आपराधिक मामलों में फंसे उम्मीदवारों पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला

    • Author, प्रियंका दुबे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भ्रष्टाचार को एक 'राष्ट्रीय आर्थिक आतंक' घोषित करते हुए मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक पृष्ठभूमि वाले प्रत्याशियों को चुनाव प्रणाली से दूर रखने की ज़िम्मेदारी संसद पर डाल दी.

'आपराधिक मामलों में फंसे चुनाव प्रत्याशियों को चुनाव प्रक्रिया से पूरी तरह बाहर' रखे जाने की मांग कर रही कुछ जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा समेत पांच न्यायधीशों की पीठ ने अपना फ़ैसला सुनाया.

निर्णय में सर्वोच्च अदालत ने कहा कि आपराधिक आरोपों के आधार पर प्रत्याशियों और निर्वाचित प्रतिनिधियों को चुनाव प्रणाली से दूर रखने के लिए संसद को ही एक नया क़ानून बनाना चाहिए.

लेकिन चुनावों में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए कुछ महत्वपूर्ण दिशा निर्देश जारी करते हुए अदालत ने ये भी कहा कि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले सभी प्रत्याशियों को अपने नामांकन पत्रों में अपने ख़िलाफ़ चल रहे मुक़दमों की पूरी जानकारी लिखनी होगी.

आरोपों की जानकारी देनी होगी

अपने दिशा निर्देशों में अदालत ने ये भी जोड़ा कि प्रत्याशियों को अपने ऊपर लगे आरोपों की जानकारी अपने पार्टी प्रमुखों को भी बतानी होगी. सभी राजनीतिक पार्टियों को आपराधिक पृष्ठभूमि वाले अपने प्रत्याशियों से जुड़ी सारी जानकरियां भी अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित करनी होंगी.

अदालत ने यह भी कहा कि 'गंभीर अपराधों' के आरोप में अदालती कार्रवाई का सामना कर रहे सभी प्रत्याशियों को अपने ऊपर दायर मामलों से जुड़ी जानकरियों को कम से कम तीन बार प्रचार के ज़रिए जनता के सामने रखना होगा.

'निराशाजनक फ़ैसला'

एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ोर्म्स (ए.डी.आर) से जुड़े जगदीप छोकर बीते डेढ़ दशक से चुनाव सुधारों से जुड़े मुद्दों पर काम कर रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को 'लोकतंत्र के लिए निराशाजनक' बताते हुए उन्होंने कहा, "आज के निर्णय में अदालत ने लिखित क़ानूनों का तो पालन किया पर संविधान की भावना को दरकिनार कर दिया. चुनाव प्रत्याशियों के आपराधिक रिकॉर्ड को जनता के सामने रखने वाली बात में कुछ भी नया नहीं है. ये काम तो एडीआर बीते 15 सालों से कर रहा है. लेकिन संविधान के अनुसार ज़रूरत पड़ने पर आगे बढ़कर जनहित के लिए क़ानून में परिवर्तन करना सर्वोच्च न्यायलय का अधिकार भी है और ज़िम्मेदारी भी है. इस लिहाज़ से ये फ़ैसला बहुत निराशाजनक है"

2014 चुनाव के आंकड़े

बीते लोकसभा चुनाव के दौरान नेशनल इलेक्शन वॉच (एनइडब्ल्यू) और एडीआर ने 2014 में चुनाव लड़ रहे 8000 से ज़्यादा उम्मीदवारों के शपथ पत्रों का अध्ययन किया था.

उनके विश्लेषण में ये पाया गया कि बीते लोकसभा चुनाव में 17 प्रतिशत उम्मीदवारों ने अपने शपथ पत्रों में खुद पर आपराधिक मामले घोषित किए थे.

1398 की कुल संख्या वाले इन आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों में से 889 पर गंभीर आपराधिक मामले घोषित किय गए थे.

यहां 'गंभीर आपराधिक मामलों' के मायने पांच साल या उससे अधिक सज़ा वाले गैर ज़मानती अपराधों से हैं. इसमें हत्या, हत्या का प्रयास, अपहरण और बलात्कार से संबंधित अपराध शामिल हैं.

साथ ही चुनाव से संबंधित अपराध जैसे रिश्तवतखोरी, सरकारी ख़ज़ाने को नुक़सान पहुंचाने से संबंधित अपराध और महिलाओं के ऊपर अत्याचार के मामलों से जुड़े अपराध शामिल हैं.

51 निर्वाचित प्रतिनिधियों पर मामले

बीते लोकसभा चुनाव में 57 उम्मीदवारों पर हत्या से संबंधित मामले घोषित थे जबकि हत्या के प्रयास से जुड़े मामले घोषित करने वाले 173 उम्मीदवार थे.

महिलाओं के ऊपर अत्याचार से जुड़े मामले 58 उम्मीदवारों ने घोषित किए थे जबकि 54 उम्मीदवारों पर सांप्रदायिक अशांति फैलाने से संबंधित मामलों में कानूनी कार्रवाई चल रही थी.

अगस्त 2017 में प्रकाशित एडीआर की एक अन्य रिपोर्ट भी इस संबंध में चौंकाने वाले आकंड़े सामने रखती है. रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान में 51 निर्वाचित प्रतिनिधियों पर महिलाओं के खिलाफ़ अत्याचारों से जुड़े मामले चल रहे हैं.

इनमें बलात्कार और अपहरण जैसे मामले भी शामिल हैं. इन 51 निर्वाचित प्रतिनिधियों में भारतीय जनता पार्टी के 14 निर्वाचित प्रतिनिधि, शिव सेना के सात और अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के सात प्रतिनिधि शामिल हैं.

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