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गांवों में समलैंगिकों की ज़िंदगी ऐसी होती है
- Author, विकास पांडे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
समलैंगिकता को कानूनी मान्यता देने के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को पूरे देश में सराहा गया. लोगों ने इसे ऐतिहासिक करार दिया.
शहरों में रहने वाले समलैंगिक समुदाय ने अपनी इस जीत का जश्न मनाया और कहा कि उनके लिए ये "एक नए युग की शुरुआत है."
लेकिन ग्रामीण भारत में रहने वाले एलजीबीटी समुदाय के हालात अलग हैं. उनका मानना है कि उनके लिए लोगों का नज़रिया बदलने में अभी काफी वक्त लगेगा.
गांव में रहने वाले ऐेसे ही तीन समलैंगिक लोगों ने बीबीसी से अपनी कहानी साझा की.
अरुण कुमार, उम्र 28, उत्तर प्रदेश
कोर्ट के फैसले से मुझे बहुत खुशी हुई. इससे शहरों में रहने वाले लोग क़ानून से बेखौफ होकर खुद को व्यक्त कर सकेंगे.
लेकिन मुझे दुख है कि मेरे जैसे गांव में रहने वाले लोगों के लिए अभी भी राह आसान नहीं हुई है.
हमें कानून का डर नहीं है, बल्कि हमें परेशानी लोगों की सोच से है.
समलैंगिकों को अभी और लड़ना है, तब जाकर वो खुलकर जी सकेंगे. मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी डर के साए में बिताई है और मुझे नहीं लगता कि मेरे ये हालात इतनी जल्दी बदलेंगे.
मैं 14 साल का था, जब मुझे एहसास हुआ कि मैं लड़को की तरफ आकर्षित हूं. शुरू में मुझे कुछ समझ नहीं आता था. लेकिन मेरी भावनाएं मुझे परेशान करती रहती थीं, इसलिए मैंने अपने एक दोस्त से इस बारे में बात करने का फैसला किया.
उसकी प्रतिक्रिया ने मुझे चौंका दिया. उसने कहा कि समान लिंग वाले से प्यार करने के बारे में सोचना ही बेहूदगी है.
उसने मुझसे बात करना बंद कर दिया. इसके बाद सालों तक मैंने अपनी सेक्शुएलिटी के बारे में किसी से बात नहीं की.
जब मैं उदास होता तो खेतों में जाकर पेड़-पौधों से बात कर लेता था, क्योंकि वो मुझे जज नहीं करते थे. वो मेरे दोस्त बन गए, मैं अब भी उनसे बातें करता हूं.
कॉलेज की पढ़ाई के लिए मैं नज़दीक के एक छोटे शहर में रहने लगा. तब मेरी उम्र 18 साल थी. शहर जाने के बाद भी कुछ नहीं बदला. मैं अवसाद में था और मेरी बात सुनने वाला कोई नहीं था.
ना जाने क्यों मैं खुद को ज़िंदगीभर एक गुनहगार समझता रहा. जबकि मैंने कुछ भी गलत नहीं किया.
कॉलेज में मेरे एक टीचर थे, जिनसे मेरी बातचीत काफी अच्छी थी. मैंने उन्हें अपने बारे में बताया, लेकिन ये मेरी सबसे बड़ी गलती थी.
टीचर ने मेरे घरवालों को बुला लिया और वो लोग मुझे घर वापस ले आए. मेरे पिता मुझपर बहुत गुस्सा थे. उन्हें लगा कि मुझे कोई बीमारी हो गई है. इलाज के लिए वो मुझे बाबाओं और ओझा के पास लेकर गए.
उन बाबाओं ने मेरे घरवालों को ना जाने क्या-क्या कहा. एक ने तो कहा कि मुझे एक हफ्ते तक कमरे में बंद करके रखा जाए और मेरे पिता ने ऐसा ही किया.
अब मुझे एक बड़े शहर में नौकरी मिल गई है. उम्मीद है कि अब चीज़ें बदलेंगीं. मैं प्यार करना चाहता हूं और प्यार पाना चाहता हूं.
किरन यादव, उम्र 30, बिहार
गुरुवार तक मुझे धारा 377 के बारे में कुछ भी नहीं पता था. मुझे तो ये भी नहीं पता था कि समान लिंग वाले लोगों का सेक्स अपराध है.
मैं सिर्फ़ इतना जानती हूं कि ग्रामीण बिहार में मुझे कभी भी एक लेस्बियन औरत के रूप में अपनाया नहीं जाएगा.
कोर्ट के फ़ैसले को लेकर मैं खुश हूं, लेकिन इससे मुझे कोई मदद नहीं मिलेगी. मैं बस ये उम्मीद कर सकती हूं कि कोर्ट के इस रुख के बाद ग्रामीण भारत में भी समलैंगिक लोगों के अधिकारों पर बहस छिड़े.
15 साल की उम्र में मुझे एहसास हुआ कि मैं एक लेस्बियन हूं. बचपन से ही मुझे लड़कियों के कपड़े पहनना पसंद नहीं था.
अपने गांव के दूसरे लड़कों की तरह ही मुझे पैंट शर्ट पहनना अच्छा लगता था.
लड़कों वाले कपड़े पहनने पर मेरे घरवालों ने कभी एतराज़ नहीं किया. मेरा कोई भाई नहीं है, इसलिए उन्होंने मुझे अपना बेटा ही समझा.
लेकिन उन्हें मेरे सेक्शुएल झुकाव के बारे में कुछ नहीं पता था.
सच कहूं तो मुझे भी इस बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं है. मुझे ये पता है कि मुझे लड़कियां पसंद हैं, लेकिन मैं ये भी जानती हूं कि ये गलत है. मैंने इसके बारे में अपने मां-बाप को कभी नहीं बताया. वो अब भी नहीं जानते हैं.
हक़ीक़त ये है कि मेरा कोई भी करीबी ये नहीं जानता है. जब मैं किसी शादी समारोह में जाती हूं तो मुझे वहां लड़कियां पसंद आती हैं, लेकिन मैंने कभी उनसे बात करने की हिम्मत नहीं की.
जब मैं 20 साल की हुई, मैंने खुद को व्यक्त करने के बारे में सोचा. मैं गांव में तो किसी से इस बारे में बात नहीं कर पाई. लेकिन मोबाइल फ़ोन के ज़रिए मैंने अपनी इस इच्छा को पूरा किया.
मैं कोई भी नबंर घुमा देती और अनजान लोगों को अपनी कहानी सुनाती. कुछ लोग सुनते भी थे.
उनमें से एक लड़की ने मुझे कहा कि उसे मेरी आवाज़ पसंद है. पहली बार मुझे किसी लड़की ने ऐसा कहा था.
ये छोटी-छोटी चीज़ें मुझे खुशी तो दे रही थीं, लेकिन अंदर से मैं दुखी थी.
24 साल की उम्र में मैंने खुदकुशी करने की कोशिश की. मेरे घरवालों को लगा कि मैं अपनी शादी नहीं होने की वजह से परेशान हूं.
कुछ हफ्तों के बाद ही उन्होंने मेरी शादी करा दी. लेकिन वो शादी टिक नहीं पाई और एक साल में ही मेरा तलाक़ हो गया.
ये सब होने के बाद मेरी जीने की इच्छा मर चुकी थी. एक-एक दिन मेरे लिए मुश्किल हो चला था.
आज 30 साल की उम्र तक मेरे पास कोई साथी नहीं है. अब मैं सिर्फ़ एक अच्छी जॉब चाहती हूं. मैं खुलकर कभी नहीं बोल पाऊंगी कि मैं लेस्बियन हूं, इसलिए मुझे कोई पार्टनर मिलने की उम्मीद नहीं है.
राहुल सिंह, उम्र 32, बिहार
मैं सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का स्वागत करता हूं. लेकिन धारा 377 की वजह से मुझे कभी कोई दिक्कत नहीं हुई.
मेरे गांव की पुलिस ने कभी इस कानून के तहत किसी पर कार्रवाई नहीं की. मेरी परेशानी ये समाज है.
16 साल की उम्र में मुझे पता चला कि मैं समलैंगिक हूं. दो साल बाद मेरी शादी हो गई.
मैं कभी अपने घरवालों और अपनी पत्नी को सच नहीं बता सका. उनके सामने मैंने हमेशा सामान्य रहने का दिखावा किया. अब मेरे दो बेटे हैं.
लेकिन अपनी पत्नी से सच छुपाने का मुझे बहुत पछतावा है. वो अब जानती है कि मैं गे हूं, इसके बावजूद बच्चों के लिए वो मेरे साथ रह रही है.
आपके मन का पार्टनर मिलना इतना आसान नहीं है. बड़े शहरों की तरह यहां गे क्लब नहीं हैं. मैं कुछ गे लोगों को जानता हूं, लेकिन वो सब भी डर में जीते हैं. उन्हें डर है कि सच्चाई जानकर समाज उन्हें अपनाएगा नहीं.
लोगों को लगता है कि एक समलैंगिक को सम्मान से जीने और प्यार पाने का अधिकार नहीं है.
ऐसी ज़िंदगी जीना बहुत मुश्किल है. मैं चाहे जितना भी अच्छा इंसान बनूं और किसी की कितनी भी मदद करूं, अगर उन्हें पता चल जाता है कि मैं गे हूं तो वो मुझसे दूर भागते हैं.
कुछ लोग हमसे सहानुभूति जताते हैं, लेकिन फिर भी उन्हें लगता है कि हमें कोई बीमारी है और इसका इलाज कराया जाना चाहिए. हमारी भावनाओं को कोई नहीं समझता.
इस तरह की ज़िंदगी आपको तोड़ देती है. मुझे हमेशा डर रहता है कि अगर लोगों को पता चलेगा कि मैं गे हूं तो वो मुझे थप्पड़ मार देंगे या मेरा किसी और तरह से अपमान करेंगे.
अगर आप गे हैं और एक गांव में रहते हैं तो आपको घुट-घुट कर जीना पड़ता है.
मुझे डर है कि जब मेरे बच्चे बड़े हो जाएंगे तो लोग उन्हें मेरी वजह से परेशान करेंगे. इस डर की वजह से मैं दूसरे गांव में आकर बस गया.
कभी-कभी मेरे मन में खुदकुशी का ख्याल आता है, लेकिन मैं अपने बच्चों के बारे में सोच कर रुक जाता हूं.
जब मैं मुड़कर देखता हूं तो सोचता हूं कि काश मैं अपने घरवालों को सच बताने की हिम्मत जुटा पाता. मैं सोचता हूं कि काश मैंने शादी नहीं की होगी और काश मैं अपने तरह के लोगों से मिल पाता.
(पहचान छिपाने के लिए नाम बदल दिए गए हैं).
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