आरती नागपाल ने कल्चरल सेक्रेटी पद के लिए चुनाव लड़ा था. तब वो बहुत कम अंतर से चुनाव हार गई थीं. लेकिन, एक साल बाद ही अध्यक्ष पद की उम्मीदवार बनीं.
अध्यक्ष पद तक पहुंचने के सफर के लिए आरती अपनी सक्रियता को बड़ा कारण मानती हैं.
वह कहती हैं, ''मैं पिछले एक साल से बहुत सक्रिय रही हूं. पार्टी में लड़कियों की भागीदारी भी बढ़ाई है. शायद यही कारण रहा कि मुझे अध्यक्ष पद के लिए मौका मिला. मेरी फैकल्टी और परिवार का बहुत सहयोग रहा.''
''मेरे पिता का रुझान कांग्रेस की तरफ है. वो कारोबारी हैं और राजनीति में कभी सक्रिय नहीं रहे. मेरा उनसे मतभेद भी रहता है. लेकिन, फिर भी उन्होंने मुझे सपोर्ट किया. मां हाउस वाइफ हैं लेकिन मेरे लिए उनके सपने बिल्कुल अलग हैं. मेरी दो बहनें भी मेरे फैसले से खुश हैं.''
कॉलेज में मिला प्यार और फिर शादी
आरती नागपाल ने छह महीने पहले ही शादी की है. किसी को भी ये सोचकर हैरानी हो सकती है कि नई शादी की जिम्मेदारियां और चुनाव, दोनों में तालमेल कैसे हुआ.
आरती बेझिझक कहती हैं कि उन्हें इसमें कोई दिक्कत नहीं हुई क्योंकि उनके पति आशीष मेहता का पूरा सहयोग रहा.
आरती और आशीष ने लव मैरिज की है. उनकी कहानी की शुरुआत कॉलेज से ही हुई थी. कुछ साल पहले दोनों कॉलेज में मिले और फिर प्यार हो गया.
वह कहती हैं, ''आशीष मेरे काम को बहुत अच्छे से समझते हैं. हम साथ पढ़े हैं तो ये और आसान हो जाता है. उनके परिवार को भी इससे कोई दिक्कत नहीं हुई. थोड़ा मुश्किल तो होता है लेकिन सब मैनेज हो गया.''
साइकोलॉजी की स्टूडेंट
आरती नागपाल हैदराबाद की ही रहने वाली हैं. उन्होंने हैदराबाद के ही एक कॉलेज से साइकोलॉजी में ग्रेजुएशन की थी. इसके बाद साल 2012 में हैदराबाद विश्वविद्यालय से हेल्थ साइकोलॉजी में एमएससी की.
फिर कुछ समय के लिए विश्वविद्यालय से बाहर रिसर्च करने के बाद उन्होंने साल 2015 में पीएचडी में एडमिशन लिया. वह सेक्सुअल हेल्थ ऑफ वुमन पर रिसर्च कर रही हैं.
वह कहती हैं, ''महिलाओं संबंधी मसलों पर मेरा हमेशा फोकस रहा है. मैं एबीवीपी में महिला संयोजक थी और उनकी भूमिका बढ़ाने के लिए कई प्रयास भी किए.''
लेकिन, एबीवीपी में महिला प्रतिनिधित्व बहुत कम होने के मसले पर उनका कहना है कि इसमें बदलाव हो रहा है. पहले भी कुछ पदों पर महिलाएं रही हैं और आगे भी ये जारी रहेगा.
एक लड़की के लिए इस पद पर पहुंचना कितना मुश्किल है. इस पर आरती मानती हैं कि मुश्किलें तो आती हैं और छात्र राजनीति में लड़कियों की संख्या काफी कम हैं.
वह कहती हैं, ''लोगों की मानसिकता के कारण लड़कियों के लिए ये क्षेत्र कठिन बन जाता है. जब भी किसी महिला उम्मीदवार को खड़ा किया जाता है तो उसे टोकनिज़्म का नाम दे देते हैं यानि वो बस एक वर्ग का प्रतिनिधित्व करने के लिए है, उसमें अपनी कोई काबिलियत नहीं है. उन पर भरोसा नहीं होता.''
''वहीं, परिवार वाले भी सोचते हैं कि अगर लड़की कॉलेज जा रही है तो सिर्फ पढ़ाई करे, राजनीति से दूर रहे. काम से काम रखे. राह तो मुश्किल है लेकिन लड़कियों को आगे बढ़ना होगा.''
आठ साल क्यों लगे
एबीवीपी ने आठ साल बाद वापसी जरूर की है लेकिन जीत का अंतर ज्यादा नहीं रहा. वहीं, वापसी में इतना समय क्यों लगा.
इसके लिए आरती कहती हैं, ''यह सही है कि पिछले आठ सालों में हमें कोई बड़ी पोस्ट नहीं मिल पा रही थी. एबीवीपी का नाम ख़राब करने की कोशिश की गई थी. इस बार पूरे पैनल का जीतना हमारे लिए बड़ी बात है. हालांकि, पहले भी कल्चरल और जनरल सेक्रेट्री के पद एबीवीपी के पास रहे थे.''
स्टूडेंट्स के लिए क्या करेंगी
अध्यक्ष बनने के बाद आरती सबसे पहले क्या काम करेंगी. इस पर वो कहती हैं कि सबसे पहला मसला खाने की गुणवत्ता में सुधार करना है. हॉस्टल के मेस में बहुत खराब खाना मिलता है. स्टूडेंट्स को बाहर से खाना मंगाना पड़ता है जिसमें बहुत खर्चा आता है. एक बार तो बाहर से खाना मंगाने पर भी रोक लगा दी गई थी.
उन्होंने बताया कि साफ-सफाई का मुद्दा भी बहुत बड़ा है. बाथरूम साफ नहीं होते और हॉस्टल में सफाई नहीं रहती. साथ ही ट्रांस्पोर्टेशन के मामले पर भी काम करना जरूरी है. इन सबसे स्टूडेंट्स रोजाना परेशान रहते हैं.
हैदराबाद विश्वविद्यालय में फेलोशिप देर से मिलने का मसला भी उठता रहता है. आरती भी इससे सहमति जताती हैं. उन्होंने कहा, ''इस मामले में बहुत टालू रवैया अपनाया जाता है. हर महीने मिलने वाली फेलोशिप छह-छह महीनों में मिलती है. स्टूडेंट्स के लिए सर्ववाइव करना मुश्किल होता है. अब हम सबसे पहले आरटीआई के जरिए ये जानने की कोशिश करेंगे कि फाइल्स अटकती कहां हैं.''
लड़कियों के मुद्दे
आरती बताती हैं कि हैदराबाद विश्वविद्यालय में लड़कियों की सुरक्षा एक बड़ा मसला है. यहां पर सेक्सुअल हरेसमेंट जैसे पीछा करना, छेड़छाड़ के मामले सामने आते हैं लेकिन जांच समिति का रवैया बहुत असंवदेनशील रहा है. मामले सुलझने में सालों साल लग जाते हैं.
वह कहती हैं कि देश में सेक्सुअल हरेसमेंट के ख़िलाफ़ अभियान चल रहा है जो बताता है कि लड़कियां किस तरह दबाव में आकर चुप रहती हैं. शक्तिशाली लोगों के जरिए उनकी बात दबाई जाती है. वो लड़कियों में भरोसा जगाने और जांच समिति की कमियों में सुधार की कोशिश करेंगी. इसके अलावा लड़कियों के हॉस्टल में सफाई का बहुत बुरा हाल रहता है. इसके लिए वो पहले भी बोल चुकी हैं. विश्वविद्यालय पर इसे लेकर दबाव बनाया जाएगा.
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