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आधार पर कोर्ट का फ़ैसला और आम आदमी
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को आधार की अनिवार्यता और इससे निजता के उल्लंघन पर अहम फ़ैसला सुनाया है. सुप्रीम कोर्ट ने आधार की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा, लेकिन उसे बैंक और मोबाइल से जोड़ने की ज़रूरत को ख़ारिज़ कर दिया.
हालांकि ये फ़ैसला सर्वसम्मति से नहीं लिया गया. पांच जजों की संवैधानिक पीठ में से जस्टिस चंद्रचूड़ ने आधार नंबर को पूरी तरह से असंवैधानिक बताया है.
इस बेंच में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एके सीकरी, जस्टिस एएम खनविलकर, जस्टिस चंद्रचूड़ और जस्टिस अशोक भूषण शामिल थे.
आम आदमी के लिए इस फैसले के क्या मायने हैं, इसी विषय पर हमने बात की सिटिज़न फ़ोरम फ़ॉर सिविल लिबर्टीज़ के संयोजक डॉ. गोपाल कृष्ण से.
गोपाल बीते आठ साल से आधार नंबर के लिए नागरिकों की आँख की पुतलियों की तस्वीर और उंगलियों के निशान लिए जाने के ख़िलाफ़ अभियान चला रहे हैं.
गोपाल ने बीबीसी हिंदी से बातचीत में कहा कि इस फ़ैसले से क़ानून पर सवालिया निशान लग गया है क्योंकि पांच जजों की पीठ में से जहां चार जजों ने इस क़ानून के कुछ विशेष प्रावधानों (जैसे सेक्शन 57, जिसके तहत विदेशी कंपनियों को भी आधार डेटा देने की बात कही गई है) पर सवाल उठाए हैं वहीं जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा है कि आधार मनी बिल नहीं है.
मतलब, एक ओर जहां जस्टिस चंद्रचूड़ ने पूरे आधार एक्ट पर सवाल उठाए हैं वहीं बहुमत के चार जजों ने सिर्फ़ कुछ प्रावधानों पर.
दूर-दराज़ बसने वाले भारतीय को इससे क्या लाभ-हानि?
गोपाल कहते हैं कि सवालिया निशान भले लग गया हो लेकिन बहुमत से दिया गया फैसला जनहित में है क्योंकि अब आधार की अनिवार्यता उन चीज़ों के लिए समाप्त कर दी गई है, जिनसे आम आदमी सबसे ज़्यादा प्रभावित होता है.
भारत के दूर-दराज़ के गांवों में अपनी ज़रूरतों के लिए एक आम नागरिक किसी भी वैकल्पिक पहचान पत्र का इस्तेमाल कर सकता है और अपनी ज़रूरतों की पूर्ति कर सकता है.
आधार का नागरिकता से कोई लेना-देना नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि अब स्कूलों में दाख़िले के लिए आधार नंबर की मांग नहीं की जा सकती है. लेकिन कोर्ट ने ये भी कहा कि बड़े होने पर अगर बच्चा चाहे तो आधार से ख़ुद को अलग कर (opt out) सकता है. गोपाल इस मसले को समझाते हुए कहते हैं कि चार जजों के फ़ैसले में कहीं-कहीं असंगति नज़र आती है और ये मुद्दा उसी का एक उदाहरण है.
गोपाल कहते हैं कि सबसे पहले तो ये समझने की ज़रूरत है कि आधार संख्या क़ानूनी तौर पर नागरिकों की पहचान संख्या नहीं है, बल्कि भारत में रहने वाले लोगों की पहचान संख्या है. यह समझना ज़रूरी है कि चाहे सब्सिडी हो या बच्चों की शिक्षा, वो सिर्फ़ भारतीयवासी होने से नहीं मिलता बल्कि वो नागरिकों का अधिकार है.
इसलिए ये कुछ अनसुलझे पहलू भी हैं और इन पर आगे के पुनर्विचार याचिकाओं के बाद ही कुछ स्पष्टता आ पाएगी.
गोपाल कहते हैं कि आधार कार्ड पर भी स्पष्ट रूप से लिखा होता है कि ये नागरिकता का पहचान पत्र नहीं है. ऐसे में सरकार की तरफ़ से जो भी सुविधाएं दी जाती हैं वो भारतवासियों के लिए नहीं हैं बल्कि भारतीय नागरिकों के लिए हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने भले ही अपना फ़ैसला सुना दिया हो लेकिन अभी इसमें कई तार्किक पक्षों का अवलोकन करने की ज़रूरत है. गोपाल कहते हैं कि जो फ़ैसला आया है उससे कई तार्किक बाध्यताएं पैदा हो गई हैं जो बेशक इसकी समीक्षा की ज़रूरत की ओर इशारा करती हैं.
आधार नंबर को ख़तरनाक क्यों मानते हैं याचिकाकर्ता?
गोपाल के मुताबिक, ये सारा मसला जागरुकता का है.
वह कहते हैं, "दुनिया के जिन भी देशों में लोग अपनी निजता को लेकर सतर्क हैं, उन सभी देशों में आधार जैसी परियोजनाओं पर रोक लगा दी गई है. यूके, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस और चीन इसके उदाहरण हैं."
गोपाल आधार के इतिहास का ज़िक्र करते हुए कहते हैं कि जब आधार नंबर की प्रस्तावना दी गई थी तो यूके के आईडी प्रोजेक्ट को उदाहरण के तौर पर रखा गया था लेकिन जब यूके ने लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स की स्टडी के बाद जब इसे ख़ारिज़ कर दिया तो भारत सरकार ने उस पर ध्यान नहीं दिया.
गोपाल कहते हैं, "इन तमाम बातों के बावजूद जो फ़ैसला आया है वो एक लंबी प्रक्रिया का परिणाम है. इस मामले पर साल 2012 से सुनवाई चल रही है और हर बार अलग-अलग जजों और बेंच के सामने. हर जज की अपनी समझ और हर बेंच की अपनी सोच. ये सारे अध्ययन सुप्रीम कोर्ट के सामने थे लेकिन ये फ़ैसला कहीं न कहीं ये दिखाता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मसले पर चुप्पी साधी गई है और जस्टिस चंद्रचूड़ की अलग राय भी इसको प्रमाणित भी करती है."
आधार एक्ट 2016 में आया लेकिन ये परियोजना 2009 से ही शुरू हो गई थी. बकौल गोपाल, ऐसे में विदेशी कंपनियों के पास भारतीयों के 2016 तक का डेटा तो है ही और सुप्रीम कोर्ट ने विदेशी कंपनियों से डेटा शेयर न करने की जो बात कही है वो भविष्य के डेटा के लिए है. पुराने डेटा तो कंपनियों के पास हैं ही.
और जिनका आधार कार्ड आज तक बना ही नहीं उनका क्या?
गोपाल कहते हैं कि जिन लोगों ने अब तक अपना आधार कार्ड नहीं बनवाया है, उनकी सोच को इस फ़ैसले से बल मिलेगा.
"आप खुद ही सोचिए, किसी ने आधार क्यों नहीं बनवाया होगा. इसीलिए न क्योंकि उसे अपनी निजता को लेकर डर रहा होगा. ऐसे में ये फ़ैसला उनके डर को तो सही ही साबित करता है."
निजी जानकारी के लीक होने की आशंका पर गोपाल कहते हैं कि इतने दावे होते रहे लेकिन डेटा तो लीक हुआ ही है. सोचने वाली बात है कि जब आप डेटा का एक ज़ख़ीरा विदेशी कंपनियों को दे देंगे तो ये तो होना ही है.
तो अब उनका क्या जिनका आधार नंबर मोबाइल कंपनी और बैंक के पास है?
इस सवाल के जवाब में गोपाल कहते हैं कि क़ानूनी तौर पर तो कंपनियां लोगों के आधार नंबर का इस्तेमाल नहीं कर सकतीं. इसका मतलब ये हुआ कि अगर वो इस्तेमाल करते हुए पकड़ी गईं तो उन पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है लेकिन अगर कोई नाजायज़ तरीक़े से इस्तेमाल करना चाहे तो उसके पास तो डेटा है ही. एक बार डेटा ट्रांसफ़र मतलब ट्रांसफ़र
गोपाल कहते हैं कि आगे सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू-पिटीशन डाली जा सकती है. स्पष्टीकरण याचिका डाली जा सकती है.
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