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नज़रिया: फ़ारूक़ अब्दुल्ला क्यों कर रहे हैं चुनावों का बहिष्कार
- Author, बशीर मंजर
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
जम्मू-कश्मीर के प्रमुख राजनीतिक दल नेशनल कॉन्फ़्रेंस के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री डॉक्टर फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने आगामी पंचायत और नगरपालिका चुनावों का बहिष्कार करने के बाद एक नया ऐलान किया है.
उन्होंने कहा है कि अगर भारत सरकार अनुच्छेद 35 ए और अनुच्छेद 370 पर अपना रुख स्पष्ट नहीं करती है तो उनकी पार्टी लोकसभा और विधानसभा चुनावों का भी बहिष्कार करेगी.
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 35 ए जम्मू-कश्मीर विधानसभा को राज्य के स्थायी निवासियों को परिभाषित करने की शक्ति देता है.
जम्मू-कश्मीर के संविधान के अनुसार, एक स्थायी निवासी को उस व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है जो 14 मई, 1954 को राज्य का नागरिक था या जिसने राज्य में रहते हुए 10 साल का समय पूरा किया हो और उसने "क़ानूनी रूप से अचल संपत्ति प्राप्त की हो."
वहीं, अनुच्छेद 370 जम्मू-कश्मीर राज्य को एक विशेष दर्जा देता है.
35 ए के मुद्दे पर क्यों हो रही है राजनीति?
देश की सर्वोच्च अदालत में कुछ संगठनों और व्यक्तियों ने अनुच्छेद 35 ए को चुनौती देने वाली याचिकाएं दर्ज कराई हैं. इनमें से कुछ याचिकाकर्ताओं को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का समर्थन भी हासिल है.
सुप्रीम कोर्ट में ये मुद्दा जाने के बाद से जम्मू-कश्मीर के ज़्यादातर राजनीतिक दल और भारत से अलग होने की बात करने वाले अलगावादी तत्व अनुच्छेद 35 ए के पक्ष में सड़कों पर उतर आए हैं.
भारत माता की जय के नारे के बाद
फ़ारूक़ अब्दुल्ला की बात करें तो उनका दल एक लंबे समय से अनुच्छेद 370 के मुताबिक़ जम्मू-कश्मीर को अधिक स्वायत्तता प्रदान करने की मांग करता रहा है.
जम्मू-कश्मीर के आम लोगों ने भी इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि 35 ए को चुनौती देने वाली याचिकाओं को ख़ारिज किया जाए.
ऐसे में आम लोगों के बीच उबल रहे गुस्से को भांपते हुए फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने 35 ए के समर्थन में आवाज़ उठाना शुरू किया है.
उनकी कोशिश ये है कि वह इस मुद्दे पर उठने वाली सबसे मुखर आवाज़ के रूप में सामने आ सकें.
इसी पृष्ठभूमि में उन्होंने नगर पालिका और पंचायत चुनाव का बहिष्कार करने का ऐलान किया है और अपने इस फ़ैसले को उन्होंने राज्य में सुरक्षा व्यवस्था की जगह इस मुद्दे से जोड़ दिया है.
ये ऐलान करते हुए उन्होंने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के सामने केंद्र सरकार और जम्मू-कश्मीर प्रशासन की भूमिका "राज्य के लोगों की इच्छाओं और आकांक्षाओं के ख़िलाफ़" है.
इस घोषणा से पहले फ़ारूक़ अब्दुल्ला जब 22 अगस्त को ईद की नमाज़ पढ़ने के लिए श्रीनगर की हज़रतबल दरगाह में गए थे तो उन्हें नाराज़ भीड़ का सामना करना पड़ा था.
इसकी वजह ये थी कि फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की याद में आयोजित किए गए समारोह में 'भारत माता की जय' के नारे लगाए थे.
जम्मू-कश्मीर के वरिष्ठ नेताओं में से एक फ़ारूक़ अब्दुल्ला अपनी थियेट्रिक्स के लिए जाने जाते हैं. कुछ लोग उन्हें 'एक अवसरवादी' और कुछ लोग उन्हें 'नाटक बाज़' कहते हैं.
वहीं, कुछ लोग उन्हें एक 'अनगार्डेड मिसाइल' की संज्ञा देते हैं और कुछ के लिए वह सबसे सक्षम नेता है जो धारा के ख़िलाफ़ तैरने की हिम्मत रखते हैं.
उनके नाम के साथ भी कोई विशेषण लगाया जाए लेकिन ये सबको पता है कि डॉ. फ़ारूक़ अब्दुल्ला ये जानते हैं कि ख़बरों में कैसे बने रहना है और दुनिया के इस हिस्से में राजनीति का मतलब यही है.
इसके साथ ही जब जम्मू-कश्मीर की राजनीति की बात आती है, तो उनसे नफ़रत करें या उनसे प्यार करें लेकिन आप डॉ. फ़ारूक़ अब्दुल्ला को कभी अनदेखा नहीं कर सकते.
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