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जेएनयू छात्रसंघ चुनावों में एबीवीपी की हार नहीं हुई है: पूर्व जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष संदीप महापात्रा
- Author, संदीप महापात्रा
- पदनाम, पूर्व अध्यक्ष, जेएनयू छात्रसंघ
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) छात्रसंघ के चुनाव हर साल होते हैं और यह अनोखे इस मामले में हैं क्योंकि यह छात्र समुदाय के देखरेख में होते हैं. यह चुनाव वैचारिक झुकाव और धारदार भाषणों के आधार पर होते हैं और इस दौरान विवधतापूर्ण रंगत वाला चुनाव अभियान होता है.
वैचारिक रूप से कैंपस मध्यमार्गियों से लेकर वामपंथियों और दक्षिणपंथियों में बंटा रहता है. 70 के दशक की शुरुआत में वाम धड़े का नेतृत्व भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की छात्र इकाई ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन (एआईएसएफ़) करती थी.
लेफ़्ट विरोधियों की जगह जो कैंपस में थी उसका नेतृत्व 'फ़्री थिंकर्स' करता था. फ़्री थिंकर्स में वह सभी छात्र आते थे जो लेफ़्ट विरोधी राजनीति में विश्वास रखते थे.
1980 में पहली बार आया एबीवीपी
जेएनयू में आरएसएस से जुड़े छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की एंट्री 1980 के अख़िर में हुई. एबीवीपी का जेएनयू में प्रवेश बेहद ख़ास रहा क्योंकि उसने कैंपस में आते ही छात्रों और कैंपस के मुद्दों को उठाया, उसने राष्ट्रीय मुद्दों पर बात करनी शुरू की और राष्ट्रवाद पर वाद-विवाद शुरू किया.
एबीवीपी के प्रवेश से यह हुआ कि छात्र समुदाय अपने हितों से जुड़े मुद्दों में रुचि लेने लगा. लेफ़्ट भी तब तक केवल मार्क्सवादी आदर्शों और विचारधाराओं, सोवियत संघ से जुड़े अंतरराष्ट्रीय मुद्दों और बाद में चीन, अरब जगत में विवाद के बारे में बात करने को लेकर रुचि लेता था. उनको भी छात्र समुदाय और राष्ट्रीय हितों को लेकर बहस करने को मजबूर किया गया.
1990 की शुरुआत में सीपीआई-एमएल की छात्र इकाई ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की एंट्री हुई. नब्बे की शुरुआत में एसएफ़आई-एआईएसएफ़, आइसा और एबीवीपी के बीच त्रिकोणीय मुक़ाबला देखने को मिलता था. एबीवीपी ने 1991 में सेंट्रल पैनल में बड़ी जीत हासिल की, उसने सेंट्रल पैनल के संयुक्त सचिव पद पर कब्ज़ा जमाया था.
अगले तीन से चार साल वैचारिक लड़ाई के गवाह रहे जिसमें एबीवीपी एक तरफ़ और दूसरी ओर वामपंथी समूह रहते थे. एबीवीपी ने पहली सबसे बड़ी जीत 1996 में हासिल की जब उसने उपाध्यक्ष, महासचिव और संयुक्त सचिव पर जीत हासिल की जबकि अध्यक्ष पद केवल चार वोटों से एबीवीपी हारी थी.
जब पहली बार अध्यक्ष पद जीता
एबीवीपी के कैंपस में एक बड़ी ताक़त के रूप में आने की यह एक वैचारिक जीत थी और एक तथ्य यह भी था कि वह कैंपस का एजेंडा तय करेगी.
अगले कुछ सालों में एबीवीपी के लिए मिले-जुले परिणाम रहे और उसने चुनावों में सेंट्रल पैनल की एक या दो सीटों पर कब्ज़ा जमाया और तब तक एबीवीपी कैंपस में वामपंथ विरोधी आंदोलन की आवाज़ बन चुकी थी.
जो छात्र लेफ़्ट की नीति में विश्वास नहीं रखते वह एबीवीपी को अपने जवाब के तौर पर देखते हैं. एबीवीपी ने ही विभिन्न स्कूलों में काउंसलर के सबसे अधिक पद जीते हैं. लेफ़्ट के प्रभुत्व वाले स्कूल ऑफ़ सोशल साइंसेज़ और स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज़ के साथ ही स्कूल ऑफ़ लैंग्वेजेज़ और साइंस जैसे स्कूलों में एबीवीपी ने पहुंच बनाई है.
इन सभी घटनाओं का तार्किक निष्कर्ष साल 2000 में निकला जब एबीवीपी ने अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी एसएफ़आई को हराते हुए अध्यक्ष पद पर जीत हासिल की. अध्यक्ष पद पर जीत एक ऐसी घटना थी जिसने इस तथ्य को स्थापित किया कि एबीवीपी की पहले हुई कई जीत कोई तुक्का नहीं थी. यह कई कार्यकर्ताओं के निरंतर मेहनत के कारण थी.
जेएनयू में इस जीत का अर्थ था कि दक्षिणपंथी विचारधारा समाज के विभिन्न स्तरों में स्वीकार्य है क्योंकि जेएनयू में भारत के अलग-अलग हिस्सों से विभिन्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के लोग आते हैं.
2010 से 2011 का वक़्त एबीवीपी और जेएनयू में छात्र राजनीति के लिए एक परीक्षण बिंदु था. एबीवीपी सेंट्रल पैनल समेत काउंसलर के कई पद जीतने में क़ामयाब रही. 2006 में शैक्षणिक संस्थानों में पिछड़ों को आरक्षण दिए जाने के कारण यूथ फ़ॉर इक्वालिटी जेएनयू की छात्र राजनीति में दाख़िल हुआ.
जाति आधारित राजनीति को एबीवीपी ने तोड़ा
जाति के मुद्दे पर यूथ फ़ॉर इक्वालिटी ने छात्र समुदाय को विभाजित करने की कोशिश की और जाति की राजनीति से सबसे अधिक लाभ आइसा को हुआ जो ऐसी राजनीति के पक्ष में थी. एबीवीपी ने इन सालों में एक रचनात्मक भूमिका अदा की. उसने न केवल जाति के आधार पर राजनीति का विरोध किया बल्कि यह सुनिश्चित किया कि जाति के आधार पर विश्वविद्यालय चुनावों में मतदान न हो.
सामाजिक न्याय में विश्वास रखने वाली एबीवीपी ने बिना किसी भेदभाव के समाज के पिछड़े छात्रों को बराबरी का मौक़ा देते हुए मज़बूत उम्मीदवार के रूप में उतारा. उसके तेज़ अभियानों से ये हुआ कि जाति आधारित यूथ फ़ॉर इक्वालिटी जैसे संगठनों को हार का सामना करना पड़ा. यह एबीवीपी की नैतिक जीत से अधिक थी जिसने जेएनयू के सामाजिक ढांचे और चरित्र को बनाए रखने में मदद की.
साल 2008 में कांग्रेस के राष्ट्रपति उम्मीदवार को लेफ़्ट द्वारा समर्थन देने पर एसएफ़आई में विभाजन हो गया जिसके बाद डेमोक्रेटिक स्टूडेंट फ़्रंट का गठन हुआ. 2011 में छात्रसंघ चुनावों पर प्रतिबंध लगे और फिर लिंगदोह कमिटी की सिफ़ारिशों के बाद दोबारा चुनाव शुरू हुए.
अगले कुछ सालों में एबीवीपी ने जनसंपर्क कार्यक्रमों के ज़रिए सदस्यता कार्यक्रम, दाख़िला और हॉस्टल सहायता जैसे अभियान शुरू किए जिससे उसके कैडर में बढ़ोतरी हुई. 2015 में एबीवीपी का फिर से उदय हुआ और उसने सबसे अधिक काउंसलर के पदों के अलावा सेंट्रल पैनल में संयुक्त सचिव का पद जीता.
एबीवीपी के डर से लेफ़्ट का गठबंधन
इसके कारण एक-दूसरे को नापसंद करने वाली दो वामपंथी पार्टियों को गठबंधन करना पड़ा. 2016 में एआईएसएफ़ और एसएफ़आई ने गठबंधन किया. 2017 में डीएसएफ़ के रूप में इनको दूसरा गठबंधन सहयोगी मिला.
2018 के जेएनयू छात्रसंघ चुनावों में लेफ़्ट पार्टियों को एबीवीपी के आगे अपनी हार का अंदाज़ा हो गया था तो उन्होंने एक गठबंधन बनाया. इस वर्तमान गठबंधन में लेफ़्ट के आइसा, एसएफ़आई, डीएसएफ़, एआईएसएफ़ और दूसरे वामपंथी समूह हैं. इनको कैंपस के प्रतिबंधित धुर-दक्षिणपंथी समूहों का साथ भी मिला.
इसका इतिहास रहा है कि वामपंथी कैडर कभी भी हार को स्वीकार नहीं करते हैं. यह भी एक चुनाव था जब ऑनलाइन पॉर्टल, सोशल मीडिया ने हिंसा को लेकर अफ़वाह फैलाने में भूमिका अदा की. वह वामपंथी कैडर थे जो हिंसा कर रहे थे. यहां तक की महिला कैडरों को पीटा गया.
बैलट की गणना में चुनाव समिति का रवैया पक्षपातपूर्ण था, उन्होंने एबीवीपी के पोल एजेंट को प्रवेश की अनुमति नहीं दी थी. इन सबके बावजूद एबीवीपी ने सबसे अधिक वोट शेयर हासिल करने में कामयाबी हासिल की है. एबीवीपी का वोट शेयर पिछले चुनाव से बढ़ा है.
नक्सल-लेफ़्ट गठबंधन विलुप्त होने की कगार पर है. विभिन्न विचारधाराओं वाले इन समूहों ने जो गठबंधन बनाया है उससे अधिक यह एबीवीपी की नैतिक जीत है. एबीवीपी इकलौता छात्र संगठन है जिसने अपना आधार बढ़ाया है और वहीं लेफ़्ट वोट शेयर खिसकने का गवाह रहा है.
एबीवीपी छात्र समुदाय के लिए लड़ता रहा है और उनकी आवाज़ उठाता रहा है. एबीवीपी के वोट शेयर से इस बात पर मुहर लग गई है कि छात्र समुदाय ने नक्सल-लेफ़्ट-आज़ादी गैंग गठबंधन को पूरी तरह नकार दिया है. यह वही है जो एबीवीपी चाहता है.
(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है)
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